प्रभु मैं पीछौ लियौ तुम्हारौ - श्री सूरदास, सूरसागर (218)
हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए।
राग सोरठ कुछ ऐसी मजबूत धारणा होने की भावना व्यक्त करती है जिसे आप उस अनुभव को दोहराते रहना चाहते हैं। वास्तव में, निश्चितता की यह भावना इतनी मजबूत है कि आप विश्वास बन जाते हैं और उस विश्वास को जीते हैं। सोरठ का वातावरण इतना शक्तिशाली है, कि अंततः सबसे गैर-जिम्मेदार श्रोता भी आकर्षित हो जाएगा।
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हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए।
हे बाँकें बिहारी जी! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। हे तीनों लोकों के मुकुटमणि प्रभु! आप सदैव से ही दीन-दुखियों की लाज रखते आए हैं। हे स्वामी! जो भी जीव आपकी शरण में आया, आपने उसे अपनी परम पावन ठौर (शरण) प्रदान की है।
मेरा मन वृषभानु की दुलारी, श्री राधा में रम गया है। वे माता कीर्ति के कुल का गौरव बढ़ाने वाली, समस्त दुखों का नाश करने वाली और श्रेष्ठ बरसाने में वास करने वाली हैं। वे गौर वर्ण की हैं और भोली छवि वाली हैं जो सदा किशोर अवस्था में रहती हैं, जिनकी टेढ़ी भौंहें और तीखे नेत्र अत्यंत चित्ताकर्षक हैं।
हे मानिनी (श्री राधा)! कृपा कर अब आप अपने मान को त्याग दीजिए। आपके प्रियतम चतुर श्यामसुन्दर अत्यंत व्याकुल मन से आपके सम्मुख खड़े हैं।
एक बार मीराबाई ने तुलसीदास जी से पूछा — “मेरे परिवारवाले भजन-मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं, मुझे क्या करना चाहिए?” इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास जी ने यह पद रचकर उन्हें भेजा। जिसको भगवान राम प्रिय न हों अर्थात् जिसका भगवान से प्रेम न हो, भले ही वे हमारे अत्यन्त स्नेही क्यों न हों, फिर भी उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए।
हे मोहन प्यारे! मेरी सुध लो। हे नंद के दुलारे, प्रियतम प्यारे! तुम्हारे बिना मेरा कोई अन्य नहीं है!
मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो।
हे लाड़िली जी (श्री राधा)! मेरा मन सदैव आपके दर्शन के लिए लालायित रहता है। कृपा करके ऐसा वरदान दें कि मैं नित्य निरंतर बरसाने में वास करूँ और नित्य प्रति आपके मुखारविंद के दर्शन से अपने नेत्रों को तृप्त करता रहूँ।
रसिकवर श्रीस्वामी हरिदासजी की सदा जय हो, जिन्होंने इस धराधाम पर अवतार लेकर ऐसा अनुपम अनन्य धर्म प्रकट किया, जिससे विधि-निषेधात्मक शुभ और अशुभ कर्म कांप उठे हैं।
हे श्री राधारानी! मेरे हृदय की इच्छा को कब पूर्ण करोगी? कब मैं निर्भय होकर केवल श्री वृंदावन धाम की रज का नित्य सेवन करूँगा (अर्थात् कब वृंदावन वास करूँगा) ।
हे सखियों! आज की कैसी अद्भुत शोभा बनी है। प्रीतम श्री कृष्ण के मस्तक पर तो मोर मुकुट शोभा दे रहा है और प्रियाजी श्री राधा ने सुंदर लहरिया की सारी पहन रखी है।
आज, श्री राधा प्यारी जू का झूला बहुत सुंदर ढंग से शोभायमान है। उनका रंगीन लहंगा और चुनरी कंचुकी की सुंदरता अद्वितीय है।
रंग महल में रंग बरस रहा है। दोनों श्री श्यामाश्याम उत्सुकता से बढ़-चढ़कर तान ले रहे हैं और सरस नृत्य कर रहे हैं।
हे स्वामिनीजू, मुझे कब आप अपनाओगी! हे श्री वृंदावन की महारानी, प्रीतम को सुख प्रदान करने वाली श्री राधे! कब मुझे अपनी राजधानी श्री धाम वृंदावन में वास प्रदान करोगी?
वृषभानु नंदिनी श्री राधा की जय, श्री कीरति की राजदुलारी की जय।
अरे मन, श्री राधिका के चरण कमलों का ध्यान कर जिनकी सेवा रसिक चूड़ामणि भगवान श्री कृष्ण भी सदा करते हैं ।
करुणा की निधि कुँवरी लड़ैती (श्री राधा) की जय हो ; अलबेली सरकार की जय हो । रस की निधि, गुण की निधि, दया की निधि, अपार कृपा की समुद्र की जय हो ।
हे नवनागर लाल पिय [श्री कृष्ण], मेरी यह विनती सुन लीजिए! मुझे श्री धाम वृंदावन का वास प्रदान कर, कुंजों की महल टहल जैसे सोहनी सेवा आदि देकर कृतार्थ कीजिए ।
श्री कृष्ण कहते हैं, हे लड़ैती जू [श्री राधिका]! कृपया मुझपर अपनी कृपा दृष्टि कीजिये । आप गुणों की एवं सुख की सागर हो, कृपया मेरी विनती सुनें ।
अद्बुत “श्री राधे” नाम मुझे अति ही सुहाता है । "श्री राधे" नाम नित्य ही भगवान श्री हरि, शंकर एवं ब्रह्मा जी द्वारा रटन किया जाता है एवं वेद पुराण भी इसी नाम का गुणगान करते हैं ।