रसिक विहारी सुकमारी प्रान प्यारी जू कों - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (45)
रसिक बिहारी श्यामसुन्दर की प्राणप्यारी श्री राधा वृंदावन की सजीली छवि का दर्शन करवा रही हैं।
श्री वृन्दावन शतक श्री लाल बलबीर ने अपनी पुस्तक ब्रज विनोद में लिखा है जिनमें वृन्दावन का अद्भुत गुणगान है जिन्हें सौ दोहों एवं पदों में पिरोया गया है।
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रसिक बिहारी श्यामसुन्दर की प्राणप्यारी श्री राधा वृंदावन की सजीली छवि का दर्शन करवा रही हैं।
श्री धाम वृंदावन में यमुना किनारे वृक्ष एवं लताएँ झूल रही हैं। फूलों से रस टपक रहा है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है।
हे श्री ललिता जू, आप श्री श्यामा जू की सहचरी हैं, मैं आपके चरण कमलों की वंदना करता हूँ। श्री राधा की प्रेमपूर्वक चरण सेवा करने के मेरे मन की कामना को पूर्ण करें।
बिना श्री राधिका की दासी बने, उनकी सुखपूर्वक महल टहल किए, ऐसा कौन है जिसने इस बनराज [वृंदावन] का रस प्राप्त किया है?
हे किशोरीजी (श्री राधे), अब मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि हे दयानिधि! मुझपर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मेरा मन आपके श्री चरणों में ही नित्य लगा रहे ।
हे श्री राधे! मेरे हृदय रूपी सरोवर में प्रेम रूपी जल है जिसमें अगाध सुंदरता वाले तुम्हारे चरण रूपी कमल नित्य खिले हैं जिसमें मेरा मन रूपी भँवर सदा सदा इस कमल [चरणों] के रस का पान करने को व्याकुल है ।
हे श्री राधे, आपका अपार सुंदर यश सुनकर ही मैं आपके द्वार आकर पड़ी हुई हूँ, ऐसा कब होगा कि अब आप मुझे अपनी कृपा की दृष्टि से निहारोगी ?
श्री राधा अवश्य ही मुझे अपना मान लेंगी। इस पूरे संसार में मेरे समान दीन कोई नहीं है, अत: परम दयालु स्वामिनी मुझ पर कृपा की दृष्टि अवश्य डालेंगी ।
यदि ब्रज में आने का बनाव बन गया और ब्रज को निहार ही लिया, फिर काशी, प्रयाग और द्वारका आदि को निहारने का क्या प्रयोजन?
हे श्री राधा, आपको सब सर्वज्ञ कहते हैं, सुजान शिरोमणि कहते हैं, करुणासिंधु कहते हैं, कृपया मेरी एक विनती को अपने चित्त में धारण कीजिये।
श्री वृन्दावनचन्द्र की छवि का वर्णन करना असम्भव है; उसकी समता किससे दी जाए? साक्षात् वाणी भी उसके सामने शीश झुका देती है, अर्थात् स्वयं को असमर्थ पाती है।
बार बार रसिक संतों की संगति में आया कर, एवं सदा उनके चरण कमलों में शीश को झुकाया कर।
जो मोहन-लाड़ले श्रीकृष्ण सुर और मुनियों के समूह के मन को मोह लेने वाले हैं, वे ही श्री वृन्दावन-चन्द्र की छवि को देखकर नित्य मोहित रहते हैं।
जहाँ वृंदावन में श्री प्रिया-प्रियतम नित्य विहार करते हैं, वहाँ अनेक प्रकार के खग मंडली खेलते-हँसते हुए इस वनराज की शोभा बढ़ाते हैं।
हे कुंवर किशोरी, गोरी, करुनानिधि भोरी सरकार, कृपया मुझे वृंदावन का वास दीजिए ।
जिस अद्वितीय रस को वेद भी "नेति-नेति" कहकर बखान करने में असमर्थ हैं, जिसे स्वयं ब्रह्मा, शंकर आदि ईश्वर भी अपने ध्यान में नहीं ला सकते, जो अत्यंत गूढ़ और रहस्यमय है, और जिसका सुख अनिर्वचनीय है।
गृह सुख एवं जगत के फंदों को त्याग कर युगल चरणों से प्रीति कर श्री वृंदावन चंद में वास करना चाहिए
बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी भी वृंदावन में वास करने के लिए लालायित रहते हैं। यह वही धाम है, जिसे वेदों ने "नेति-नेति" कहकर गाया है, अर्थात जिसकी महिमा का वर्णन वे भी पूर्ण रूप से नहीं कर पाए।
हे मन, न जाने कौन से तेरे पुराने यत्न से तेरा यह बनाव बन गया है कि तुझे वृंदावन वास मिल गया है। अब इस वृंदावन के रस को छोड़कर कहीं एक पग भी बाहर न ले जाना।
श्री लालबलबीर कहते हैं, "निश्चय करके श्री राधा नाम का अपने ह्रदय से विश्वासपूर्वक जप करो, और असीम आनन्द प्राप्त करो"।