115 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)

    जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।

  2. भाव अनोखी वस्तु है जो कर जाने कोय - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (5)

    ‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।

  3. श्रीराधा पद कमल रेणु कौ - श्री अनुराग सखी जी

    यदि किसी ने श्री राधा के चरण-कमलों की रज की सम्यक उपासना नहीं की और श्री वृन्दावन की उस पावन रज का आश्रय नहीं लिया जो उनके चरण-चिह्नों से अंकित है; तथा श्री राधा को नित्य लाड़ लड़ाने वाले वृन्दावन के प्रेमी-रसिकों का सत्संग नहीं किया, तो उसके लिए श्री श्यामसुन्दर रूपी रस-सागर में अवगाहन करना सर्वथा असंभव है।

  4. पंच रसन में मुख्य है उत्तम रस श्रृंगार - श्री सरस माधुरी

    भक्ति के पाँच मुख्य रसों में 'श्रृंगार रस' ही सर्वोपरि और उत्तम है। साधक को अपने हृदय में सहचरी भाव धारण कर, उन सुकुमार युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निष्काम सेवा करनी चाहिए।

  5. है हरि तें हरिनाम बड़ेरो - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (15)

    भगवान हरि से भी बड़ा उनका ‘नाम’ है; हे मूर्ख! तू इस सत्य को स्वीकार करने में संकोच क्यों करता है? इसका प्रमाण देख—मुचकुंद को भगवान ने साक्षात् दर्शन दिए, फिर भी उन्हें आगे तपस्या करने की आज्ञा मिली; अर्थात् दर्शन के बाद भी उन्हें पूर्ण विश्राम नहीं मिला।

  6. सहजो भवसागर बहै तिमिर बरस घर घोर - श्री सहजो बाई

    सहजोबाई कहती हैं कि यह संसार अगाध भवसागर के समान है, जिसमें अज्ञान का घना अँधकार बरस रहा है। ऐसे अंधकारमय सागर से केवल नाम-रूपी जहाज ही ऐसा साधन है, जो जीव को सुरक्षित रूप से पार उतार देता है।

  7. जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै - श्री हित दामोदर दास, फुटकर वाणी (172)

    जो कोई भी श्रीधाम वृन्दावन में वास करता है — चाहे उसके पाप पर्वत के समान भारी क्यों न हों, वृन्दावन के प्रभाव से वे सहज ही नष्ट हो जाते हैं ।

  8. कौन फिरत या विपिन राज में राधे राधे कहि टेरत - श्री लछिराम

    श्री धाम वृन्दावन में श्री कृष्ण की श्री राधा नाम पुकार सुन, एक भक्त चकित होकर पूछता है - यह कौन है जो श्री धाम वृन्दावन में “राधे राधे” पुकार करता हुआ विचरण कर रहा है?

  9. अहो नवलाल पिय विनय सुन लीजिये - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए।

  10. वृन्दावन निज धाम में, इक रस युगल विलास - श्री बेगमदास (शुक संप्रदाय के रसिक भक्त)

    वृन्दावन, जो स्वयं प्रिया-प्रियतम का निजमहल है, वहाँ केवल युगल के प्रेम-विलास का रस ही सतत बरसता है। बेगमदास कहते हैं कि सखीभाव के बिना किसी को भी उस रस में प्रवेश नहीं है।

  11. अब मन युगल चरन में अटक्यो - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    अब मेरा मन श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों में अटक गया है। इस संसार में मैंने अनगिनत जन्म लिए और धर्म-कर्म की उलझनों में भटकता रहा।

  12. प्यारी प्रीतम को सदा जिनके उरमें भाव- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (14)

    जिन रसिकों के हृदय में प्रिया प्रियतम की अनन्य भक्ति है, ऐसे रसिकों के दर्शन का भरपूर लाभ लेकर मन को तृप्त करना चाहिए।

  13. जाकी कृपा सों नित्य दिव्य ब्रजमंडल माँहि - श्री गिरिराज गोस्वामी 'अनन्त' (गोकुल)

    जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।

  14. हरि जी बाँह गहो अब मेरी - श्री गुरुछौना जी महाराज

    हे हरि जी! कृपा करके अब मेरी बाँह पकड़िए और मुझे इस संसार रूपी दुख सागर से बाहर निकालिए। इस संसार में मेरा कोई सच्चा हितैषी नहीं है, मैं तो मोह-माया के विशाल जाल में फँस गया हूँ।

  15. गृह बन में जित तित रहो गहो मानसी सेव - श्री सरस माधुरी

    चाहे घर में वास करो अथवा वन में, सदा युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण की मानसी सेवा में लीन रहो। श्री सरस माधुरी कहते हैं— “अपने हृदय में सुंदर भाव उत्पन्न करो, सहचरी स्वरूप धारण करो और निकुंज सेवा का परम आनंद प्राप्त करो।”

  16. जोग जज्ञ तप नेम करि भजै नहीं गोविन्द - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    भले ही कोई योग, यज्ञ, तपस्या अथवा कठोर व्रतों का पालन करता रहे, परंतु यदि उसने श्री गोविंद का डट कर भजन नहीं किया, यदि वह हरि नाम के सुमिरन से वंचित रहा, तो वह कभी भी संसार के बंधनों से मुक्त नहीं हो सकता।

  17. बन्दौं पद पंकज सदा नंदनंदन ब्रजचंद - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (6)

    मैं सदा व्रजचंद्र नंदनंदन श्रीकृष्णचंद्र के चरण कमलों में वंदन करता हूँ, जिनकी कृपा से “राधा शत” (राधा सुधा शतक) का वर्णन कर रहा हूँ, और प्रार्थना करता हूँ कि मैं पुनः इस भवरोग बंधन में न पड़ूँ।