खग मृग द्रुम सेवत सदा - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (284)
पक्षी, मृग और वृक्ष अपने अति सरस व अलौकिक रूप को धारण करके इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो परम पावन वंशीवट वृन्दावन धाम का सम्राट् होकर शोभायमान हो रहा है।
वंशीवट माधुरी, गौड़ीय संप्रदाय के श्री माधुरीदास द्वारा संकलित ग्रंथ है जिसमें वंशीवट, वृंदावन की माधुरी का वर्णन किया गया है ।
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पक्षी, मृग और वृक्ष अपने अति सरस व अलौकिक रूप को धारण करके इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो परम पावन वंशीवट वृन्दावन धाम का सम्राट् होकर शोभायमान हो रहा है।
जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।
कुँवर (श्यामसुन्दर) नवल कुँवरि (श्रीराधा) के संग यमुना-पुलिन में वंशीवट पर खड़े हैं जहाँ प्रेम-रस की अनंत तरंगें उमड़ रही हैं।
मैं प्रिया-प्रियतम की वंशीवट की उस अद्भुत दिव्य केली लीला को कैसे और कहाँ तक वर्णन करूँ क्योंकि उस रस को वही समझ सकता है जो स्वयं सहचरियों के संग उस लीला-रस में सहभागी होता है।
कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं।
यद्यपि प्रिया-प्रियतम की विहार लीलाओं को हृदय में सदा छुपाकर रखना चाहिए, परंतु मैं जितना-जितना इसे हृदय में छुपाने का प्रयास करता हूँ, वे उतनी ही सहजता से मुख से प्रकट हो जाती हैं।
श्री श्यामाश्याम नवीन फूलों की सेज पर विराजमान हैं, और एक-दूसरे की रूप माधुरी का दर्शन कर रहे हैं तथा एक-दूसरे का फूलों से श्रृंगार कर रहे हैं।
यमुना तट के निकट वंशीवट की भूमि सदा वृक्षों और लताओं से आच्छादित हरिभरी रहती है जहां सर्वदा पिय प्यारी (राधा कृष्ण) नित्य विहार पारायण हैं।
रस से भरे श्री श्यामा श्याम, वंशीवट में स्थित रास मण्डल में मधुर रास नृत्य कर रहे हैं, जहाँ समस्त शोभा का निवास है।
श्री कृष्ण, प्रेम में उन्मत्त होकर, बार बार श्री प्रियाजी जी [श्री राधा] से कहते हैं कि हे प्यारी जू! वंशीवट की अद्भुत शोभा को निहारिये!
दिव्य युगल श्रीराधा-कृष्ण एक-दूसरे की रूप-माधुरी में इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें पृथक करना असंभव है। उनके स्वरूप परस्पर ऐसे एकाकार हो गए हैं कि दो देह होने पर भी वे एक स्वरूप में परिवर्तित हो गए हैं।
विशुद्ध प्रेम की अनुभूति शब्दों की सीमा से परे है। उसे न तो वाणी पूर्णतः व्यक्त कर सकती है और न तर्क समझा सकता है। इस प्रेम की वास्तविक स्थिति या तो प्रेम में डूबे हुए व्यक्ति का मन जानता है या प्रेमी की आँखों से ही झलकता है।
वृंदावन में वंशीवट के नवल निकुंज की शोभा वाणी से कहना असम्भव है क्यूँकि इसके लिए मन का भक्ति से एवं नेत्रों का माधुर्य से ओत प्रोत होना परमावश्यक है ।
वंशीवट की उस अलौकिक मधुरता का वर्णन शब्दों में कैसे किया जाए? यदि उसका बखान करना हो, तो नेत्रों में रस भरकर उसको जिह्वा बनाना होगा (देखने के लिए) और जिह्वा को नेत्र बनाना होगा (आस्वादन करने के लिए)।