सुंदर-बदन राधे सोभा को सदन - श्री मतिराम
हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।
श्री मतिराम सोलहवीं शताब्दी के ब्रजभाषा के प्रसिद्ध रसिक कवि थे।
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हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है।
खेल-खेल में श्रीकृष्ण ने श्रीराधा के नेत्रों को बंद कर लिया, और फिर श्री राधा अपने नेत्रों की कोरों से ऐसे तिरछे कटाक्ष करने लगीं कि उनकी वह सम्मोहक चितवन श्रीकृष्ण के हृदय के आर-पार हो गई।
हे श्यामसुंदर! यमुना जी के परम पावन तट पर उस कुंज में आपने जो वनमाला दी थी, वह वनमाला ही अब निकलते हुए प्राणों को बाँधकर रखने का काम कर रही है अर्थात् आपकी दी हुई वह वस्तु ही इस विरह में प्राणों का एकमात्र आधार बनी हुई है।
एक गोपी कहती है, “नंदलाल श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम को त्याग कर हम योग नहीं चाहती। जो रत्न के पारखी होते हैं, भला वे रंग बाती (शरीर में लगाई जाने वाली सुगंधित वस्तुओं की बत्ती) का क्या करेंगे?”
जिस प्रकार सोने की बेल तमाल वृक्ष से और बादल के संग बिजली शोभित होती है, हे श्री राधे! उसी प्रकार सदृश स्नेह के कारण तुम घनश्याम संग सुशोभित रहती हो।
श्री राधा का परम उज्ज्वल मुखचंद्र मेरे हृदय के अंधकार का नाश करे। जिस प्रकार चंद्रमा के दर्शन से समुद्र में ज्वार उमड़ता है, उसी प्रकार श्री राधा के मुखचंद्र को निहारकर श्री कृष्ण के आनंद-सागर में उल्लास की तरंगें उठती हैं।
श्री मतिराम जी कहते हैं कि चाहे कोई करोड़ों यत्न क्यों न कर ले, फिर भी फटे दूध अर्थात् अशुद्ध मन से कभी भी श्री राधा-कृष्ण का निर्मल मक्खन अर्थात् प्रेम नहीं निकल सकता।
हृदय पर गुंजाओं की माला धारण किए हुए, मस्तक पर मोर-पंखों से सुशोभित मुकुट पहने हुए कुंज-बिहारी—कुंजों में विहार करने वाले हे श्रीकृष्ण! आप मेरे मनरूपी कुंज में विहार कीजिए।
अजामिल जैसे जितने भी अधम और महापापी हुए हैं, मैं उन सबका शिरोमणि हूँ अर्थात् मैं उन सबसे बड़ा अपराधी हूँ। हे श्री कृष्ण! अब मुझ पर भी अपनी करुणा कीजिए, क्योंकि आप तो दया के अथाह सागर हैं।
हे राधिके, तुम्हारे मुख-कमल की समता करना किसी के लिए संभव नहीं। कमल और चंद्रमा ने भी जब यह साहस किया, तो कमल पर पुष्प-रज की धूल बैठ गई और चंद्रमा को कलंक लग गया। भाव यह है कि श्री राधा के मुख की तुलना किसी से करना सर्वथा अनुचित और मूर्खता है।
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं—हे भ्रमर! हम तो श्री कृष्ण के प्रेम में निमग्न हैं, इसलिए तुम्हारी योग-ज्ञान (निरगुण) की बातें हमें अच्छी नहीं लगतीं। जब राजपद मिल जाए, तो फिर कौन भिक्षा माँगता फिरेगा? अर्थात् हमें तो प्रेम-राज्य मिल गया है, अब योग की भिक्षा क्यों लें?
जिनको राधा और कृष्ण का विशुद्ध प्रेम रुचिकर नहीं है, उनकी आँखों में दस हज़ार मुट्ठी धूल पड़ जाए। भाव यह है कि जो राधा-कृष्ण के प्रेम को साधारण समझते हैं, उन्हें लाख-लाख बार धिक्कार है।
ब्रज की ठकुरानी केवल श्री राधा महारानी हैं। उन्हीं की कृपा से श्री कृष्ण का यश जगत में प्रकाशित है। जो श्री हरि सबके मन को मोहने वाले हैं, वे यहाँ ब्रज में श्री राधा की दासियों के भी दास बने बैठे हैं।