बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
श्री सरस माधुरी शुक संप्रदाय के ब्रज के रसिक संत हैं जो जयपुर के रहने वाले थे, जिनके शिष्य श्यामा सखी (या सनम साहिब) थे।
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हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
भगवान के वास्तविक भक्त के लक्षण बताते हुए सरस माधुरी कहते हैं कि प्रभु उससे जो कराते हैं, वह उसी में अपनी प्रसन्नता मानता है। वे जो सुख-दुःख अथवा जीवन की परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, उन्हें वह प्रभु का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। प्रभु उसे जहाँ रखते हैं, वह वहीं संतोषपूर्वक रहता है। यही एक सच्चे दास का धर्म एवं सर्वोत्तम साधन है।
श्री राधा जी के चरण कमलों की परम-पावन रज ही मेरा सर्वस्व धन है। मैं मन, वचन और कर्म से केवल अपनी श्री श्यामा महारानी की ही अनन्य दासी हूँ।
यह दिव्य दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) रसास्वादन के अत्यंत लोभी हैं, और रस की उस प्यास में दोनों एक-दूसरे से बढ़कर हैं। उनके हृदय का यही एक दृढ़ संकल्प है कि वे एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते।
बरसाने की यह पावन भूमि अत्यंत सलोनी (सुंदर) लगती है। यहाँ पर्वत के शिखर पर लाड़िली जी (श्री राधा) विराजमान हैं और सुंदर लताएँ आनंद में झूम रही हैं।
भक्ति के पाँच मुख्य रसों में 'श्रृंगार रस' ही सर्वोपरि और उत्तम है। साधक को अपने हृदय में सहचरी भाव धारण कर, उन सुकुमार युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निष्काम सेवा करनी चाहिए।
प्रिया (राधा) और प्रियतम (कृष्ण) एक-दूसरे की छवि को निहारकर प्रेम में पूर्ण-रूपेण छके हुए हैं। वे दोनों परस्पर होली के खेल में मग्न हैं और उनका तन-मन इस दिव्य उत्सव के रस में डूबकर अत्यंत प्रसन्न हो रहा है।
आठों याम मन को श्री युगल अनुरक्ति में पूर्णतः मग्न रखो। ‘सरसमाधुरी’ कहते हैं—प्रेमपूर्ण स्मृति के साथ सदा श्यामा-श्याम का सुमिरन करो।
हे लाड़िली! हे सुख-राशि! कृपा कर मेरी विनती स्वीकार कीजिए। आपका मुखचंद्र आनंद का परम स्रोत है, जिसे निहारने के लिए मेरी आँखें चकोर के समान व्याकुल रहती हैं ।
हे श्रीश्यामा! मेरी विनती स्वीकार कीजिए। मैं आपकी निज दासी हूँ, आपके चरणों की उपासिका हूँ। मैं जन्म-जन्म से केवल आपकी ही हूँ।
हे सखी! प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस का पान करने के लिए तो साक्षात ब्रह्मादिक भी ललचाते हैं — फिर सुर, नर, मुनि आदि की तो बात ही क्या करें!
श्री कृष्ण कहते हैं — हे श्रीराधाप्यारी! हे सुकुमारी! आपकी मनोहर छवि पर मैं न्योछावर जाऊँ। मैं अपने अधरों पर बंसी धारण कर, तुम्हारे ही गुणों का गान करता हूँ।
रसिकों की स्वामिनी, नित्य विहार करने वाली श्री राधा एवं रसिक बिहारी श्रीकृष्ण — दोनों ही बाँके हैं।
अपने मन को श्री राधा कृष्ण के ध्यान में लगाओ, उनका स्मरण करो। उनके दिव्य गुणों का प्रेमपूर्वक हर क्षण, आठों पहर गान करो — यही जीवन का परम सार है।
श्री वृंदावन की शरण ग्रहण कीजिए। युगल बिहारी (श्री राधा-कृष्ण) के चरणकमलों से दिन-रात प्रेम कीजिए।
दिव्य दम्पति श्री राधा-कृष्ण आनंद की अपार निधि हैं, इसलिए उनके प्रति अपना प्रेम सतत बढ़ाते रहो। श्री सरस माधुरी कहते हैं कि निष्काम भाव से उनकी महल-टहल (सेवा) में अपने मन की रुचि और चाव को हर समय बनाए रखो।
जो स्वयं प्रेमी बनकर प्रेम धन कमाता है, ऐसा प्रेमी भक्त ही प्रियतम (श्री कृष्ण) के मन को भाता है ।
हे सखी, श्रीधाम बरसाना हमारा निज गाँव है। हमारी पटरानी का नाम श्री राधिका है, और राजा श्री घनश्याम हैं।
हे वृषभानु-दुलारी श्रीराधा! मुझे तो एकमात्र आपका ही बल है। यद्यपि मैं गुणहीन और पतित हूँ, फिर भी मैं आपकी ही शरण में हूँ।
जो श्री राधा-कृष्ण के नाम, रूप, सुंदर लीलाओं और उनके धाम की सुदृढ़ (अनन्य) उपासना करते हैं, उन्हें ही ‘रसिक’ कहा जाता है। इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रसिकों की उपासना पूर्णतः निष्काम और तत्सुखमयी होती है अर्थात् वे केवल श्री राधा-कृष्ण को ही सुख प्रदान करने के उद्देश्य से होती है ।