प्रीति लता [ब्रज निधि ग्रंथावाली]

प्रीति लता निम्बार्क संप्रदाय के रसिक संत श्री ब्रज निधि द्वारा लिखित ब्रज निधि ग्रंथावली का पहला अध्याय है। लेखक: श्री ब्रज निधि जी

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. प्रिया बदन बिधु तन लखे - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (68)

    श्री प्रिया जी के मुख-रूपी चंद्रमा की ओर प्रियतम श्री कृष्ण के नेत्र चकोर के समान निरंतर एकटक निहारते रहते हैं। श्री राधा के अगाध सौंदर्य-रूपी मदिरा का निरंतर पान करके नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा छके रहते हैं।

  2. कहूँ लकुट कहुँ मुरलिका पीताम्बर सुधि नाहिं - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (63)

    श्रीराधा के ध्यान में श्रीकृष्ण इस प्रकार डूबे हुए हैं कि उन्हें न तो अपनी छड़ी का होश है, न मुरली का पता है, और न ही अपने पीताम्बर की सुधि शेष है। यहाँ तक कि उनके सिर की मोर-पंखी चंद्रिका भी ध्यानमग्न होकर झुक गई है मानो वह भी उसी प्रेम-भाव में लीन हो गई हो।

  3. नीलंबर को ध्यान धरि - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (59)

    जब से श्रीकृष्ण की दृष्टि संकेत ग्राम (जो बरसाना और नंदगाँव के मध्य स्थित है) में श्रीराधा पर पड़ी है, तब से वे अनवरत बरसाने की ओर ही निहार रहे हैं। (मानो वे निरंतर अपेक्षा कर रहे हैं कि कब फिर से श्रीराधा की मधुर छवि के दर्शन होंगे)

  4. नीलंबर को ध्यान धरि - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (61)

    नीले वस्त्रों को धारण करने वाली श्री राधा का ध्यान कर श्री श्यामसुन्दर उन्मत्त हो उठे । श्री किशोरीजी के गौर वर्ण वाले रूप को निहारने के कारण ही वे सदा पीतांबर धारण करते हैं ।

  5. प्यारी के अति प्यार सों, पिय परसत कर पाय - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (51)

    जब श्री राधा मान करती हैं तब श्री कृष्ण अति ही प्रेम में भरकर, उनके चरणों को अपने कर कमलों द्वारा स्पर्श कर, उन श्री चरणों की आराधना करते हैं । श्री कृष्ण के प्रेम की पीर को पहचान कर श्री राधा उन्हें क्षमा कर मुस्कुरा देती हैं ।

  6. गौर स्याम सुखदैन हैं श्री वृंदावन माँझ - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (74)

    श्री वृंदावन धाम में गौर-श्यामल वर्ण के श्री राधा-कृष्ण अनुपम आनंद की वर्षा करते हैं। जो इस दिव्य प्रेम-रस को नहीं जानते, उनका जीवन निस्सार और व्यर्थ है।

  7. नित हित चित के माहि, लाल किसोरी रटतु हैं - श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (31)

    अपने हृदय को नित्य प्रेम-रस में डुबाकर, श्री कृष्ण नित्य ही “श्री राधा” नाम रटते हैं। उन्हें अन्य कुछ भी रुचिकर नहीं लगता; उनका समस्त दिन-रात इसी नाम-स्मरण में बीतता है।

  8. रस-बस छकि दंपति दुहूँ, कीने बिबिध बिलास - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (55)

    दिव्य दम्पति श्री राधा-कृष्ण प्रेम-रस में पूर्णत: तृप्त होकर अनेक प्रकार की केलियाँ कर रहे हैं। जो साधक इस युगल का मन लगाकर सुमिरन करता है, उसके हृदय में आनंद स्वतः उमड़ने लगता है और उसका रस क्षण-क्षण प्रगाढ़ होता जाता है।

  9. मोहन मोहे मोहनी, भई नेह बढ़वारी - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (65)

    मन को मोहित करने वाले श्री कृष्ण को उन परम मोहिनी श्री राधा ने पूरी तरह मोहित कर लिया है, जिससे उनके मध्य प्रेम का अनुराग निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। श्री कृष्ण विरह और प्रेम के वशीभूत होकर "हा राधे! हा हा प्रिया!" पुकारते हुए व्याकुल होकर उन्हें चारों ओर ढूँढ रहे हैं।

  10. राधे सुख को सार - श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (28)

    हे श्री राधे! आप ही समस्त सुखों का सार और आधार हैं। आपके इसी सुखद रूप का दर्शन करने के लिए प्रियतम श्री कृष्ण निरंतर आपके पीछे-पीछे (संग-संग) लगे रहते हैं। वे अपने हृदय के भीतर ही आपको बारंबार प्रणाम (जुहार) करते हैं और आठों पहर केवल आपकी ही चाहना करते हैं।

  11. प्राननि तें प्यारो लगे, दंपति-सुजस-बखान - ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (72)

    इस पृथ्वी पर कोई विरला ही ऐसा अधिकारी होगा, जिसे प्रिया-प्रियतम का रस अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय लगे, और जिसे युगल दम्पति श्री राधा-कृष्ण के इस अद्भुत यश का गान करने में ही प्राणों से बढ़कर सुख की अनुभूति होती हो।