स्यामा तू करुना को सागर - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (186)
हे श्यामाजू (श्री राधा)! आप अगाध करुणा की सागर हैं। आपकी दिव्य कान्ति को निहारकर रसिक-चूड़ामणि श्री कुंजबिहारी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
श्रृंगार रस के पद, ग्रंथ श्री रूप सखी जी की वाणी में श्रीरूप सखी जू द्वारा लिखित रस के पदों का संकलन है। रचैयता: श्री रूप सखी
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हे श्यामाजू (श्री राधा)! आप अगाध करुणा की सागर हैं। आपकी दिव्य कान्ति को निहारकर रसिक-चूड़ामणि श्री कुंजबिहारी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
हे प्यारी जू (श्री राधा)! तुम्हारे अनुपम सौंदर्य पर तो मैं सूर्य और चंद्रमा को भी अर्पण कर दूँ। निकुंज महल में सुंदर शय्या पर विराजित तुम्हारे संग प्रियतम की छवि को सदा, एकटक निहारा करूँ — यही मेरी अभिलाषा है।
श्री श्यामा-श्याम होली के आनंदमय रंगों में मग्न हैं, उनकी मोहक दृष्टियाँ प्रेम के रंगों में सराबोर हो रही हैं। कमान-सी टेढ़ी भौहें जल-वृष्टि करने वाली पिचकारी के समान, मधुर मुस्कान से युक्त, नयन-बाणों की वर्षा कर रही हैं।
निधिवन में विराजित “रंग महल” में प्रिया-प्रियतम सुखपूर्वक विलस रहे हैं। आनंद की निधि, श्री हरिदासी सखी, श्यामा-श्याम की केली का नित्य ही अवलोकन कर रही हैं।
मेरी श्यामा जू नित्य विहार में अति शोभायमान हैं । उनके संग नित्य ही कुंज बिहारी भी शोभायमान हैं जो श्री श्यामा जू के रस में सदा मगन रहते हैं । [1]
मेरी स्वामिनी कुँजबिहारिनी श्री राधारानी हैं, जिन्हें कुंजबिहारी श्री कृष्ण बड़े हर्ष से लाड़ लड़ाते हैं, जिनके अंग-अंग की छवि की कांति वाणी से परे है।
श्री बाँके बिहारी लाल जो नित्य नयी नयी केली करने वाले ठाकुर हैं वे वृंदावन धाम के मानो चंद्रमा हैं । इनकी विलक्षण रूप माधुरी बहुत सुहावनी लगती है जिसकी उपमा अन्य किसी भी रूप से नहीं की जा सकती ।
रस का स्वाद तो रसिक ही जानता है । अनन्य नृपती ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के संग के बिना श्री प्रिया प्रियतम के इस दुर्लभ प्रेम को कोई कैसे प्राप्त कर सकता है ?
समस्त मंत्रों का मुकुट मणि एवं शिरोमणि मंत्र श्री “राधा” नाम है जो आगम, वेद, पुराण आदि से भी परे है एवं तंत्र भी जिसे त्रिलोक में खोजने का प्रयास कर रहे हैं ।
रंगीली दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण सदा कुंज महल में विराजते हैं एवं नूपुर की दिव्य धवनि उत्पन्न कर अनवरत केलि रस बरसाते हैं।
श्री राधा रूप सौंदर्य से उज्ज्वल हैं। उनका चेहरा 'शरद पूर्णिमा' के चंद्र के समान है, नैंन रतनारे हैं, और तन सुख का सार स्वरूप है ।
हे श्री राधा प्यारी आपके ललित चरणों का श्री श्यामसुंदर भी वंदन करते हैं । आपके वदनारबिंद की दुति पर कोटी कोटी चंद्रमा के प्रदीपन को न्यौछावर किया जा सकता है।
रंगीली श्री राधा भामिनी निकुंज महल में श्री प्रीतम के अंक से अंकित घन और दामिनी के समान अति सुशोभित लग रही हैं ।
मेरी स्वामिनी श्री राधा प्रिय श्याम सुंदर का प्राण आधार है । इनकी गौर श्याम की छवि छबीली एवं अपरम्पार है ।