वंशीवट माधुरी [श्री माधुरी दास]

वंशीवट माधुरी, गौड़ीय संप्रदाय के श्री माधुरीदास द्वारा संकलित ग्रंथ है जिसमें वंशीवट, वृंदावन की माधुरी का वर्णन किया गया है ।

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. आय निकस ठाड़े भये थकित - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (282)

    जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।

  2. आय कुँवर ठाड़े भये नवल कुंवरि के संग - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (154)

    कुँवर (श्यामसुन्दर) नवल कुँवरि (श्रीराधा) के संग यमुना-पुलिन में वंशीवट पर खड़े हैं जहाँ प्रेम-रस की अनंत तरंगें उमड़ रही हैं।

  3. कहों कहां लों वरनि में वंशीवट की केलि - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (297)

    मैं प्रिया-प्रियतम की वंशीवट की उस अद्भुत दिव्य केली लीला को कैसे और कहाँ तक वर्णन करूँ क्योंकि उस रस को वही समझ सकता है जो स्वयं सहचरियों के संग उस लीला-रस में सहभागी होता है।

  4. कमल से लोइन ललित अति शोभा देत - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)

    कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं।

  5. पिय प्यारी को विहरिवो - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (298)

    यद्यपि प्रिया-प्रियतम की विहार लीलाओं को हृदय में सदा छुपाकर रखना चाहिए, परंतु मैं जितना-जितना इसे हृदय में छुपाने का प्रयास करता हूँ, वे उतनी ही सहजता से मुख से प्रकट हो जाती हैं।

  6. श्यामा श्याम बैठे नव - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (290)

    श्री श्यामाश्याम नवीन फूलों की सेज पर विराजमान हैं, और एक-दूसरे की रूप माधुरी का दर्शन कर रहे हैं तथा एक-दूसरे का फूलों से श्रृंगार कर रहे हैं।

  7. वंशीवट तट निकट भूमि - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (3)

    यमुना तट के निकट वंशीवट की भूमि सदा वृक्षों और लताओं से आच्छादित हरिभरी रहती है जहां सर्वदा पिय प्यारी (राधा कृष्ण) नित्य विहार पारायण हैं।

  8. बार बार रीझि रीझि कहत विहारीलाल - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (287)

    श्री कृष्ण, प्रेम में उन्मत्त होकर, बार बार श्री प्रियाजी जी [श्री राधा] से कहते हैं कि हे प्यारी जू! वंशीवट की अद्भुत शोभा को निहारिये!

  9. सुरझाये सुरझे नहीं उरझ रहे यह रूप - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (148)

    दिव्य युगल श्रीराधा-कृष्ण एक-दूसरे की रूप-माधुरी में इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें पृथक करना असंभव है। उनके स्वरूप परस्पर ऐसे एकाकार हो गए हैं कि दो देह होने पर भी वे एक स्वरूप में परिवर्तित हो गए हैं।

  10. प्रेम अटपटी बात कछु - श्री माधुरी दास जी, वंशीवट माधुरी (246)

    विशुद्ध प्रेम की अनुभूति शब्दों की सीमा से परे है। उसे न तो वाणी पूर्णतः व्यक्त कर सकती है और न तर्क समझा सकता है। इस प्रेम की वास्तविक स्थिति या तो प्रेम में डूबे हुए व्यक्ति का मन जानता है या प्रेमी की आँखों से ही झलकता है।

  11. शोभा नवल निकुंज की - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (27)

    वृंदावन में वंशीवट के नवल निकुंज की शोभा वाणी से कहना असम्भव है क्यूँकि इसके लिए मन का भक्ति से एवं नेत्रों का माधुर्य से ओत प्रोत होना परमावश्यक है ।

  12. वंशीवट की माधुरी जो कहिये कछु बैन - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (230)

    वंशीवट की उस अलौकिक मधुरता का वर्णन शब्दों में कैसे किया जाए? यदि उसका बखान करना हो, तो नेत्रों में रस भरकर उसको जिह्वा बनाना होगा (देखने के लिए) और जिह्वा को नेत्र बनाना होगा (आस्वादन करने के लिए)।