balihar
17 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं
विहारिणि तुमरोही विस्तार रहत - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी
हे श्री विहारिणी जी! यह संपूर्ण लीला-विलास और ऐश्वर्य आपका ही विस्तार है। प्रियतम श्री विहारी जी सदा आपके ही रुख (संकेत और इच्छा) की ओर निहारते रहते हैं और उसी के अनुसार अनंत क्रीड़ाओं की रचना करते हैं।
राधे अलबेली सरकार - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (115)
श्री राधारानी अलबेली सरकार हैं — वे सम्पूर्ण वृन्दावन की अधिष्ठात्री महारानी हैं, रसिकों की जीवन-प्राण हैं, परम उदार एवं अत्यन्त सुकुमार हैं।
श्री राधिका माधव छवी अपार - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (18)
श्री राधिका-माधव की शोभा बड़ी ही अद्भुत एवं अलौकिक है। सखियाँ प्रेमपूर्वक उनका श्रृंगार कर आरती कर रही हैं।
संकर्षण-प्रिय-अनुज की, प्रिया प्राण आधार - ब्रज के दोहे
संकर्षण (बलराम) के प्रिय छोटे भाई श्रीकृष्ण की प्रिया (श्रीराधा) ही मेरे प्राणों की आधार हैं। मैं उनके वर देने वाले (कृपा रूप) श्री चरणकमलों पर सदा बलिहारी जाता रहूँ ।
श्री हरिदास अनूप अलि रसिक रूप बलिहार - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (47)
रूप सखी कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी अद्वितीय हैं, मैं उनपर बार बार बलिहार जाता हूँ। वे इक-टक श्यामा कुंजबिहारी के अखंड नित्य विहार को ही अपलक नेत्रों से निहारते रहते हैं।
तनक मान मन में नहीं सब सों राखत प्यार - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (87)
जिसके ह्रदय में तनिक भी मान की चाह न हो, और सब से प्रेम रखे, ऐसे संतों पर मैं बार बार बलिहार जाता हूँ ।
सहज सनेही देहि द्वै - श्री हरिव्यस देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (27)
श्रीराधा-कृष्ण स्वभाव से ही परस्पर प्रेमी हैं और उनका यह दिव्य अनुराग नित्य एवं अखंड है। यद्यपि वे दो शरीरों में आभासित होते हैं, किंतु तात्विक रूप से वे एक ही हैं। मैं नित्य-विहारी युगल की इस अखंड विहार-लीला पर स्वयं को निछावर करता हूँ।
देशकाल नहिँ नियम कछु नहिँ कछु शिष्टाचार - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (41)
मैं उस विलक्षण प्रेम-पंथ पर सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ, जहाँ देश, काल अथवा बाह्य शिष्टाचार का कोई बंधन नहीं है। यहाँ केवल निष्कपट हृदय से निष्काम प्रेम करना ही सर्वस्व है।
नित बिहार गोपाल लाल संग - श्री सूरदास
जगनायक, जगदीश श्री कृष्ण की प्यारी, जगतजननी, जग महारानी, श्री राधा श्री कृष्ण के संग श्री वृन्दावन राजधानी में नित्य विहार लीला परायण हैं ।
चातुरी पांच गौर सरकार - श्री कृपालु जी महाराज, श्री राधा त्रयोदशी (5)
गौरांगी स्वामिनी राधा पांच प्रकार की दक्षता से पूर्ण हैं। प्रथम दक्षता तो नृत्य-काल में उनके भ्रूनर्तन की है, जिसे देखकर उनके रसिक प्रियतम उन पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हैं। दूसरी दक्षता उनके तिरछे कटाक्षपातों की है जो प्रियतम के हृदय को घायल करने के लिए बरछी का कार्य करते हैं।
श्रीराधा राधा नाम की रटना जिनके सार - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (22)
जिनके जीवन का सार “श्री राधा-राधा” नाम का भजन है, ऐसे रसिक जनों पर मैं नित्य बलिहार जाता हूँ।
बिहरें बिपिन बिहारी बिहारनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (79)
सुन्दर शिरोमणि परम सुकुमार श्रीप्रियाप्रियतम वृन्दाविपिन में विहार कर रहे हैं। दिव्य प्रम-सौन्दर्य से ओतप्रोत उनके अंग-प्रत्यंग पर कोटि-कोट कामदेव न्यौछावर हैं।
एक नज़र कृपा की करदो लाडली श्री राधे - श्री चन्द्रसखी जी
हे श्रीराधा, मुझ पर भी एक कृपा की दृष्टि डालिए । कृपा अपनी दासी की इस प्रेम भरी आकांक्षा को पूर्ण कर दीजिए ।
अनोखी, वीणा वारी नारि - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, लीला-माधुरी (1)
श्यामसुन्दर वीणा वाली नारी का भेष बनाये हुए हैं । जिनके सोलहों श्रृंगार के माधुर्य को देखकर अनन्त कामदेव की स्त्रियाँ बलिहार जाती हैं। वह अनोखी वीणा वाली नारी ठोढ़ी पर हाथ रखे हुए कुसुम सरोवर पर बैठी हैं।
जाऊँ बलि, जोरी-युगल निहार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (3)
श्यामा-श्याम की जोड़ी को निहार कर मैं बलिहार जाता हूँ । वृषभानुनंदिनी का शरीर गौर वर्ण का है , वे मनमोहन के मन को मोहित करने वाली हैं एवं स्वभावतः भोली हैं ।
जे रसिकन उर नित बसें - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (121)
जिन रसिकों के हृदय में आगम-निगम का सारस्वरूप यह युगल-दम्पति का नित्य-विहार-रस बसा हुआ है, ऐसे रसिकों के श्रीचरणों में बारम्बार बलिहार है।
जय हो जय हो अलबेली सरकार बलिहार बलिहार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (14)
जय हो जय हो अलबेली सरकार बलिहार बलिहार । तेरी महिमा अपरंपार बलिहार बलिहार । तेरी ब्रम्ह करे जयकार बलिहार बलिहार ।