श्री रूप माधुरी

श्री रूप माधुरी शरण, वृंदावन के एक रसिक संत, शुक संप्रदाय के श्री सरस माधुरी के शिष्य हैं जो वृंदावन में युगल घाट स्थित सरस निकुंज में रहते हैं।

46 लेख उपलब्ध हैं

  1. गौरांगी श्रीराधिका प्रीतम की उरहार- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (01)

    गोरे अंगों वाली श्रीराधिका अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के हृदय का हार हैं। वे सबके मन को मोहने वाले (मनमोहन) श्रीकृष्ण के मन को भी मोहने वाली हैं तथा अत्यंत कृपालु और परम उदार हैं।

  2. जय जय जमुना सब सुखकारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)

    सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।

  3. भाव अनोखी वस्तु है जो कर जाने कोय - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (5)

    ‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।

  4. किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (16)

    हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।

  5. रसविलसनी रसमगन नित - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (18)

    श्री रूपमाधुरी जी प्रार्थना करते हैं कि जो सदैव रस-विलास में निमग्न रहती हैं और जिनकी अनुपम छवि प्रत्येक क्षण नवीन एवं अद्भुत प्रतीत होती है, ऐसी श्री राधाजू का वह परम विलक्षण स्वरूप उनके हृदय में सदा के लिए निवास करे।

  6. दोऊ मगन भये रस होरी में - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (172)

    श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं।

  7. कुंजभवन सर्वेश्वरी साहिबनी सिरताज - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (16)

    कुंजमहल की स्वामिनी, सबकी अधीश्वरी और साहिबनी, सबमें श्रेष्ठ शिरोमणि श्री राधा हैं। वे आनंद की मूल स्रोत हैं, अत्यन्त कोमल हृदय वाली और सदा दीन-दुखियों पर कृपा करने वाली हैं।

  8. साधो यह विचार मन जांचा है - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

    हे साधकों! यह विचार मैंने मन ही मन बहुत बारीकी से परखा है — जिसने भी भगवान से कुछ माँगा है, उसमें बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। जिसका चित्त श्री हरि के प्रेम में वास्तविक रंगा होता है, उसे विषय-भोग तुच्छ लगते हैं।

  9. उर प्रकाश हो रूप को - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (21)

    यदि कोई “श्री राधा” नाम का सतत जप करने का नियम दृढ़ता से धारण कर ले, तो शीघ्र ही उसके हृदय में श्री राधा का दिव्य रूप प्रकाशित होने लगे और नेत्रों में प्रेम झलकने लगे ।

  10. मैं तो तेरे दर्शन की हूँ भिखारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)

    मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो।

  11. प्यारी प्रीतम को सदा जिनके उरमें भाव- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (14)

    जिन रसिकों के हृदय में प्रिया प्रियतम की अनन्य भक्ति है, ऐसे रसिकों के दर्शन का भरपूर लाभ लेकर मन को तृप्त करना चाहिए।

  12. प्राणजीवन के नेह में तन मन से रहे चूर - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (10)

    जिसका तन-मन अपने प्राण-जीवन-धन (श्री श्यामा-श्याम) के प्रेम में सदा उन्मत्त रहता है, वही सच्चा (शूरवीर) रसिक है। चाहे वह घर में रहे या वन में, उसका मन सदैव प्रेम में ही मगन रहता है।

  13. लगी मेरी मदन मोहन से यारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (136)

    मेरी मदन मोहन (श्रीकृष्ण) से एक अंतरंग यारी बन गई है। उनके टेढ़े मुकुट की लटक मेरे हृदय में ऐसे बस गई है कि अब उनके अतिरिक्त मेरी किसी और से लगन ही नहीं रही।

  14. प्रिया मैं तो हूँ चेरिन की चेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)

    हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।

  15. प्यारी प्रीतम के सदा रस ही में आसक्त- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (21)

    वास्तविक रसिक वही है जो प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) के प्रेम में निरंतर डूबा रहता है एवं प्रशंसा तथा निंदा, दोनों को समान मान उनसे उदासीन रहता है।