श्री अली माधुरी

श्री अली माधुरी निम्बार्क सम्प्रदाय के वृंदावन के एक रसिक संत हैं।

37 लेख उपलब्ध हैं

  1. भुजा परस्पर अंश दे - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।

  2. विहारिणि सर्वोपरि शिरताज - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    श्री विहारिणी जी (श्री राधा) ही सर्वोपरि हैं और सभी की सिरताज (शिरोमणि) स्वामिनी हैं। साक्षात् श्री बिहारी जी (श्री कृष्ण) भी सदैव उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और वे अपनी सखियों के समूह के संग शोभायमान रहती हैं। समस्त कुंजें-निकुंजें रसमय पुंजों से भरी हैं, जहाँ स्वाभाविक रूप से ही रस की अविरल धारा बहती है।

  3. श्याम रूप श्रीराधिका - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    श्री राधा श्री कृष्ण का स्वरूप हैं और श्री कृष्ण साक्षात् श्री राधा का ही स्वरूप हैं। दर्शन (लीला) मात्र के लिए ये दो प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये दोनों एक ही हैं।

  4. रसिकजन की मैं बलिहारी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2)

    मैं उन रसिकजनों पर बलिहारी जाती हूँ, जिनके हृदय में अनन्य रूप से प्रिया-प्रियतम बसते हैं । वे वृन्दावन धाम में विचरण करते हैं, स्वयं निरभिमानी होकर भी सबको मान देने वाले वचन बोलते हैं।

  5. राखि दृढ़ भरोसो तोको पोषैगी जय श्रीराधा - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, विनयावली (161)

    श्रीराधा पर अटूट विश्वास रख, ऐसा निश्चित मान कि स्वयं साक्षात् श्रीराधा ही तेरा पालन-पोषण करेंगी।

  6. मान बडाई ईर्षा हरष शोक दुखदाय - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (3)

    हे चतुराई की शिरोमणि, लाडिली श्रीराधे! अभिमान, प्रशंसा, ईर्ष्या और सांसारिक हर्ष-शोक आदि केवल दुखदायी हैं। कृपा कर मुझे इन सब दोषों से बचाकर, अपने चरणकमलों की भक्ति में सदैव लगाए रखो।

  7. अब मन युगल चरन में अटक्यो - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    अब मेरा मन श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों में अटक गया है। इस संसार में मैंने अनगिनत जन्म लिए और धर्म-कर्म की उलझनों में भटकता रहा।

  8. साधन धर्म न भटकना - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा रस सिद्धांत (6)

    जीव चाहे जितने भी धर्म-कर्म, व्रत, तप या साधन क्यों न कर ले, उसकी भटकन समाप्त नहीं होती, और न ही वह अंततः लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । केवल श्री राधारानी की कृपा से ही जीव को परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

  9. श्रीविपिनराज महाराज प्रणतपालन - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री वृंदावन जू की विनय पत्रिका (25)

    हे वनों के राजा, महाराज श्री वृंदावन धाम! आपको “प्रणतपाल” — शरणागत के रक्षक — के नाम से जाना जाता है।

  10. जो अपने औगुन कहौं, पाऊँ ओर न छोर - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (8)

    हे श्यामा जू (श्री राधा)! यदि मैं अपने दोषों को गिनाना आरंभ करूँ, तो उनकी कोई गिनती ही नहीं है, वे तो अनंत हैं। किंतु आप तो मेरे अंतरतम हृदय की हर बात को जानने वाली सर्वज्ञा स्वामिनी हैं। इसलिए मैं केवल आपसे ही कृपा की याचना करता हूँ। आपकी अकारण कृपा से ही मेरी बिगड़ी बात बनेगी।

  11. करै कृपा जब लाड़िली, मिटै हिये भ्रम जाल - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा रस सिद्धांत (5)

    जब लाड़िली जी (श्री राधा) कृपा करती हैं तब हृदय के समस्त भ्रम-जाल स्वतः ही मिट जाते हैं । वे अपने श्रीचरणों की सेवा प्रदान कर जीव को सहज ही प्रेम-रस में सराबोर कर देती हैं।

  12. अपनी ओर निहारि के कृपा दृष्टि जो होय - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (13)

    हे परम करुणामयी प्यारी जू (श्री राधा)! यदि आप अपनी कृपामयी दृष्टि मेरी ओर डाल देंगीं तो मेरी अनंत जन्मों की बिगड़ी बन जाएगी । इसके अतिरिक्त मेरे पास अन्य कोई साधन नहीं है ।

  13. करुणा सागर लाड़िली - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (2)

    हे करुणा की सागर, श्री लाड़िलीजी (श्री राधा), कृपा करके मुझे अपनाइए, क्योंकि मुझमें न तो कोई बल है, न बुद्धि, और न ही कोई अन्य उपाय (साधन) काम आ रहा है। अब मुझे केवल आपकी कृपा का ही आसरा है ।

  14. जो अपने औगुन कहौं पाऊँ ओर न छोर - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (8)

    हे श्यामा जू (श्री राधा)! यदि मैं अपने दोषों को गिनाना आरंभ करूँ, तो उनकी कोई गिनती ही नहीं है, वे तो अनंत हैं। किन्तु आप तो मेरे अंतरतम हृदय की हर बात को जानने वाली सर्वज्ञा स्वामिनी हैं। इसलिए, मैं केवल आपसे ही कृपा की याचना करता हूँ। आपकी कृपा से ही मेरी बिगड़ी बात बनेगी ।

  15. श्यामा प्यारी यह आज्ञा मैं पाऊँ - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (6)

    हे परम करुणा निधान, नित्य किशोरी, श्री श्यामा प्यारी जू(श्री राधा)! कृपा कर मुझे यह आज्ञा दीजिए कि मैं सदैव अपने मन को आपके चरण कमलों में ही रखूँ ।

  16. राधा प्यारी स्वामिनी निज सहचरि सुखदाय - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली

    हे प्यारी श्री राधा स्वामिनी जू! आप तो सदा अपनी निज सहचरियों को सुख प्रदान करने वाली हो, अली माधुरी आपके चरणों की शरण में पड़ी, आपसे कृपा की याचना कर रही है ।

  17. नित्य कुञ्ज बृन्दा विपन - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    श्री धाम वृंदावन की कुंजों में, नित्य ही दोनों प्रिया-प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) परम आह्लाद पूर्वक, समस्त रसों के सार रस, नित्य विहार रस का वर्षन करते हैं।

  18. जय राधा जय राधा राधा - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका, मंगल

    श्री राधा की जय हो, जय हो, जय हो, जिनके गौर अंग की छवि बड़ी सुन्दर है, एवं जो चरण नख से शिखा पर्यन्त सुन्दर रूप माधुरी की अगाध सागर हैं, जिसको देखकर सबके मन को मोहनेवाले श्री श्यामसुंदर के नयनों को बहुत सुख मिलता है।

  19. अली मधुरी की सुनौ, करुणा श्यामा जोय - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (1)

    हे परम करुणामयी स्वामिनी श्री राधा, मेरी विनती को कृपा सुनो! तुम्हारे चरण कमलों को देखे बिना मुझे पल भर को भी चैन नहीं है ।

  20. शास्त्र शिरोमणि श्याम को - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा रस सिद्धांत (2)

    वेदों एवं शास्त्रों में श्री कृष्ण को ही परम तत्व बताया गया है, वही श्री कृष्ण अपने श्री मुख से कहते हैं कि मैं श्री राधा का दास हूँ।