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  1. रूप-सरोवर लाडिली फूले सहज सरोज - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (12)

    हमारी लाडिलीजी (श्री राधा) साक्षात् रूप-सौंदर्य का अथाह सरोवर हैं, जिसमें उनके विभिन्न अंग — दो हस्तकमल, दो चरण कमल, एक नाभि कमल, दो नयन कमल, एक मुख कमल और उन्नत उरोज कमल — ये दस कमल, सदा सहज खिले रहते हैं।

  2. रस मत्त बिहारिनि प्यारी है - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (69)

    श्री कुंजबिहारिन (श्री राधा) प्यारी प्रेमोन्माद में उन्मत्त रहती हैं। उनका रूप अद्भुत उज्ज्वलता से युक्त है; केवल थोड़ी सी दृष्टि से निहारने मात्र से ही श्री कृष्ण उनके अधीन हो जाते हैं।

  3. राधा कृष्ण सरोवर जुगल गोवर्धन नैना - श्री मनोहर दास, रसिक कर्णाभरण (356)

    गिरिराज गोवर्धन की दोनों आँखें श्री राधा कुंड और श्री श्याम कुंड रूपी दो युगल कुंड हैं। इनकी ऐसी दिव्य महिमा है कि ये साक्षात प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) के ही स्वरूप हैं। इनकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती।

  4. बाद ग्राम, मथुरा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य स्थल

    मथुरा में स्थित बाद ग्राम राधावल्लभ संप्रदाय प्रवर्तक श्री हित हरिवंश महाप्रभु की जन्म भूमि है। इसलिए यह स्थान राधावल्लभ सम्प्रदायानुगत वैष्णवों के लिए एक तीर्थ स्थान है।

  5. प्यारी तेरौ बदन चंद देखैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (57)

    लालजी (श्री कृष्ण) श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, आपके चन्द्र वदन को देखकर मेरे हृदय रूपी सरोवर में चाह रूपी कमल प्रफुल्लित हुई है।

  6. सूर कुटी, रुनकता

    सूर कुटी एक महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थली है । यह वह स्थान है जहां प्रसिद्ध भक्त, महाकवि श्री सूरदास जी ने भजन किया था और वल्लभाचार्य जी से दीक्षा प्राप्त की थी ।

  7. स्यामा स्याम सरूप सर परि स्वार्थ बिसरयौ जु - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2)

    जिस साधक के मन को श्री वृंदावन धाम रूपी आनंद-मेघ ने अपने वश में कर लिया है, वह सहज ही युगल किशोर श्री श्यामा-श्याम के रूप-रस-सागर में अपनी समस्त सुध-बुध भुलाकर निमग्न हो जाता है।

  8. प्रेम सरोवर प्रेम सों पूरन परम रसाल - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (25)

    बरसाना स्थित प्रेम-सरोवर प्रेम से पूर्ण और परम रसाल है, जहाँ श्री राधा-कृष्ण के प्रेमाश्रु प्रवाहित हुए थे। उस दिव्य जल के तनिक से भावपूर्ण स्पर्श से साधक के हृदय में प्रिया-लाल बस जाते हैं।

  9. बहुलावन कुण्ड

    बहुलावन नामक पाँचवाँ वन है, जहाँ स्नान करने वाला अग्निलोक को सहज ही प्राप्त कर लेता है ।

  10. सुरत सरोवर, समर जल, उठत कटाच्छ तरंग - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (15)

    इस नित्य-विहार के सरोवर में विशुद्ध प्रेममयी केलि का रस भरा है। इसमें कटाक्षों की तरंगें उठ रही हैं और अद्भुत रंग के अठारह कमल खिले हुए हैं। किशोरीजी के श्री-अंगों के दस कमल (दो हस्त, दो चरण, दो नयन, दो उरोज, एक नाभि और एक मुख) और लालजी के श्री-अंगों के आठ कमल (दो हस्त, दो चरण, दो नयन, एक नाभि और एक मुख) मिलकर अठारह कमल हो गए हैं।

  11. श्रीजमुना जी वा पार है मान सरोवर स्वक्ष - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (87)

    श्री यमुना जी के उस पार अत्यंत निर्मल और पावन मान सरोवर स्थित है। यहाँ गंगा और यमुना का मिलन साक्षात् प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।

  12. हृदै सरोवर प्रेमजल - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (14)

    हे श्री राधे! मेरे हृदय रूपी सरोवर में प्रेम रूपी जल है जिसमें अगाध सुंदरता वाले तुम्हारे चरण रूपी कमल नित्य खिले हैं जिसमें मेरा मन रूपी भँवर सदा सदा इस कमल [चरणों] के रस का पान करने को व्याकुल है ।

  13. रूप के सरोवर में अली कुमुदावली हैं - श्री चन्द्रलाल गोस्वामी, भावना पच्चीसी

    गोस्वामी चन्द्रलाल जी कहते हैं, "रूप के उस दिव्य सरोवर में सखीगण मानो श्वेत कमल की कलियाँ हैं, श्री कृष्ण चकोर हैं, और श्री राधा का मुख कमल जैसे चंद्रमा है, जिसे देखकर और रस का पान कर श्री कृष्ण जीवित हैं।"

  14. श्री किशोरदास जी की जीवनी 

    मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।

  15. श्री कुम्भनदास जी की जीवनी

    श्रीकुम्भनदास जी का जन्म 1499 की चैत्र कृ० 11 को गोवर्द्धन के पास जमुनावता नामक ग्राम में हुआ था। आप गौरवा क्षत्रिय थे।

  16. श्री पीताम्बर देव जी की जीवनी

    नारनौल ग्राम में सांझापुर नामक स्थान है जहाँ एक गौड़ ब्राम्हण कुल के धर्मात्मा रहते थे जिनका नाम श्री चौबेलाल था। ये वेद शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे तथा बहुत धनवान भी थे। इनका वंश चौबे नाम से विख्यात था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।

  17. आदि बद्रीनाथ धाम, ब्रज

    श्री कृष्ण के धाम जाते ही कलि का कवल बनने लगी धरा। कलि के 260 वर्ष पश्चात् देवर्षि नारद जी ने जब भक्ति ज्ञान वैराग्य को जर्जर अवस्था में देखा तो उन्हें वेद ध्वनि, गीता पाठ सुनाया पर इससे भी ज्ञान-वैराग्य की अचेतावस्था को दूर न कर सके तो यहाँ बदरीवन में आये हैं।

  18. अनोखी, वीणा वारी नारि - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, लीला-माधुरी (1)

    श्यामसुन्दर वीणा वाली नारी का भेष बनाये हुए हैं । जिनके सोलहों श्रृंगार के माधुर्य को देखकर अनन्त कामदेव की स्त्रियाँ बलिहार जाती हैं। वह अनोखी वीणा वाली नारी ठोढ़ी पर हाथ रखे हुए कुसुम सरोवर पर बैठी हैं।