तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)
हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? मैं किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और दूसरों के हाथों अपने-आप को क्यों बेचूँ, अर्थात् किसी अन्य का आश्रय क्यों लूँ?
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हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? मैं किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और दूसरों के हाथों अपने-आप को क्यों बेचूँ, अर्थात् किसी अन्य का आश्रय क्यों लूँ?
प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।
मैं परम अज्ञानतावश संसार-रूपी गहरे भव-कूप में गिरा पड़ा था। परंतु मेरी परम कृपालु श्रीराधा जू ने अपनी करुणामयी भुजाओं से मुझे वहाँ से निकालकर, अपने निज धाम श्रीवृन्दावन की शीतल शरण में पहुँचा दिया।
जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।
‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।
यदि किसी ने श्री राधा के चरण-कमलों की रज की सम्यक उपासना नहीं की और श्री वृन्दावन की उस पावन रज का आश्रय नहीं लिया जो उनके चरण-चिह्नों से अंकित है; तथा श्री राधा को नित्य लाड़ लड़ाने वाले वृन्दावन के प्रेमी-रसिकों का सत्संग नहीं किया, तो उसके लिए श्री श्यामसुन्दर रूपी रस-सागर में अवगाहन करना सर्वथा असंभव है।
भक्ति के पाँच मुख्य रसों में 'श्रृंगार रस' ही सर्वोपरि और उत्तम है। साधक को अपने हृदय में सहचरी भाव धारण कर, उन सुकुमार युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निष्काम सेवा करनी चाहिए।
भगवान हरि से भी बड़ा उनका ‘नाम’ है; हे मूर्ख! तू इस सत्य को स्वीकार करने में संकोच क्यों करता है? इसका प्रमाण देख—मुचकुंद को भगवान ने साक्षात् दर्शन दिए, फिर भी उन्हें आगे तपस्या करने की आज्ञा मिली; अर्थात् दर्शन के बाद भी उन्हें पूर्ण विश्राम नहीं मिला।
सहजोबाई कहती हैं कि यह संसार अगाध भवसागर के समान है, जिसमें अज्ञान का घना अँधकार बरस रहा है। ऐसे अंधकारमय सागर से केवल नाम-रूपी जहाज ही ऐसा साधन है, जो जीव को सुरक्षित रूप से पार उतार देता है।
जो कोई भी श्रीधाम वृन्दावन में वास करता है — चाहे उसके पाप पर्वत के समान भारी क्यों न हों, वृन्दावन के प्रभाव से वे सहज ही नष्ट हो जाते हैं ।
श्री धाम वृन्दावन में श्री कृष्ण की श्री राधा नाम पुकार सुन, एक भक्त चकित होकर पूछता है - यह कौन है जो श्री धाम वृन्दावन में “राधे राधे” पुकार करता हुआ विचरण कर रहा है?
हे मोहन प्यारे! मेरी सुध लो। हे नंद के दुलारे, प्रियतम प्यारे! तुम्हारे बिना मेरा कोई अन्य नहीं है!
हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए।
वृन्दावन, जो स्वयं प्रिया-प्रियतम का निजमहल है, वहाँ केवल युगल के प्रेम-विलास का रस ही सतत बरसता है। बेगमदास कहते हैं कि सखीभाव के बिना किसी को भी उस रस में प्रवेश नहीं है।
अब मेरा मन श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों में अटक गया है। इस संसार में मैंने अनगिनत जन्म लिए और धर्म-कर्म की उलझनों में भटकता रहा।
जिन रसिकों के हृदय में प्रिया प्रियतम की अनन्य भक्ति है, ऐसे रसिकों के दर्शन का भरपूर लाभ लेकर मन को तृप्त करना चाहिए।
जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।
हे हरि जी! कृपा करके अब मेरी बाँह पकड़िए और मुझे इस संसार रूपी दुख सागर से बाहर निकालिए। इस संसार में मेरा कोई सच्चा हितैषी नहीं है, मैं तो मोह-माया के विशाल जाल में फँस गया हूँ।
चाहे घर में वास करो अथवा वन में, सदा युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण की मानसी सेवा में लीन रहो। श्री सरस माधुरी कहते हैं— “अपने हृदय में सुंदर भाव उत्पन्न करो, सहचरी स्वरूप धारण करो और निकुंज सेवा का परम आनंद प्राप्त करो।”
श्री वृंदावन वास बहुत बड़े सौभाग्य से ही प्राप्त होता है । जिन पर श्री राधा कृपा करती हैं, वे ही संसार को त्यागकर यहाँ आकर वास करता है ।