माधुर्य शत

माधुर्य शत श्री वंशी अलि जी द्वारा लिखित ग्रन्थ है जिसमें नित्य विहार रस को समर्पित 'श्रृंगार रस' के 100 पद हैं ।

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. लालन तन नैनन भरि चितई - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (21)

    श्री कृष्ण (लाल) ने प्रिया जी के श्रीअंगों को नेत्र भरकर निहारा। उस रूप माधुरी को देखकर वे मूर्छित होकर गिर पड़े और अपनी देह की सुधि भुला दी; ऐसा प्रतीत हुआ मानो श्री राधा के कटाक्षों की नोक उनके हृदय के पार हो गई हो।

  2. नैन बैन राधा गहे, रहे प्रीति के टारि - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (102.2)

    श्री राधा नागरी ने सखियों के नयनों एवं वाणी को पकड़कर अपनी प्रीति के वशीभूत कर लिया है। अब श्री राधा मुख को देख-देखकर सखियों के रोम-रोम में फुलवारी फूल उठी है।

  3. प्रीति की रीति रसिकनी जानैं - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (24)

    प्रीति की रीति तो परम रसिकनी श्री राधा ही जानती हैं । इसी कारण वे अपने प्रियतम को सदा संतुष्ट रखती एवं एक क्षण को भी मान नहीं ठानकर सदा उनका पोषण करती रहती हैं ।

  4. नेह खेत की द्रुमलता, सहचरी मोहनलाल - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (102.1)

    सहचरीगण और मोहन लाल श्री कृष्ण प्रेम-खेत की द्रुम-लता के समान हैं, श्री राधा नित्य ही उनको अपनी करुणामयी दृष्टि डालकर रूप के जल से सींचती हैं ।

  5. हित की बात लाड़िली जानैं - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (3)

    केवल श्री लाडलीजी (श्री राधा) ही हित (प्रेम) की बातों को जानती हैं । जो प्रेम विहीन हैं उनसे भी वे प्रेम को निभाना जानती हैं एवं सदा अपने ह्रदय में करुणा को संजोये रखती हैं ।

  6. लालन मन राग भाल बैंदी लाल - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (5)

    श्री लालजी (कृष्ण) का मन श्री राधा के भाल पर विराजमान बिंदी से आसक्त है। लाड़िली श्री राधा की घुंघराली अलकावलि उनके मुख पर ऐसी प्रतीत होती है मानो चंद्र बादलों के जाल से घिरा हो।

  7. लटकि चलत राधा गरबाहीं - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (123)

    एक सहचरी दूसरी सहचरी से कहती है - गौर श्यामल वर्ण वाले दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण को देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता । मुझे ऐसी बैचैनी हो जाती है कि मैं सोचती हूँ कहाँ जाऊँ और मेरा ह्रदय उनके वियोग की अग्नि में जलने लगता है ।

  8. लटकि चलत राधा गरबाहीं - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (123)

    जब श्री राधा श्री श्यामसुन्दर को गलबाहीं दिये लटक कर चलती हैं तब उनकी अलकें थिरकते हुए उनके चेहरे पर आती हैं । वृषभानु दुलारी श्री राधा की मुस्कान को देखकर श्री श्यामसुन्दर बिक जाते हैं ।

  9. दूलह श्री वृषभानकुमारी दुलहिन श्यामल गात जू - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (111.4)

    श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि सहचरियों का पतिव्रत-धर्म श्री कृष्ण में नहीं, श्री राधा में है। उनकी दृष्टि में श्री राधिका दूल्हा हैं और श्यामल गात जू दुल्हन, जो मनोहर सेज पर विराजमान हैं। मुख की बिंदी को देखकर वे बार-बार निहारते हुए प्रसन्न होते हैं।

  10. देख्यो नेही नंदकिसोर - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (38)

    इस पद में नित्य विहार रस के संयोग एवं वियोग की एक साथ अवस्था की विचित्र दशा का वर्णन किया गया है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री लालजी की प्यारी जू से जैसे ही दृष्टि मिलती है, वे घायल होकर ‘हाय हाय’ करने लगते हैं ।