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  1. सेज सुसंपति जुगल रति दंपति - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (45)

    श्रीवृन्दावन के दिव्य निकुञ्ज-भवन में सुन्दर शय्या और समस्त मनोहर रस-सामग्रियों से सुशोभित श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अपनी अनन्य गति, मति और प्रेम को एक-दूसरे में समर्पित कर परस्पर गहन प्रेम में लीन हैं। श्रीवृन्दावन रूपी उनके निज धाम में युगल दंपति के नित्य-बिहार के अलौकिक सुख का निरंतर दर्शन प्राप्त होता है।

  2. गुन रूपकी अवधि राधिका - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)

    गुण और सौंदर्य की पराकाष्ठा श्री राधिकाजू ने रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण का तन, मन, धन, यौवन, आभूषण और प्राण—सब कुछ उनकी प्राणप्रिया श्रीराधाजी के लिए ही समर्पित है।

  3. लता कुंज वृंदा बिपिन बिहरें - श्री सरस माधुरी

    श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।

  4. श्रीललिता-पद भजन दुहेलो बिना - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (33)

    श्री ललिता जी के चरणों की कृपा से प्राप्त होने वाले श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार रस का भजन अत्यंत दुर्लभ और कठिन है। श्री राधारानी की अकारण करुणा के बिना इस अनुपम और निर्मल प्रेमरस का स्पर्श भला कोई कैसे कर सकता है?

  5. ललित सरोवर ललित वन ललना लाल समेत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (17)

    अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।

  6. जुव कवनी वैस किसोर दोऊ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

    सुन्दर युगल-किशोर, श्रीश्यामा-श्याम सघन निकुंज से निकलकर एक साथ खड़े हुए हैं। दोनों के तन एक-दूसरे के तन में समाए हुए हैं और दोनों के मन एक-दूसरे के मन में सुशोभित हो रहे हैं। दोनों ओर से उनकी छवि ऐसी बढ़ रही है, मानो दामिनी और नव मेघ सुशोभित हैं।

  7. श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    श्री वृन्दावन धाम पूरी तरह से श्री राधाजी के स्वरूप से ओत-प्रोत है, जहाँ प्रतिदिन, हर क्षण और आठों पहर निरंतर केवल 'राधा-राधा' नाम का ही संकीर्तन होता रहता है।

  8. पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)

    प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।

  9. आरति आनि सहचरिज साजी मनिमय - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)

    सहचरियों ने आकर प्रियालाल की अद्भुत आरती सजाई है, जिसमें मन रूपी थाल है, प्रेम रूपी बाती है और लाड़िली-लाल को रस-विलास कराने की अनन्त रुचियों का घी और कपूर सुशोभित हो रहे हैं।

  10. हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)

    हमें शास्त्रों की कोई समझ नहीं है और न ही हम उन्हें समझना चाहते हैं। जो लोग इन्हें अब तक नहीं समझ पाए वे आगे भी नहीं समझेंगे, परंतु जिन महापुरुषों ने शास्त्रों के वास्तविक सार को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम केवल उसी का पालन करेंगे।

  11. जाकों दरस अति दुर्लभो परसन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (644)

    जिस नित्य-बिहार का दर्शन अति ही दुर्लभ है और उसका स्पर्श तो परम कठिन है। जिसमें ये साधारण स्वाद के लोभी लोग बेकार ही अपने मन में आशा लगाए बैठे हैं। अर्थात इस नित्य विहार की प्राप्ति के लिए इसका अनन्य उपासक बनना पड़ता है।

  12. कोउ कहै उद्दिम साधि उपाधि - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (14)

    कोई कहता है कि कठिन पुरुषार्थ का साधन करके सांसारिक बाधाओं को दूर करो, किंतु उस अत्यंत गंभीर और अगाध प्रेम-मार्ग की बात को कोई केवल अपने बल पर हृदय में कैसे धारण कर सकता है? कोई चतुरता और युक्तियों पर विचार करने की सलाह देता है, तो कोई इस सत्य को नहीं समझ पाता कि काल के वश में होकर यह अमूल्य जीवन और धन व्यर्थ ही बीता जा रहा है।

  13. बिहरत दोऊ रसिकवर सहज अजन्मा - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (559)

    सहज और अजन्मा रूप वाले दोनों श्रेष्ठ रसिक निरंतर परस्पर विहार करते हैं। मैं निरंतर एकरस होकर उसी अनुपम केलि का भजन करता हूँ, जो श्री हरिदासी पद्धति की अत्यंत विलक्षण और अद्वितीय क्रीड़ा है।

  14. आज समाज सहज मन भायौ - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (65)

    आज रंग महल की सहचरी-समाज का यह रस स्वाभाविक रूप से मन को बहुत प्रिय लग रहा है, जहाँ गौर वर्ण वाली अत्यंत भोली सुकुमारी किशोरी श्रीराधा ने श्री कृष्ण को देखकर हर्षित होते हुए उन्हें गले से लगा लिया है।

  15. पुनि बैठी कुंज-महल मैं संग - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (65)

    फिर श्रीराधा श्यामसुन्दर को अपने साथ लेकर कुंज-महल में विराजित हो गईं। वे दोनों परस्पर गले में बाँहें डालकर तकिये के सहारे लेटे हुए हैं, जहाँ उनके अंगों के स्पर्श और आलिंगन से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो साक्षात् कामदेव ही सुशोभित हो रहा हो।

  16. लेत परस्पर अंग सुवास मन - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (19)

    श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर एक-दूसरे के अंगों की दिव्य सुगंध का रसास्वादन कर रहे हैं, जिससे उनके मन में अलौकिक प्रेम-काम की तरंगें उठ रही हैं और इस दिव्य रस के अतिरिक्त उन्हें अन्य किसी भी बाहरी वस्तु का भान नहीं है।

  17. द्वै द्वै बाँह सिलह सजैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (643)

    जैसे जगत में साधारनतया दोनों हाथों में ही हथियार को सजाया जाता है, वैसे ही साधक समाज नाना प्रकार के साधन-बल का भरोसा अपने मन में रखते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि मेरे तो एक ही हाथ स्वरूप नित्यबिहार का ही अनन्य भाव से भजन, नित्य-विहार की ही लालसा सदा-सर्वदा बनी है।

  18. लगी समाधि बिहार की छुटै - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (319)

    श्री हरिदासी (स्वामी श्री हरिदास जी) के निकुंज-धाम में श्री गौर-श्याम (श्री राधा-कृष्ण) सदैव निरंतर विहार करते रहते हैं। इस दिव्य युगल-विहार की ऐसी अखंड समाधि लग गई है, जो दिन-रात कभी भी भंग नहीं होती है।

  19. वृन्दावने नन्दित कृष्णचन्द्र - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.14)

    जिस श्रीवृन्दावन में श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दपूर्वक नित्य विहार करते हैं और जहाँ निरालस काम-विलास-लीलाओं का अखण्ड समूह विद्यमान है, वहाँ मेरा मन श्रीराधा महारानी के चरण-कमलों पर गुंजार करने वाली भ्रमरी के समान सदा अनुरक्त रहे।

  20. छिन-छिन हैं नव लाड़ली करिये - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा

    क्षण-क्षण नित्य नवीन रहने वाली श्री लाड़ली जी और प्रियतम श्यामसुन्दर निरंतर दिव्य रास-क्रीड़ा का विलास करते रहें। आप दोनों का यह परम निर्मल और श्रेष्ठ प्रेम नित्य नवीन भाव से दिव्य रस और आनंद से सदैव परिपूर्ण बना रहे।