कबकी टेरत दीन है सुनत न नाथ पुकार - श्री दयाबाई
हे नाथ! यह दीन जीव न जाने कब से आपको पुकार रहा है, किंतु आप मेरी पुकार सुन ही नहीं रहे हैं। क्या आपके कान ऊँचा सुनने लगे हैं, अथवा आपने दीनों पर दया करने का अपना सहज स्वभाव (विरद) ही भुला दिया है?
श्री दया बाई, एक रसिक भक्त, शुक संप्रदाय से संबंधित श्री चरण दास की शिष्या थी ।
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हे नाथ! यह दीन जीव न जाने कब से आपको पुकार रहा है, किंतु आप मेरी पुकार सुन ही नहीं रहे हैं। क्या आपके कान ऊँचा सुनने लगे हैं, अथवा आपने दीनों पर दया करने का अपना सहज स्वभाव (विरद) ही भुला दिया है?
सोते और जागते हुए निरंतर श्री हरि का भजन करो, उन्हें अपने हृदय से कभी विस्मृत मत होने दो। श्री दयाबाई जी कहती हैं कि हरि-नाम की डोरी को ऐसे थामे रहो कि प्रभु-स्मरण का यह तार कभी टूटने न पाए।
श्रीकृष्ण का श्याम वर्ण अत्यंत मनमोहक है, उनके नेत्र सलोने और चित्ताकर्षक हैं तथा उनके मुखमंडल पर घुंघराली अलकें बलखा रही हैं।
दयाबाई कहती हैं कि हरिनाम भवसागर से पार उतारने वाली नौका है और सतगुरु उसके खेवनहार हैं। यदि वास्तविक संत का सच्चा संग प्राप्त हो जाए, तो इस संसार-सागर को पार करने में तनिक भी विलम्ब नहीं होता।
श्री मनमोहन (श्रीकृष्ण) का ध्यान करना चाहिए और तन-मन से उन्हीं के प्रति प्रेम रखना चाहिए। जो लोग श्रीहरि को छोड़कर संसार में ही केवल आसक्त रहते हैं, उनकी यह दशा अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है।
हे सखी! मोहन की वह अत्यंत प्यारी दिव्य चितवन (दृष्टि) का प्रभाव मुझसे शब्दों में कहा नहीं जाता। उनकी वह चितवन मेरे हृदय के भीतर इस प्रकार गहरे धँस गई है कि अब मेरे बार-बार निकालने का प्रयास करने पर भी वह बाहर नहीं निकलती।
श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज में श्यामा-श्याम के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव को दयाबाई जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि विरह-वेदना से व्याकुल होकर जब वे निरंतर श्यामा-श्याम को पुकार रही थीं, तब एक दिन अचानक किसी कुंज में उन्हें श्री लाड़िली-लाल के दर्शन हो गए, और वे पूर्णतः कृतार्थ हो गईं।
दयाबाई जी कहती हैं कि जो भक्त प्रभु-प्रेम में मग्न हो जाते हैं, उन्हें अपने तन की रत्ती भर भी सुध-बुध नहीं रहती। वे श्रीहरि के रस में ऐसे डूबे रहते हैं कि उनके लिए नियम, व्रत और कर्मकाण्ड आदि का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता।
श्री दयाबाई जी की भगवद्प्राप्ति की प्रबल इच्छा को देखकर उनके गुरुदेव श्री चरणदास जी ने उन्हें आज्ञा दी कि वे वृन्दावन जाएँ और वहीं वास करें। तब उन्हें श्यामा-श्याम के जो दर्शन प्राप्त हुए, उनका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है— हे सखी! आज दोनों कुञ्ज बिहारी (श्री लाड़ली लाल) निकुंज में अचानक मुझे मिल गए।
प्रेम का पंथ अत्यंत अटपटा और सबसे निराला है। इसकी अनोखी मधुर पीर को वही जानता है, जो स्वयं उस पीड़ा से घायल हुआ हो अर्थात् जिसके हृदय ने उस वेदना का अनुभव किया हो।
जहाँ भी सच्चा प्रेम प्रकट होता है, वहाँ भगवान् स्वतः प्रकट हो जाते हैं। श्री दयाबाई कहती हैं कि भगवान् फिर दया करके उस प्रेमी को अपने दर्शन देकर सदा कृतार्थ करते रहते हैं।
दयाबाई कहती हैं कि जो वास्तव में साधु-संग करता है, वही जानता है कि इसमें अपार सुख है। यह इतना दुर्लभ है कि आधा क्षण भी संतों की संगति में बिताने से समस्त पापों का नाश हो जाता है।
जो साधु श्रीहरि के प्रेम में लीन होते हैं, वे सदा निडर होकर विचरण करते हैं। वे भगवान के रस में इतने सराबोर रहते हैं कि राजा और रंक में कोई अंतर नहीं समझते।
भले ही कोई योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और तीर्थों की यात्रा करे, नियम, संयम, सदाचार का पालन करे, चारों वेदों एवं छहों शास्त्रों में पारंगत हो जाए— परंतु, हे प्रभु! आपकी कृपा के बिना यह सब निष्फल ही रहता है।
दयाबाई कहती हैं कि हे भगवान, मैं आपकी सौगंध खाकर कहती हूँ कि भले ही मुझे सदा दुख मिलता रहे, मुझे दुख को छोड़कर सुख की बिल्कुल भी इच्छा नहीं है और न ही मुझे वैकुण्ठ की ही इच्छा है। मैं तो अपने मन को केवल और केवल आपके चरण-कमलों में ही निरंतर लगाना चाहती हूँ।
प्रेम रूपी विरह की पीड़ा ने मुझे इतना अधिक विकल कर दिया है कि न दिन में आराम मिलता है और न ही रात को। श्री दयाबाई कहती हैं—"जब तक मेरे नेत्र श्यामसुंदर के अनुपम रूप का दर्शन करके तृप्त नहीं हो जाते, तब तक मेरे हृदय को तनिक भी शांति नहीं मिलेगी।"
जो श्री हरि के रस में रंगे होते हैं उनकी अवस्था वर्णन से परे होती है । उनके लिए सम्पूर्ण त्रिलोकी की संपदा तिनके के समान तुच्छ होती है ।
जिनके हृदय में प्रेम प्रकट हो जाता है, वे अपने शरीर की सुध-बुध खो बैठते हैं । उनकी समस्त वृत्तियाँ अंतर्मुखी हो जाती हैं, और उनके लिए घर तथा जंगल का कोई भेद नहीं रह जाता।