25 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. धन धन वृन्दावन जमुना जल पानी - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (02)

    श्री वृन्दावन में प्रवाहित होती श्री यमुना जी का जल परम धन्य है। जब यमुना जी की लहरें उठकर शरीर का स्पर्श करती हैं, तो वे संचित पापों के घने समूह (परतों) को सहजता से काट देती है।

  2. कोटिन ज्ञानिन मध्य कोउ प्रेम-सुधा-रस पाय - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (28)

    करोड़ों ज्ञानियों में किसी बड़भागी को ही प्रेम सुधा रस प्राप्त होता है । जैसे सनकादि शुकादिक परमहंस ब्रजरस में डूब गये ।

  3. आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (551)

    श्री राधा के शरद पूर्णिमा के चन्द्र के समान मुख को देखकर, श्री कृष्ण के श्री अंगों में आनंद का सिंधु ऐसा उमड़ने लगा कि वह आनंद का समुद्र लहर बनकर ब्रज वृंदावन में बह चला ।

  4. काहे खोजत ब्रह्म को - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (91)

    हे ज्ञानियों! वेद की विविध ऋचाओं में ब्रह्म को निरर्थक क्यों खोज रहे हो? वह तो नंदरानी के आँगन में ऊखल से बँधा हुआ सुलभ है। यदि मेरे वचन पर विश्वास न हो तो स्वयं ब्रज जाकर दर्शन कर लो।

  5. जाकी माया ते नचे, योगी यती महान - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (100)

    जिसकी माया से बड़े-बड़े योगी एवं मुनींद्र भी नाचते (काँपते) हैं, उसी ब्रह्म श्री कृष्ण को ब्रज में ब्रजांगनाएँ अपने हाथों की तालियों पर नचा रही हैं।

  6. हमारैं साहिबनी वन रानी - श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (96)

    हमारी साहिबिनी (स्वामिनी) वृंदावन की महारानी श्री राधिका रानी है । जिस नंदनंदन [श्री कृष्ण] का यश वेद पुराण इत्यादि गाते हैं वह उनको भी सुख का दान करने वाली हैं ।

  7. श्री राधिका स्तव - श्री छबीले वल्लभ जी

    रस प्रदायनी अति सुकुमारी श्री राधिका की जय हो। कमल पुष्प के समान कोमल अंगों वाली, प्रेम की खान, श्री श्यामसुंदर की आराधिका की जय हो। श्री कृष्ण की प्राण प्यारी, गौर वर्णा श्री नवल किशोरी जू की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये।

  8. हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज,दैन्य माधुरी (93)

    हमारी निधि तो एकमात्र वृषभानुनन्दिनी श्री राधिका जी हैं, जिनकी भृकुटि – विलास को ब्रह्म श्रीकृष्ण भी नित्य देखते रहते हैं ( जिनकी भौहों के इशारे पर ब्रह्म भी दास बनकर चलता रहता है ।)

  9. रटो रे मन! छिन छिन श्यामा श्याम - प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी

    अरे मन! ‘श्यामा-श्याम’ इस युगल नाम को प्रत्येक क्षण रटता रह। यह श्यामा- श्याम सच्चिदानन्द ब्रह्म के ही दो अभिन्न स्वरूप हैं। अरे मन! इनके नाम को शिव, शुक, सनकादि परमहंस भी निरन्तर गाते रहते हैं।

  10. हमारे, मन भायो ब्रजधाम - जगद्गुरू श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी ( 134)

    हमारे मन को तो एकमात्र ब्रजधाम ही अच्छा लगता है। जहाँ ज्ञानियों की आराध्या देवी मुक्ति भी सदा दासता करती है। चारों मुक्ति ब्रजांगनाओं के अपमान करने पर भी पनिहारिन बनकर जहाँ पानी भरा करती हैं।

  11. हमारी राधे, रसिकनि - जीवन - मूरि - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदीरा, श्री राधा माधुरी (55)

    एक रसिक सखी कहती है कि हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनंदिनी रसिक जनों की जीवन – स्वरूपा हैं | जिनके चरणों की धूल को साक्षात् ब्रह्म श्रीकृष्ण भी चाहते हैं |