श्री हित ध्रुवदास

श्री धुवदास जी गोपीनाथ जी (हित हरिवंश महाप्रभु जी के तीसरे बेटे) के शिष्य थे, इन्होंने श्री राधावल्लभ संप्रदाय की उपासना एवं वृंदावन रस मार्ग के प्रचार हेतु बयालीस लीला नामक ग्रंथ लिखा है। इस ग्रंथ में वृंदावन शत लीला, श्रृंगार शत लीला, भजन शत लीला एवं अन्य अध्याय उपस्थित हैं। रस उपासना की दृष्टि से यह ग्रंथ बहुत अद्भुत है।

310 लेख उपलब्ध हैं

  1. आरती राधिका-लाल पर वारौं सहज - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20)

    मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।

  2. कुँवरि चाल सखि देखि कै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, रंग हुलास (43)

    श्री राधा की परम मनोहर चाल को देखकर श्रीकृष्ण अपनी ही गति-मति भूल गए। श्री राधा जू के विशाल नेत्रों की रसभरी चितवन को निहारकर वे चित्र के समान खड़े के खड़े रह गये।

  3. सनेही एक विहारी-विहारिनि एक - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (99)

    परम स्नेही केवल एक श्रीविहारी और श्रीविहारिणी ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं।

  4. अतिहिं लालची लाल पिय - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, अनुराग लता (34)

    लाल जी (श्री कृष्ण) श्री राधा के रूप का रसास्वादन करने के लिए अत्यंत लालची रहते हैं, वे सदा उनको निरंतर निहारते रहते हैं, फिर भी उन्हें तृप्ति नहीं होती। प्रिया जी के सौंदर्य रूपी वन का दर्शन कर उनके नेत्र इस प्रकार उलझ गए हैं कि वे वहाँ से हटने का नाम ही नहीं लेते।

  5. कहौ दान कबही भयौ - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार सभा मण्डल (06)

    श्री ललिता जी श्री कृष्ण से कहती हैं— यह तो बताइये कि इस नित्य वृन्दावन में दान का विधान पहले कब हुआ? आपको यह कहते लज्जा नहीं आती? ध्यान रखिए! यह श्री वृन्दावन श्री राधाजू का निज-वन है, यहाँ कुँवरि किशोरी का ही एकछत्र साम्राज्य है, तब आपके द्वारा दान माँगने का क्या तुक है?

  6. आज सखि निरख रूप भरि नैन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (91)

    हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल वाणी में वार्तालाप कर रहे हैं।

  7. रूप प्रिया कौ कहन कौं - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार सभा मण्डल (39)

    श्री प्रियाजी (श्री राधा) के रूप का वर्णन करने की सामर्थ्य मेरी अल्प बुद्धि में कहाँ है? जिनके नयनों की केवल एक कटाक्ष-मात्र से स्वयं सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण भी मोहित होकर उनके चरण कमलों में विभोर होकर लोटने लगते हैं।

  8. रूप की रासि किसोर-किसोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (44)

    रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]

  9. सुनि लै मेरी बात जुगल चरन चित लाइयै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (23)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैं अपने हृदय की गुह्यतम बात कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो — अपने मन को नित्य श्री श्यामा-श्याम के चरणों में ही लगाओ। यह जो मानव-देह का स्वर्णिम अवसर मिला है, इसे व्यर्थ मत गवाओ, अन्यथा आगे चलकर अवश्य ही पछताना पड़ेगा।

  10. मन वच काइक एक रस धरे महा व्रत प्रेम - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (28)

    मन, वचन और देह तीनों को एक-रस रखकर अर्थात पूरी एकाग्रता से, केवल एक प्रेम का महाव्रत धारण किए हुए, रसिक कुँवर लालजू (श्री कृष्ण) श्रीराधा की सेवा में पूर्णत: तत्पर रहते हैं। उनका श्री राधा को निरंतर सुख पहुंचाना ही एक मात्र सुखमय नियम है। वे अन्य किसी नियम को नहीं मानते।

  11. यह सुख समुझन कौं कछू - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (49)

    वृन्दावन रस का अनुभव किसी साधन या उपाय से संभव नहीं है। केवल श्री किशोरी जी की निष्कारण (अहैतुकी) कृपा ही इसका द्वार खोल सकती है। जब उनकी कृपा-बल से प्रेम का झरोखा खुलता है, तभी इस रस का साक्षात् अनुभव संभव होता है।

  12. गरजनि घन अरु दामिनी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (68)

    वर्षा ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना, विद्युत की चमक, चातक, कोयल, शुक और मोर के मधुर स्वर वातावरण को सुखमय बना रहे हैं। काजल से भी अधिक काले बादल चारों ओर से उमड़-घुमड़ कर आकाश कर घिर आए हैं।

  13. नख-सिख मोहनि सोहनी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, रंग हुलास (19)

    नित्य-नवेली श्री राधा नख-शिख पर्यन्त परम सुहावनी एवं मनमोहनी हैं। उन पर कोटि-कोटि रति एवं साक्षात् महालक्ष्मी भी न्यौछावर हैं। यद्यपि प्रियतम श्याम-सुन्दर स्वयं मोहन हैं (मोहित करने वाले) हैं, तथापि श्री राधा के रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध हुए उनके चरण-तल में विलुण्ठित होते रहते हैं।

  14. ऐसौ और सनेही कौन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)

    रसिक शिरोमणि श्रीलाल जी (श्री कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा और कौन रँगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रेम के ही रंग में रँग गया हो।

  15. प्रान दियैं यह प्रेम न पैयै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)

    हे सखि ! प्राणों का उत्सर्ग करने पर भी लाड़िली-लाल का यह सर्वोपरि प्रेम नहीं मिलता, ऐसा विलक्षण-मूल्यवान् अर्थात् महँगा है यह प्रेम, अतएव हे सखि ! तुम्हीं बताओ इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?

  16. भजन कुँडलिया में रहौ - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (22)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—हे उपासको! भजन रूपी कुण्डली (घेरा) के भीतर ही निवास करो। कुण्डली से एक पग भी बाहर मत जाओ और अनन्य भाव से केवल श्री लाड़िली - लाल युगल किशोर से सहज प्रीति करो ।

  17. प्रीतम के प्रान प्यारी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (37)

    श्री राधा श्री कृष्ण के प्राण हैं और श्री राधा के प्राण हैं श्री कृष्ण। ऐसे प्रेम-राशि युगल परस्पर एक दूसरे की छवि का निरंतर अवलोकन करते रहते हैं, तथापि किसी भी प्रकार तृप्त नहीं होते, वरन् उनकी रुचि अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है।

  18. प्रीतम हू कैं प्रन इहै प्रीति के बस ह्वै जाहिं - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (57)

    प्रियतम श्री लाल जी (श्री कृष्ण) की यही प्रतिज्ञा है कि वे सदा प्रेम के वशीभूत ही रहते हैं, किन्तु प्रेम से विहीन कोटि-कोटि धर्माचरण करने वालों की ओर दृष्टि उठा कर भी नहीं देखते ।