श्री जुगल प्रिया

श्री जुगल प्रिया, वृंदावन के एक रसिक भक्त

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. पापिनको सँग छाँड़ि जतन कर - श्री युगल प्रिया

    साधक को भगवान से विमुख (अधर्मी) जीवों का संग छोड़ने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा कहे गए शब्द तीखे बाणों के समान हृदय को छलनी कर देते हैं। उनके साथ अनजाने में होने वाले मिलन, दर्शन अथवा स्पर्श से भी सर्वथा भयभीत रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा असत्-संग भगवद-प्राप्ति के मार्ग में निश्चित ही एक बहुत बड़ा अवरोध बन जाता है।

  2. नाथ अनाथनकी सब जानै - श्री युगल प्रिया

    हे नाथ! आप अनाथों और असहायों के हृदय की सब बातें भली-भांति जानते हैं। मैं कब से आपके द्वार पर खड़ी पुकार रही हूँ, पर आप अपने कानों से मेरी करुण पुकार सुन क्यों नहीं रहे? क्या आप मुझ पर किसी बात से रूठ गए हैं?

  3. मिलन अनूठी प्यारे तिहारी - श्री जुगलप्रिया जी

    हे प्यारे, आपका मिलन अद्वितीय है। आपकी कहानी, करनी और रहनी सब अनूठी हैं, जिन पर मैं बार-बार बलिहारी जाती हूँ। आपका चलना, मुड़ना और झुकना अत्यंत मनमोहक और निराला है।

  4. वृन्दावन रस काहि न भावै - श्री जुगलप्रिया जी

    ऐसा कौन है जो वृंदावन के रस से मोहित नहीं होगा? हरे-भरे वृक्षों और वल्लरियों से सुसज्जित वृंदावन, गोवर्धन पर्वत, और श्री यमुना आदि किसी को कैसे मनमोहक नहीं लग सकते?

  5. मैं पाऊ कृपाकरि मोहिनी - श्री जुगलप्रिया जी

    मन को मोहित करने वाले, श्री श्यामाश्याम के कुञ्ज भवन की सोहनी सेवा को कृपापूर्वक मैं कब प्राप्त करुँगी ? जहाँ श्री श्यामाश्याम के अंगों के आभूषणों की मणियाँ, माणिक्य, मुक्ता, आदि रत्न जब टूट कर बिखरेंगे तो मैं उन्हें खोजूँगी।

  6. माई मोकों जुगलनाम निधि भाई - श्री जुगलप्रिया जी

    हे सखी, मुझे तो परम धन युगल नाम (राधाकृष्ण) ही अच्छा लगता है। संसार की समस्त सुख-संपत्ति झूठी है, यह न हमारे संग जन्म से आयी है न मृत्यु के बाद संग जाएगी।

  7. बगुला भक्तन सों डरिये री - श्री जुगलप्रिया जी

    बगुला भक्तों (ढोंग एवं पाखंड करने वाले भक्तों) से डरना चाहिए । जिस प्रकार एक बगुला एक पैर पर खड़ा रहता है, ऐसा प्रतीत होता है मानो वह एक पैर पर खड़ा होकर ध्यान कर रहा है, परंतु जैसे ही मछली उसके पास जाती है, वह तुरंत उस पर झपटा मारता है, और उस दीन मछली को अपना शिकार बना लेता है ।

  8. जय राधे, श्रीकुञ्ज बिहारिनि - श्री जुगलप्रिया जी

    हे कुञ्ज बिहारिणी श्री राधा, आपकी जय हो, मुझे शीघ्र श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये । वहाँ के लता-वृक्ष, यमुना जल, रज तथा सत्संग के रंग में मैं भीग जाऊंगा ।

  9. वृन्दावन अब जाय रहूँगी विपति न सपनेहुँ जहाँ लहूँगी - श्री जुगलप्रिया जी

    अब मैं श्री वृंदावन धाम में ही जाकर रहूँगी, जहाँ उन्मत्त भाव से भजन करूँगी और दुःखमय संसार का चिंतन सपने में भी नहीं करूंगी। चाहे कोई कुछ भी कहे या करे, मैं दृढ़ निश्चय के साथ श्री हरि के चरणों का ही आश्रय लूँगी।