19 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (32)

    कुंज की इस दिव्य रजनी (रात्रि) में प्रियतमा श्री राधा और प्रियतम श्री लाल (कृष्ण) रस-विलास कर रहे हैं। वे मुख से मुख जोड़कर परस्पर प्रेम की क्रीड़ा कर रहे हैं, जहाँ उनके नूपुरों के स्वर और कंगनों की खनक से एक मधुर संगीत उत्पन्न हो रहा है।

  2. डोल झूलें स्यामा स्याम सहेली - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (16)

    हे सखी ! दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम डोल झूल रहे हैं। नव-निकुंज मन्दिर में नवरंगी प्रियतम के संग गर्वोन्मत्त गर्वीली प्रिया विहार कर रही हैं।

  3. नव निकुंज नव भूमि रगमगी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (36)

    नवनवायमान छटा से सुशोभित निकुंजमहल एवं नव-नव शोभा की वृद्धि करती हुई श्रीवन-भूमि नव-नव प्रेम रंग से अभिभूत है। नव-नव सौन्दर्य-माधुरी से संयुक्त लाडिले श्रीबिहारीलाल शरदकालीन रात्रि की आभा से अभिमण्डित हो रहे हैं ।

  4. तट-भुवि कृत-कान्तिः - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.243)

    यमुना के तट पर स्थित होने से ब्रज मंडल के वनों की शोभा और भी बढ़ जाती है, जहाँ भिनभिनाती मधुमक्षिकायें अनंत मधुरता से अलंकृत नव कदम्ब के वृक्षों का आश्रय लेती हैं जो मेरे मन में एक दिव्य भाव उत्पन्न करती है।

  5. श्री माधुरीदास जी की जीवनी

    माधुरीदास जी माधुरी कुण्ड के निवासी थे। गान-कला में कुशल थे। गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण के उपासक थे। उज्वल रस के में इनकी प्रीति थी, प्रेमा-भक्ति इनका मार्ग था। अष्टयाम भावना में सदैव तल्लीन रहते थे।

  6. श्री वृषभानु कुण्ड, बरसना (जल महल)

    वृषभानु कुण्ड, बरसना में स्थित है । यहाँ महाराज वृषभानु जी नित्य स्नानोपरान्त, ब्रजेश्वर महादेव की उपासना के लिए जाते थे, इसे भानोखर भी कहते हैं।

  7. गत्वा कलिन्दतनयाविजनावतार - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (23)

    हे श्री राधे ! श्री यमुनाजी के निर्जन घाट पर जाकर कामदेव को जीवित कर देने वाले आपके अमृतमय श्री अंगों को उबटन लगाती हुई मैं, ऊँचे कदम्ब वृक्ष पर बैठे हुए मग्न नेत्रों वाले आपके नवनागर शिरोमणि (श्रीश्यामसुन्दर) को कब देखूँगी ?

  8. वृन्दावनस्य संयोगात् पुनस्त्वं तरुणी नवा - पद्म पुराण, भागवत माहात्म्य (1.61)

    श्री नारद जी कहते हैं “हे भक्ति, धन्य है ऐसे वृंदावन को, जहाँ पहुँचने पर आपको नव तारुण्य प्राप्त हुआ एवं जहाँ गली-गली घर-घर और प्रत्येक प्राणी के हृदय में ही नहीं, प्रत्येक लता पता की डार और पत्रों पर आप नृत्य कर रहीं हैं।”

  9. मन मेरे भज ले श्री कुंजबिहारी - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (184)

    श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, "हे मेरे मन! तू केवल श्री कुंजबिहारी की महिमा का स्मरण कर। जो समस्त सुखों के सागर हैं, जिनकी झलक सारे ब्रह्मांड में दीप्तिमान है, जो हमेशा श्रीराधा जी के साथ रहते है। जो चारों भुजाएँ(प्रिया प्रियतम की बाहें) वृन्दावन रूपी नव नित्य नवीन निकुंज में हमेशा केलि (लीला) करते रहते है। श्री बिहारी बिहारिन जी, जो जीवन प्राण है उनको लाड लड़ा ।"

  10. प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (130)

    प्रेमोल्लास की चरम सीमा, परम रस( प्रेम) चमत्कार विचित्रता की सीमा, सौन्दर्य्य की अंतिम सीमा, अनिर्वचनीय नवीन वय, रूप एवं लावण्य की सीमा; निजजनों के प्रति परम उदारता एवं वात्सल्यता की सीमा, लीला-माधुर्य्य की सीमा, रति-कला-केलि-माधुरी की सीमा एवं सुख की परम सीमा केवल और केवल श्रीराधा ही सर्वोत्कृष्टता को प्राप्त हैं।

  11. जयति नव नागरी , कृष्ण-सुख-सागरी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (47)

    जयति नव नागरी , कृष्ण-सुख-सागरी , सकल गुन-आगरी , दीनन भोरी ! जयति हरि-भामिनि , कृष्ण-घन-दामिनी , मत्त गज-गामिनी , नव किशोरी !!

  12. नयौ नेह नव रंग नयौ रस - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (५४)

    आज नवल श्याम और नवल वृषभानु किशोरी में (परस्पर) नवीन स्नेह, नवीन आनन्द एवं नया ही रस भर रहा है। यहाँ श्याम सुन्दर का नया पीत पट है तो वहाँ वृषभानु किशोरी की नयी चूनरी । (उस नवल चूनरी को पहिने हुए) गोरी नयी ही नयी बूंदों से भींग रही हैं। जैसा नया, हरा-भरा और मनोहर वृन्दावन है, वैसे ही उसमें नये ही नये चातक, मोर और मयूरियां बोल रही हैं इधर नवल श्याम सुन्दर ने अपनी नयी मुरली में नयी ही गति से नवीन प्रकार का मलार राग छेड़ दिया है, जिसे सुनकर नये नये मेघ भी घिर कर घुमड़ आये हैं। श्रीश्याम सुन्दर के श्री अंगों में नये ही तो आभूषण हैं और सिर पर नया मुकुट विराज रहा है। वे नृत्य में उरप और तिरप नामक गतिया मन्द मंद ले रहे हैं। (इस नवीन सुख एवं समाज को देख कर) श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (प्रीति पूर्वक) अपने मुख से आशीष देते हैं कि यह जोड़ी भूतल (इस लोक में मथुरा मण्डलान्तर्गत प्रकट श्रीवृन्दावन धाम) में क्रीड़ा करती हुई चिरजीवी रहे।)

  13. आजु निकुंज मंजु में खेलत - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (7)

    सुन्दर निकुंज मंदिर में नवल किशोर श्याम एवं नवल किशोरी श्री राधा रस क्रीड़ा संलग्न हैं। दोनों का पारस्परिक अनुराग भी अति अनुपम है। यह अनोखी जोड़ी भूतल (स्थित श्रीवृन्दावन) में ही सुनी एवं देखी जाती है। निकुंज मंदिर की भूमि दिव्य मूँगा स्फटिक आदि नाना मणियों से खचित है। उस मणिमय भूमि पर नव कर्पूर की रज बिखर रही है। सुकोमल नव पल्लव रचित एक शय्या सुशोभित है। उस शय्या पर श्याम सुन्दर ने श्री प्रिया जी को आग्रह पूर्वक विराज मान किया है।

  14. जयति नव नागरी, रूप गुन आगरी - भगवत रसिक जी, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (37)

    नवनागरी किशोरी श्रीराधे, आप रूप और गुणों की खान हैं, सब सुखों की निधि है आपकी जय हो। आप अपार सौंदर्यशालिनी हैं, उज्जवल केली -विलास की कामनाओं से भरी हैं, प्रियतम के मेघ रुपी अंगों से संश्लिष्ट होकर आप दामिनी की तरह दमक रही हैं, हे कुञ्ज बिहारी की प्राणवल्लभे आपकी जय हो। आप परम शोभमयी हैं, श्री बिहारी जी महाराज के मन को भी मोहने वाली हैं आप की जय हो। आप अपने दर्शनों से मेरे नेत्रों को नित्य-निरंतर सुख-लाभ का अवसर देकर मेरी बाधा (आपके दर्शन में आने वाली) को हर लीजिये।

  15. मन करु सुमिरन राधे रानी के चरण - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (57)

    मन करु सुमिरन राधे रानी के चरण। राधे रानी के चरण, नव पल्लव बरन। राधे रानी के चरण, जीवन रसिकन। राधे रानी के चरण, सोइ मेरो प्राणधन।

  16. नव-ग्राम / कुंजर ब्रज - लीला

    लीला स्थल नव-ग्राम, ब्रज में श्री राधा-कुंड के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। इसका वर्तमान नाम कुंजर है। यह श्री राधा कुंड, कुंज की सीमा है।

  17. श्री निकुंज रहस्य-स्तव - श्रील रूप गोस्वामी द्वारा प्रार्थना

    रे मन! तू परम मनोहर कैशोर वयस वाले और मुक्ता फल की छाया की तरह नव-लावण्य के राशि रूप तथा नवायमान श्रृंगाररस में चञ्चल चित्त वाले तथा जिनके नवीन प्रेम ही परम धन है और निधुवन की लीला कौतुक में अत्यन्त चञ्चल श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।