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  1. ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)

    श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।

  2. श्रीराधाचरण प्रधान - श्री नाभादास, भक्तमाल (90)

    श्री हित हरिवंश जी श्री राधा के चरण-कमलों के सुदृढ़ उपासक हैं, अर्थात् उनकी उपासना का मुख्य आधार केवल श्री राधा चरणों की आराधना ही है । वे सदा निकुंज की मधुर केली लीलाओं में संलग्न युगल दंपति की परम खवासी (सेवा) करते हैं ।

  3. विलसत रंग महल सुखरासी - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (169)

    निधिवन में विराजित “रंग महल” में प्रिया-प्रियतम सुखपूर्वक विलस रहे हैं। आनंद की निधि, श्री हरिदासी सखी, श्यामा-श्याम की केली का नित्य ही अवलोकन कर रही हैं।

  4. श्री गरुड़ गोविन्द मंदिर

    छटीकरा के पास स्थित इस स्थान पर श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाएं संपन्न हुई। एक दिन, गायों को चराते समय, श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ लीला करने लगे।

  5. श्री चतुरदासजी की जीवनी

    श्री चतुरदासजी का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में किसी मथुरिया चतुर्वेदी परिवार में भाद्र शुक्ल 6, 1753 को हुआ था।

  6. राधैवेष्‍ट: संप्रदायैक कर्ताचार्यो राधा - श्री हरिलालव्यास जी, रस कुल्य टीका, मंगलाचरण

    श्री राधा ही जिनकी इष्ट हैं, श्रीराधा ही जिनके सम्प्रदाय की एकमात्र प्रवर्तक आचार्य हैं, जिनकी मंत्रदाता सद्गुरू श्रीराधा ही हैं, जिनका मंत्र भी श्रीराधा ही है, श्रीराधा चरण-कमल-प्रधान उन श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु जी की मैं वन्दना करता हूँ ।

  7. श्री गुणमंजरीदास (श्री गल्लू गोस्वामी) जी की जीवनी

    माध्वगौड़ेश्वराचार्य परम सन्त पूज्य पाद गोस्वामी श्री गल्लू जी महाराज के पिता का नाम श्रीरमण दयालजी महाराज था । श्री गल्लू जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी सन् 1827 में हुआ था । इनके एकमात्र पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी जी हुये । श्रीराधाचरण जी की माँ का नाम श्रीमती सूर्यादेवी गोस्वामी था ।

  8. सूर कुटी, रुनकता

    सूर कुटी एक महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थली है । यह वह स्थान है जहां प्रसिद्ध भक्त, महाकवि श्री सूरदास जी ने भजन किया था और वल्लभाचार्य जी से दीक्षा प्राप्त की थी ।

  9. श्रीनाथजी प्राकट्य स्थल, गोवर्द्धन

    गोलोक धाम में मणिरत्नों से सुशोभित श्रीगोवर्द्धन है । वहाँ गिरिराज की कंदरा में श्री ठाकुरजी गोवर्द्धननाथजी, श्रीस्वामिनीजी और ब्रज भक्तों के साथ रसमयी लीला करते हैं ।

  10. श्री सहचरिशरण देव जी की जीवनी

    श्री सहचरीशरण देव जी का जन्म 1773 में कश्मीर के अवन्तिपुरी में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था । इनका नाम सखाराम था । इनके पिता का नाम सिखरराम था ।

  11. श्री वल्लभरसिक जी की जीवनी

    श्री वल्लभरसिक जी का जन्म अनुमानतः 1600 के लगभग हुआ है । इनके पिता श्री गदाधर भट्ट जी थे जो एक महान गौड़ीय भक्त हुए हैं । इनके बड़े भ्राता श्री रसिकोत्तंस थे, जिनकी रचना 'प्रेम-पत्तनम्' प्रसिद्ध है ।

  12. श्री लाल बलबीर (बद्रीप्रसादजी) की जीवनी

    वृन्दावन में एक से एक उत्कृष्ट कवि, आचार्य, ज्ञानी, भक्त, रसिक तथा मनीषी हुए हैं ऐसे प्रकृत भक्त कवियों में 'लाल बलवीर' (बद्रीविशाल) का नाम भी उल्लेखनीय है ।

  13. श्री प्रियादास जी की जीवनी 

    भक्त प्रवर श्री प्रियादास जी का जन्म सूरत-नगर के राजपुरा नामक ग्राम में हुआ था। इनका जन्म 1683 से कुछ पूर्व का अनुमानित है।

  14. श्री माधुरीदास जी की जीवनी

    माधुरीदास जी माधुरी कुण्ड के निवासी थे। गान-कला में कुशल थे। गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण के उपासक थे। उज्वल रस के में इनकी प्रीति थी, प्रेमा-भक्ति इनका मार्ग था। अष्टयाम भावना में सदैव तल्लीन रहते थे।

  15. स्वामी श्री भगवत रसिक जी की जीवनी 

    अनन्य रसिकाचार्य श्री स्वामी हरिदास जी की परंपरा में यों तो अनेकानेक समर्पित भक्त और साधक हो चुके, उन सब में श्री भगवतरसिक जी का अपना विशिष्ट महत्व और स्थान है।

  16. श्री हित रामदास जी की जीवनी 

    श्री रामदास जी वछवन ग्राम के निवासी थे जो कि ब्रज चौरासी कोस में इस नाम से विख्यात है। इनका जीवन काल 17th शताब्दी अनुमानित किया गया है।

  17. श्री देवराहा बाबा भजन/समाधि स्थान, वृंदावन

    श्री देवराहा बाबा भजन / समाधि स्थान वृंदावन में यमुना के दूसरी ओर स्थित है। श्री देवराह बाबा भारत के महान योगियों में से एक थे, वे जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य के वंश में ग्यारहवें आचार्य थे।

  18. श्री किशोरदास जी की जीवनी 

    मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।

  19. श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की जीवनी

    श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी महाराज अखिल भारतीय जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठ (सलेमाबाद, किशनगढ़) के एक सुप्रतिष्ठित आचार्य थे। इनकी विद्वत्ता और भक्ति भावना इनकी वाणी के अनुशीलन से स्पष्ट हो सकती है।