श्री सरस माधुरी

श्री सरस माधुरी शुक संप्रदाय के ब्रज के रसिक संत हैं जो जयपुर के रहने वाले थे, जिनके शिष्य श्यामा सखी (या सनम साहिब) थे।

63 लेख उपलब्ध हैं

  1. बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

    हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।

  2. जो कराय सो कीजिये जो - श्री सरस माधुरी

    भगवान के वास्तविक भक्त के लक्षण बताते हुए सरस माधुरी कहते हैं कि प्रभु उससे जो कराते हैं, वह उसी में अपनी प्रसन्नता मानता है। वे जो सुख-दुःख अथवा जीवन की परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, उन्हें वह प्रभु का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। प्रभु उसे जहाँ रखते हैं, वह वहीं संतोषपूर्वक रहता है। यही एक सच्चे दास का धर्म एवं सर्वोत्तम साधन है।

  3. रस लोभी दम्पति महा अधिक एक ते एक - श्री सरस माधुरी

    यह दिव्य दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) रसास्वादन के अत्यंत लोभी हैं, और रस की उस प्यास में दोनों एक-दूसरे से बढ़कर हैं। उनके हृदय का यही एक दृढ़ संकल्प है कि वे एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते।

  4. पंच रसन में मुख्य है उत्तम रस श्रृंगार - श्री सरस माधुरी

    भक्ति के पाँच मुख्य रसों में 'श्रृंगार रस' ही सर्वोपरि और उत्तम है। साधक को अपने हृदय में सहचरी भाव धारण कर, उन सुकुमार युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निष्काम सेवा करनी चाहिए।

  5. प्रिया पिय छबि लखि छकनि छकाई - श्री सरसमाधुरी

    प्रिया (राधा) और प्रियतम (कृष्ण) एक-दूसरे की छवि को निहारकर प्रेम में पूर्ण-रूपेण छके हुए हैं। वे दोनों परस्पर होली के खेल में मग्न हैं और उनका तन-मन इस दिव्य उत्सव के रस में डूबकर अत्यंत प्रसन्न हो रहा है।

  6. लाडिली विनय सुनो सुख रासी - श्री सरस माधुरी जी

    हे लाड़िली! हे सुख-राशि! कृपा कर मेरी विनती स्वीकार कीजिए। आपका मुखचंद्र आनंद का परम स्रोत है, जिसे निहारने के लिए मेरी आँखें चकोर के समान व्याकुल रहती हैं ।

  7. लीला नित्य विहारको ब्रह्मादिक ललचात - श्री सरस माधुरी

    हे सखी! प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस का पान करने के लिए तो साक्षात ब्रह्मादिक भी ललचाते हैं — फिर सुर, नर, मुनि आदि की तो बात ही क्या करें!

  8. श्री राधाप्यारी सुकुमारी - श्री सरस माधुरी जी

    श्री कृष्ण कहते हैं — हे श्रीराधाप्यारी! हे सुकुमारी! आपकी मनोहर छवि पर मैं न्योछावर जाऊँ। मैं अपने अधरों पर बंसी धारण कर, तुम्हारे ही गुणों का गान करता हूँ।

  9. ध्यान धरो सुमिरण करो श्रीमत राधे श्याम- श्री सरस माधुरी

    अपने मन को श्री राधा कृष्ण के ध्यान में लगाओ, उनका स्मरण करो। उनके दिव्य गुणों का प्रेमपूर्वक हर क्षण, आठों पहर गान करो — यही जीवन का परम सार है।

  10. सुख की दंपति राशिहैं - श्री सरस माधुरी

    दिव्य दम्पति श्री राधा-कृष्ण आनंद की अपार निधि हैं, इसलिए उनके प्रति अपना प्रेम सतत बढ़ाते रहो। श्री सरस माधुरी कहते हैं कि निष्काम भाव से उनकी महल-टहल (सेवा) में अपने मन की रुचि और चाव को हर समय बनाए रखो।

  11. नाम रूप लीला ललित और जानिए धाम - श्री सरस माधुरी

    जो श्री राधा-कृष्ण के नाम, रूप, सुंदर लीलाओं और उनके धाम की सुदृढ़ (अनन्य) उपासना करते हैं, उन्हें ही ‘रसिक’ कहा जाता है। इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रसिकों की उपासना पूर्णतः निष्काम और तत्सुखमयी होती है अर्थात् वे केवल श्री राधा-कृष्ण को ही सुख प्रदान करने के उद्देश्य से होती है ।