श्री सरस माधुरी
श्री सरस माधुरी शुक संप्रदाय के ब्रज के रसिक संत हैं जो जयपुर के रहने वाले थे, जिनके शिष्य श्यामा सखी (या सनम साहिब) थे।
67 लेख उपलब्ध हैं
लता कुंज वृंदा बिपिन बिहरें - श्री सरस माधुरी
श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।
जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी
वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।
आरती कुंज नृपति की कीजै - श्री सरस माधुरी
कुंज के अधिपति युगल किशोर की आरती उतारिए। इन नित्य नवीन लाड़िली जी और अलबेले लाल जी की अनुपम छवि को अपने नेत्रों से निहारकर पूर्ण रूप से तृप्त हो जाइए।
ऐसौ अद्भुत प्रेम है दम्पति - श्री सरस माधुरी
दिव्य दम्पति के अंगों में परस्पर ऐसा अद्भुत और विलक्षण प्रेम व्याप्त है कि वे नित्य निरंतर सर्वदा एक-दूसरे के साथ ही रहते हैं, फिर भी उन्हें कभी तृप्ति नहीं होती है।
बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
जो कराय सो कीजिये जो - श्री सरस माधुरी
भगवान के वास्तविक भक्त के लक्षण बताते हुए सरस माधुरी कहते हैं कि प्रभु उससे जो कराते हैं, वह उसी में अपनी प्रसन्नता मानता है। वे जो सुख-दुःख अथवा जीवन की परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, उन्हें वह प्रभु का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। प्रभु उसे जहाँ रखते हैं, वह वहीं संतोषपूर्वक रहता है। यही एक सच्चे दास का धर्म एवं सर्वोत्तम साधन है।
श्रीराधा पद पंकज रज सरबस धन मेरी - श्री सरस माधुरी
श्री राधा जी के चरण कमलों की परम-पावन रज ही मेरा सर्वस्व धन है। मैं मन, वचन और कर्म से केवल अपनी श्री श्यामा महारानी की ही अनन्य दासी हूँ।
रस लोभी दम्पति महा अधिक एक ते एक - श्री सरस माधुरी
यह दिव्य दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) रसास्वादन के अत्यंत लोभी हैं, और रस की उस प्यास में दोनों एक-दूसरे से बढ़कर हैं। उनके हृदय का यही एक दृढ़ संकल्प है कि वे एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते।
सलोनी लागै बरसाने की भूमि - श्री सरस माधुरी
बरसाने की यह पावन भूमि अत्यंत सलोनी (सुंदर) लगती है। यहाँ पर्वत के शिखर पर लाड़िली जी (श्री राधा) विराजमान हैं और सुंदर लताएँ आनंद में झूम रही हैं।
पंच रसन में मुख्य है उत्तम रस श्रृंगार - श्री सरस माधुरी
भक्ति के पाँच मुख्य रसों में 'श्रृंगार रस' ही सर्वोपरि और उत्तम है। साधक को अपने हृदय में सहचरी भाव धारण कर, उन सुकुमार युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निष्काम सेवा करनी चाहिए।
प्रिया पिय छबि लखि छकनि छकाई - श्री सरसमाधुरी
प्रिया (राधा) और प्रियतम (कृष्ण) एक-दूसरे की छवि को निहारकर प्रेम में पूर्ण-रूपेण छके हुए हैं। वे दोनों परस्पर होली के खेल में मग्न हैं और उनका तन-मन इस दिव्य उत्सव के रस में डूबकर अत्यंत प्रसन्न हो रहा है।
युगल लगन में मन मगन राखहु आठों याम - श्री सरस माधुरी
आठों याम मन को श्री युगल अनुरक्ति में पूर्णतः मग्न रखो। ‘सरसमाधुरी’ कहते हैं—प्रेमपूर्ण स्मृति के साथ सदा श्यामा-श्याम का सुमिरन करो।
लाडिली विनय सुनो सुख रासी - श्री सरस माधुरी जी
हे लाड़िली! हे सुख-राशि! कृपा कर मेरी विनती स्वीकार कीजिए। आपका मुखचंद्र आनंद का परम स्रोत है, जिसे निहारने के लिए मेरी आँखें चकोर के समान व्याकुल रहती हैं ।
श्रीश्यामा मानो विनती मोरी - श्री सरस माधुरी जी
हे श्रीश्यामा! मेरी विनती स्वीकार कीजिए। मैं आपकी निज दासी हूँ, आपके चरणों की उपासिका हूँ। मैं जन्म-जन्म से केवल आपकी ही हूँ।
लीला नित्य विहारको ब्रह्मादिक ललचात - श्री सरस माधुरी
हे सखी! प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस का पान करने के लिए तो साक्षात ब्रह्मादिक भी ललचाते हैं — फिर सुर, नर, मुनि आदि की तो बात ही क्या करें!
श्री राधाप्यारी सुकुमारी - श्री सरस माधुरी जी
श्री कृष्ण कहते हैं — हे श्रीराधाप्यारी! हे सुकुमारी! आपकी मनोहर छवि पर मैं न्योछावर जाऊँ। मैं अपने अधरों पर बंसी धारण कर, तुम्हारे ही गुणों का गान करता हूँ।
बाँकी रसिक विहारिनि राधे - श्री सरस माधुरी जी
रसिकों की स्वामिनी, नित्य विहार करने वाली श्री राधा एवं रसिक बिहारी श्रीकृष्ण — दोनों ही बाँके हैं।
ध्यान धरो सुमिरण करो श्रीमत राधे श्याम- श्री सरस माधुरी
अपने मन को श्री राधा कृष्ण के ध्यान में लगाओ, उनका स्मरण करो। उनके दिव्य गुणों का प्रेमपूर्वक हर क्षण, आठों पहर गान करो — यही जीवन का परम सार है।
शरण श्री वृंदावन की जइये - श्री सरस माधुरी जी
श्री वृंदावन की शरण ग्रहण कीजिए। युगल बिहारी (श्री राधा-कृष्ण) के चरणकमलों से दिन-रात प्रेम कीजिए।
सुख की दंपति राशिहैं - श्री सरस माधुरी
दिव्य दम्पति श्री राधा-कृष्ण आनंद की अपार निधि हैं, इसलिए उनके प्रति अपना प्रेम सतत बढ़ाते रहो। श्री सरस माधुरी कहते हैं कि निष्काम भाव से उनकी महल-टहल (सेवा) में अपने मन की रुचि और चाव को हर समय बनाए रखो।