श्रीवृन्दावन सहज जी ललितमाधुरी रूप - श्री ललित माधुरी
श्रीवृन्दावन स्वभाविक रूप से सौंदर्य एवं मधुरता का साकार रूप है जहाँ ललित त्रिभंगी श्री लालजी भामिनी श्री राधा संग नित्य-विहार के अनुपम रस में निमग्न हैं।
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श्रीवृन्दावन स्वभाविक रूप से सौंदर्य एवं मधुरता का साकार रूप है जहाँ ललित त्रिभंगी श्री लालजी भामिनी श्री राधा संग नित्य-विहार के अनुपम रस में निमग्न हैं।
आज ललित त्रिभंगी लाल श्री कृष्ण श्री राधा को झूला झुला रहे हैं । श्री राधा के अंग स्वाभाविक श्रृंगार से केसरी रंग से रंगे चमक रहे हैं, और देह पर पंचरंगी साड़ी सजी है। [1]
मेरे नेत्र श्यामसुंदर के बिना दाम के गुलाम बन गए हैं। इस ग़ुलामी में इन्हें उस कोटि का सुख प्राप्त होता है कि ये मुड़कर मेरी ओर देखते तक नहीं।
मेरा मन गिरिधर श्रीकृष्ण की अद्भुत छवि पर अटक गया है। उनकी ललित त्रिभंगी सुंदर छवि पर पहुँचकर मेरा मन ठहर गया है !
तिरछे मुकुट को धारण किए हुए, और तिरछी वनमाला से ही वे सुशोभित हैं। जिसकी कमर पर तिरछी काछनी सजी हुई है, जिसमें सुख का महासागर निरंतर लहराता रहता है।
सच्चे प्रेमी सदा ही बिना सिर (अर्थात् अहंकार को त्याग) के रहते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रियतम को अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपना सिर भी समर्पित कर दिया है।
श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी कहते हैं कि रस उपासक को भजन आरंभ करने से पूर्व अपने सहज सखी भाव का विचार करना चाहिए। अपने श्री गुरु की कृपा मानकर, अपने मन से उसे नव किशोर अवस्था वाली सहचरी के रूप में अनुभव करना चाहिए।
युगल किशोर श्री राधा कृष्ण होली खेल रहे हैं। उनकी सुन्दर शोभा को देखते ही बनता है, जो नित्य नविन रंगों की वर्षा कर रहे हैं।
श्री राधारमण नट नागर हैं । ललित त्रिभंगी मुद्रा में सुशोभित सुन्दर श्री श्याम जू परम उज्वल रस के सागर हैं।
ललित त्रिभंगी, श्याम वर्ण वाले, सुंदर कटि एवं पीले वस्त्र धारण करने वाले श्री राधारमण लाल ही हमारे साँचे मीत हैं ।
सर्वोकृष्ट श्री वृंदावन धाम पर विराज रही श्री कुंज बिहारिनी श्री राधिका का ही राज है जहां श्री कुंज बिहारी (कृष्ण) राधा रानी की इस आशा से सेवा करते हैं कि श्री बिहारिनी (राधा) जी उनपर भी कृपा की दृष्टि डालेंगीं ।
हे प्यारी राधिके, तुम्हारी चढ़ी हुई भौंह को देखकर ही श्री लाल जी (श्री कृष्ण) त्रिभंगी मुद्रा में आ जाते हैं और अंजन छुवाने के कारण श्याम कहलाते हैं।
आज ब्रज में काले बादल छा गए हैं। बिजली के बार बार चमकने के कारण हृदय में प्रेम की नित्य नई लहरें उठ रही हैं।
हे कुंजबिहारी लाल, मुझे अपना दर्शन प्रदान करो साँवरे । ऐसी कृपा हो कि मेरे दृग तुम्हारे गुणरूप को निहार कर सफल हो जाएँ ।
"मेरा हृदय गिरधर श्री कृष्ण की सुन्दर छवि पर अटका हुआ है। उनकी ललित त्रिभंग मनमोहक चाल एवं उनका सुन्दर चिबुक मेरे ह्रदय में बस गए हैं । [1]
श्री अनन्यअलि जी का जन्म अनुमानतः 1683 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका पूर्वनाम भगवानदास था। इनके घर में पहले से ही श्री राधावल्लभीय उपासना चली आ रही थी।
गुजरात प्रान्त के चिलोत्रा ग्राम में 1496 में श्री कृष्णदास जी का जन्म हुआ था। ये शूद्र वर्ण के थे। कालांतर में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य की कृपा से श्री कृष्णदास जी को श्रीनाथजी की सेवा प्राप्त हुई और ये पद रचना करते तथा श्रीनाथजी को सुनाते।
रीतिकाल की तीन प्रमुख काव्यधाराओं-रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त में घनानन्द अंतिम काव्यधारा के अग्रणी कवि हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिमुक्त घनानन्द का समय सं. 1746 तक माना है।
श्री राधा और श्री कृष्ण की सदा जय हो । श्री राधा: नित्य किशोरी हैं और अंग का वर्ण सुनहरा है । श्री कृष्ण: भक्ति भावना के प्रेम और नागरता से भरपुर, सभी अच्छे गुणों के साथ अति सुंदर सुकुमार ।
श्री राधिका, आपकी आंखें वास्तव में तिरछी हैं जो अमृत से भरी हैं। श्री ललित त्रिभंगी (जो तीन स्थानों नेत्र ,गर्दन और कमर पर मुड़ी हुई है और झुकी हुई है) बिहारी जी उन्हें (श्री राधा) अपने अंक में किया हुआ है।