धन धन वृन्दावन जमुना जल पानी - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (02)
श्री वृन्दावन में प्रवाहित होती श्री यमुना जी का जल परम धन्य है। जब यमुना जी की लहरें उठकर शरीर का स्पर्श करती हैं, तो वे संचित पापों के घने समूह (परतों) को सहजता से काट देती है।
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श्री वृन्दावन में प्रवाहित होती श्री यमुना जी का जल परम धन्य है। जब यमुना जी की लहरें उठकर शरीर का स्पर्श करती हैं, तो वे संचित पापों के घने समूह (परतों) को सहजता से काट देती है।
प्रिया प्रीतम की यह दिव्य रस रीतिः नित्यविहार रस स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के समान दिव्य और फलदायी है।
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, नंद के पुत्र के रूप में इस संसार में प्रकट हुए। उन्होंने राक्षसों का वध किया और कालिया नाग के सिर पर अपनी छाप छोड़ी।
करोड़ों ज्ञानियों में किसी बड़भागी को ही प्रेम सुधा रस प्राप्त होता है । जैसे सनकादि शुकादिक परमहंस ब्रजरस में डूब गये ।
मेरे ह्रदय की इच्छा है कि मैं सदा श्री वृंदावन में यमुना के किनारे ही विचरण करता रहूँ ।
श्री राधा के शरद पूर्णिमा के चन्द्र के समान मुख को देखकर, श्री कृष्ण के श्री अंगों में आनंद का सिंधु ऐसा उमड़ने लगा कि वह आनंद का समुद्र लहर बनकर ब्रज वृंदावन में बह चला ।
हे ज्ञानियों! वेद की विविध ऋचाओं में ब्रह्म को निरर्थक क्यों खोज रहे हो? वह तो नंदरानी के आँगन में ऊखल से बँधा हुआ सुलभ है। यदि मेरे वचन पर विश्वास न हो तो स्वयं ब्रज जाकर दर्शन कर लो।
जिसकी माया से बड़े-बड़े योगी एवं मुनींद्र भी नाचते (काँपते) हैं, उसी ब्रह्म श्री कृष्ण को ब्रज में ब्रजांगनाएँ अपने हाथों की तालियों पर नचा रही हैं।
अरे मन, श्री वृन्दावन धाम अपार है, तू नित्य ही राधे-राधे जपे जा, राधे राधे जपे जा और राधे राधे भजे जा ।
जहां एक से बढ़कर एक रसिकों के निवास स्थान हैं, जहां एक से बढ़कर एक तत्वज्ञानी रहते हैं।
हमारी साहिबिनी (स्वामिनी) वृंदावन की महारानी श्री राधिका रानी है । जिस नंदनंदन [श्री कृष्ण] का यश वेद पुराण इत्यादि गाते हैं वह उनको भी सुख का दान करने वाली हैं ।
रस प्रदायनी अति सुकुमारी श्री राधिका की जय हो। कमल पुष्प के समान कोमल अंगों वाली, प्रेम की खान, श्री श्यामसुंदर की आराधिका की जय हो। श्री कृष्ण की प्राण प्यारी, गौर वर्णा श्री नवल किशोरी जू की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये।
सनकादिक आदि समस्त ऋषि गण इन्हीं (श्री राधा) का ध्यान करते हैं एवं श्री शेष जी सदा ही इनके यश को गाते रहते हैं।
किसी को शेषनाग पर भरोसा है, कुछ को भगवान सूर्य पर भरोसा है। कुछ को भगवान शिव पर भरोसा है, जो वरदान देने के लिए प्रसिद्ध हैं।
हमारी निधि तो एकमात्र वृषभानुनन्दिनी श्री राधिका जी हैं, जिनकी भृकुटि – विलास को ब्रह्म श्रीकृष्ण भी नित्य देखते रहते हैं ( जिनकी भौहों के इशारे पर ब्रह्म भी दास बनकर चलता रहता है ।)
अरे मन! ‘श्यामा-श्याम’ इस युगल नाम को प्रत्येक क्षण रटता रह। यह श्यामा- श्याम सच्चिदानन्द ब्रह्म के ही दो अभिन्न स्वरूप हैं। अरे मन! इनके नाम को शिव, शुक, सनकादि परमहंस भी निरन्तर गाते रहते हैं।
हमारे मन को तो एकमात्र ब्रजधाम ही अच्छा लगता है। जहाँ ज्ञानियों की आराध्या देवी मुक्ति भी सदा दासता करती है। चारों मुक्ति ब्रजांगनाओं के अपमान करने पर भी पनिहारिन बनकर जहाँ पानी भरा करती हैं।
गोपियों द्वारा ज्ञानी उद्धव को उत्तर: रस की वार्ता नीरस हृदय को नहीं भाती, वह केवल रसिक हृदय से ही समझी एवं ग्रहण की जाती है।
श्री राधा की कृपा से ही शुकदेव ज्ञानी हुए हैं और उन्हीं की कृपा से भगवान शिव भी समाधि को प्राप्त हुए हैं।
एक रसिक सखी कहती है कि हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनंदिनी रसिक जनों की जीवन – स्वरूपा हैं | जिनके चरणों की धूल को साक्षात् ब्रह्म श्रीकृष्ण भी चाहते हैं |