श्री वृन्दावन शतक (श्री लाल बलबीर)

श्री वृन्दावन शतक श्री लाल बलबीर ने अपनी पुस्तक ब्रज विनोद में लिखा है जिनमें वृन्दावन का अद्भुत गुणगान है जिन्हें सौ दोहों एवं पदों में पिरोया गया है।

39 लेख उपलब्ध हैं

  1. यमुना की कूल पै रही हैं द्रुमबेली झूल - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (21)

    श्री धाम वृंदावन में यमुना किनारे वृक्ष एवं लताएँ झूल रही हैं। फूलों से रस टपक रहा है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है।

  2. श्यामा जू की सहचरी - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (19)

    हे श्री ललिता जू, आप श्री श्यामा जू की सहचरी हैं, मैं आपके चरण कमलों की वंदना करता हूँ। श्री राधा की प्रेमपूर्वक चरण सेवा करने के मेरे मन की कामना को पूर्ण करें।

  3. किसोरी राधे विनती करों करजोर - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (56)

    हे किशोरीजी (श्री राधे), अब मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि हे दयानिधि! मुझपर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मेरा मन आपके श्री चरणों में ही नित्य लगा रहे ।

  4. हृदै सरोवर प्रेमजल - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (14)

    हे श्री राधे! मेरे हृदय रूपी सरोवर में प्रेम रूपी जल है जिसमें अगाध सुंदरता वाले तुम्हारे चरण रूपी कमल नित्य खिले हैं जिसमें मेरा मन रूपी भँवर सदा सदा इस कमल [चरणों] के रस का पान करने को व्याकुल है ।

  5. परौ आय द्वार सुनि सुजस अपार चारु - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (36)

    हे श्री राधे, आपका अपार सुंदर यश सुनकर ही मैं आपके द्वार आकर पड़ी हुई हूँ, ऐसा कब होगा कि अब आप मुझे अपनी कृपा की दृष्टि से निहारोगी ?

  6. श्रीराधे जू निबाहे बनेंगी - श्री लाल बलबीर जी, वृन्दावन शतक (58)

    श्री राधा अवश्य ही मुझे अपना मान लेंगी। इस पूरे संसार में मेरे समान दीन कोई नहीं है, अत: परम दयालु स्वामिनी मुझ पर कृपा की दृष्टि अवश्य डालेंगी ।

  7. कासी औ प्रयाग द्वारावती कौं निहार आये - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (64)

    यदि ब्रज में आने का बनाव बन गया और ब्रज को निहार ही लिया, फिर काशी, प्रयाग और द्वारका आदि को निहारने का क्या प्रयोजन?

  8. श्रीराधा मोरी एक अरज चित लावौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (57)

    हे श्री राधा, आपको सब सर्वज्ञ कहते हैं, सुजान शिरोमणि कहते हैं, करुणासिंधु कहते हैं, कृपया मेरी एक विनती को अपने चित्त में धारण कीजिये।

  9. श्रीवृन्दावन चन्द छवि - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (7)

    श्री वृन्दावनचन्द्र की छवि का वर्णन करना असम्भव है; उसकी समता किससे दी जाए? साक्षात् वाणी भी उसके सामने शीश झुका देती है, अर्थात् स्वयं को असमर्थ पाती है।

  10. जे मन मोहन लाड़ले - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (6)

    जो मोहन-लाड़ले श्रीकृष्ण सुर और मुनियों के समूह के मन को मोह लेने वाले हैं, वे ही श्री वृन्दावन-चन्द्र की छवि को देखकर नित्य मोहित रहते हैं।

  11. खेलत हँसत वनराज मैं - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (30)

    जहाँ वृंदावन में श्री प्रिया-प्रियतम नित्य विहार करते हैं, वहाँ अनेक प्रकार के खग मंडली खेलते-हँसते हुए इस वनराज की शोभा बढ़ाते हैं।

  12. जाकौं नेत नेत कहि - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (17)

    जिस अद्वितीय रस को वेद भी "नेति-नेति" कहकर बखान करने में असमर्थ हैं, जिसे स्वयं ब्रह्मा, शंकर आदि ईश्वर भी अपने ध्यान में नहीं ला सकते, जो अत्यंत गूढ़ और रहस्यमय है, और जिसका सुख अनिर्वचनीय है।

  13. बड़े बड़े मुनी ज्ञानी वास हेत ललचानी मती - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (25)

    बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी भी वृंदावन में वास करने के लिए लालायित रहते हैं। यह वही धाम है, जिसे वेदों ने "नेति-नेति" कहकर गाया है, अर्थात जिसकी महिमा का वर्णन वे भी पूर्ण रूप से नहीं कर पाए।

  14. जानें को जतन सों बनौ यहै दाव तेरौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (50)

    हे मन, न जाने कौन से तेरे पुराने यत्न से तेरा यह बनाव बन गया है कि तुझे वृंदावन वास मिल गया है। अब इस वृंदावन के रस को छोड़कर कहीं एक पग भी बाहर न ले जाना।