विशिष्ट पद एवं साखी (श्री ललितकिशोरी देव)

विशिष्ट पद और साखी श्री ललित किशोरी जी द्वारा लिखित कुछ विविध पद और सखियाँ हैं, जिन्हें पहले उनके ग्रंथ में प्रकाशित नहीं किया जा सका था, लेकिन बाद में एक अलग संग्रह के रूप में प्रकाशित किया गया था।

16 लेख उपलब्ध हैं

  1. एक राधा ब्रज में बसै - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (714-716)

    एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से विराजमान हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरूप से निकुंजों में नित्य विहार करती हैं, जिन्हें रसिक-शिरोमणि स्वामी हरिदास जी लाड़ लड़ाते हैं।

  2. नित्त सरद नित्त तीज है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (1185)

    जहाँ नित्य ही शरद ऋतु है, नित्य ही तीज का उत्सव है और नित्य ही बसन्त तथा होली का आनंद है। जहाँ प्रतिक्षण युगल की नित्य नई-नई केलि-लीलाएँ होती रहती हैं, जिनके सुख का कभी अंत नहीं होता—वही नित्य वृन्दावन धाम है।

  3. ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)

    श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।

  4. आचारी सौं ठाकुर डरैं - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (113)

    जो केवल नियम-आचार, विधि-निषेध एवं बाहरी रीति-रिवाज में फँसे होते हैं, उनसे ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) दूर ही रहते हैं — उनके पास नहीं आते। परंतु सच्चे प्रेमी रसिक के संग तो ठाकुरजी उमंग में भरकर, रीझ-रीझ कर उन्हें हृदय से लगाते रहते हैं।

  5. तन मन वचननि लाड़िली मेरी जीवन प्रान - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (650)

    मेरे तन, मन और वाणी में पूर्ण रूप से लाड़ली जी (श्री राधा) ही समाई हुई हैं, जो मेरे जीवन की प्राण स्वरूपा हैं। नित्य विहार की सुंदर केली-लीलाओं में सदा लीन होकर, वे कुंज बिहारी के साथ रस-क्रीड़ा में निरंतर मग्न रहती हैं।

  6. मात तात जाके नहीं वृषभानु सुता नहिं नाम - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (686)

    स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में श्री राधा एवं श्री कृष्ण को जन्मादि लीलाओं से पृथक सदा नित्य किशोर माना जाता है। श्री राधा का “वृषभानु दुलारी” आदि नामों से भी कोई सरोकार नहीं माना जाता क्योंकि इस उपासना में उनका कोई माँ-बाप नहीं है, वे सदा निकुंज में नित्य विहार करती हैं। यहाँ श्री कृष्ण का नाम ‘कुंजबिहारी’ है एवं श्री राधा का ‘कुंजबिहारिणी’। यहाँ ब्रज रस के गोप, गोपी, गौ, ग्वाल, मात-पिता आदि से रहित श्यामा-कुंजबिहारी की विशुद्ध निकुंज उपासना ही प्राणों का आधार है।

  7. उत्तम करे सो लाड़िली - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (107)

    श्रीराधा जो कुछ करती हैं, वह सदा परम उत्तम और कल्याणकारी होता है; जबकि हम सीमित बुद्धि वाले जीव केवल मध्यम या स्वार्थयुक्त कर्म ही कर पाते हैं। जो साधक हर परिस्थिति में यह भली भाँति जानकर पूर्ण समर्पण भाव से श्री राधा की इच्छा को ही अपनी इच्छा बना लेता है, वही श्रीहरि का सच्चा प्रियपात्र बनता है।

  8. अवधि प्रेम की लाड़िली अवधि प्रेम की लाल- श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (725)

    श्री लाड़िली जी (श्री राधा) प्रेम की पराकाष्ठा हैं, श्री लाल जी (श्री कृष्ण) भी प्रेम की पराकाष्ठा हैं, एवं श्री ललिता जू भी प्रेम की पराकाष्ठा हैं, जो प्रत्येक क्षण रस बरसाकर निहाल करती रहती हैं।

  9. जैसी एकता प्रिया की ऐसी करे न कोई- श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (108)

    जैसी एकता (घनिष्ठता) श्री प्रिया जी (श्री राधा) प्रदान करती हैं, वैसी और कोई नहीं कर सकता। वे मेरे तन, मन, वचन, एवं चित्त में, रोम-रोम में समाई हुई हैं ।

  10. झूठ झूठ में रची रहै साँचे जानत नाहिं- श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (211)

    जो लोग झूठ, मायिक-प्रपंच में फँसे रहते हैं, वे परम सत्य को कभी नहीं पहचान पाते। ऐसे में, श्री कुंजबिहारिनि लाड़िली (श्री राधा) कैसे उनकी बाँह पकड़कर उनके योगक्षेम का वहन करेंगी?

  11. सुल्लभ तें अति सुलभ है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (271)

    सुलभ से भी अति सुलभ और दुर्लभ से भी अति दुर्लभ—ऐसी हैं मेरी कुंज विहारिणी, श्री लाड़िलीजी (श्री राधा), जो मेरे जीवन का आधार हैं ।

  12. जो कछू कियौ सो लाड़िली - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (106)

    जो कुछ करती हैं वह लाड़ली (श्री राधा) ही करती हैं एवं उनकी इच्छा से ही सब कुछ होता है । लाड़ली की कृपा से ही आगे भी सब कुछ होगा, अत: लाड़ली जी के शरणागत जीव को सदा निश्चिंत रहना चाहिए ।

  13. हाथ हमारे सब कछू, दियौ बिहारिनी बाल - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (645)

    श्री कुंजबिहारिनी जू (श्री राधा) ने हमें सब कुछ प्रदान किया है। वे सदा हमारे अंग-संग रहती हैं और नित्य-विहार की सर्वोच्च केली का प्रेम-रस निरंतर प्रदान करती हैं।

  14. जो तन रहै तो प्रिया भजैं - श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (643)

    श्री प्रिया जी (श्री राधा) से हमारा ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि जब तक यह तन रहेगा, तब तक हम उन्मत्त होकर निकुंज-विहारिणी श्री प्रिया जी का ही अनन्य भजन करेंगे। जब हमारा तन छूट जाएगा, तो प्रकट रूप से श्री प्रिया जी का ही संग प्राप्त होगा। दोनों प्रकार से श्री प्रिया जी हमारे हृदय को अनंत सुख प्रदान करेंगी; हमें तो बस श्री प्रिया जी की ही केलि का नित्य अवलोकन करना है।

  15. जाके हित में लाडिली, ताकौं विघन न कोई - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (651)

    जिसके पक्ष में स्वयं लाडिली जी (श्री राधा) हो जाती हैं, उसके मार्ग में फिर कोई बाधा या विघ्न शेष नहीं रहता। चाहे संपूर्ण संसार ही उसका शत्रु क्यों न बन जाए, फिर भी उसका बाल भी बाँका नहीं हो सकता।

  16. एक राधा ब्रज में बसै, एक राधा रास विलास - श्री ललित किशोरी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (714)

    एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से निवास करती हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरूप से निकुंजों में नित्य विहार करती हैं, जिन्हें रसिक-शिरोमणि स्वामी हरिदास जी लाड़ लड़ाते हैं।