श्री गुरु छौनाजी महाराज
श्री गुरु छौनाजी महाराज शुक सम्प्रदाय के वृंदावन के एक रसिक संत हैं ।
15 लेख उपलब्ध हैं
जोग जज्ञ तप नाम बिनु - श्री गुरु छौनाजी महाराज
श्री भगवन्नाम के बिना योग, यज्ञ, तपस्या आदि समस्त साधन निष्फल हो जाते हैं। श्री गुरु छौना जी कहते हैं कि जैसे सेमर के वृक्ष का यत्नपूर्वक पालन करने पर, फल पकने पर भी भीतर से केवल व्यर्थ रुई (कपास) ही निकलती है, कोई खाने योग्य फल नहीं मिलता, वैसे ही नाम-हीन साधन भी निष्फल सिद्ध होते हैं।
नाम लियैं पातिक कटैं पहुँचै हरि के देस - श्री गुरु छौनाजी महाराज
भगवान का नाम लेने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीव अंततः हरि के धाम को प्राप्त करता है। श्री छौना जी महाराज कहते हैं कि यह नाम चाहे गृहस्थ (गीरही) जपे या विरक्त संन्यासी (अतीत), दोनों को ही समान फल मिलता है। बाहरी भेष का इसमें कोई महत्व नहीं है, क्योंकि सार बात केवल ‘नाम-स्मरण’ है, न कि बाह्य रूप या वेशभूषा।
छौना छाँड़ि तू जगत को श्याम सुमिर सुख लेह - श्री गुरु छौनाजी महाराज
गुरु छौना कहते हैं कि जगत की प्रीति को त्याग कर, अपना मन श्यामसुंदर में लगाओ क्योंकि सच्चा सुख केवल उनके स्मरण से ही मिलता है। परिजन और मित्र तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारे साथ नहीं जा सकते और अंत में तुम्हारी देह भी जलाकर राख कर देंगे।
हमारी सुध लीजै हो मोहन प्यारे - श्री गुरु छौनाजी महाराज
हे मोहन प्यारे! मेरी सुध लो। हे नंद के दुलारे, प्रियतम प्यारे! तुम्हारे बिना मेरा कोई अन्य नहीं है!
षट् मुक्ति की चाह तजि - श्री गुरु छौनाजी महाराज
युगल रस के उपासक न केवल भुक्ति (सांसारिक) बल्कि छः प्रकार की मुक्ति (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य, सारष्टि एवं कैवल्य) की कामना को भी त्याग देते हैं। वे प्रिया-प्रियतम में निष्काम प्रेम को बढ़ाकर, संसार के आवागमन से सहजता से मुक्त हो जाते हैं एवं उनकी महल-टहल को प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे उपासक प्रेम में अनुरक्त होकर युगल विहार का भावपूर्ण नेत्रों से सदा दर्शन करते रहते हैं।
बंसरी बजावै नन्द जू कौ लाल - श्री गुरु छौनाजी महाराज, रास महोत्सव के पद (103)
नन्दनन्दन श्रीकृष्ण यमुना के पुलिन पर वंशीवट की छाया में मधुर बंसी बजा रहे हैं। उनका रूप अत्यन्त रससिक्त एवं मनोहर है।
हरि जी बाँह गहो अब मेरी - श्री गुरुछौना जी महाराज
हे हरि जी! कृपा करके अब मेरी बाँह पकड़िए और मुझे इस संसार रूपी दुख सागर से बाहर निकालिए। इस संसार में मेरा कोई सच्चा हितैषी नहीं है, मैं तो मोह-माया के विशाल जाल में फँस गया हूँ।
जोग जज्ञ तप नेम करि भजै नहीं गोविन्द - श्री गुरु छौनाजी महाराज
भले ही कोई योग, यज्ञ, तपस्या अथवा कठोर व्रतों का पालन करता रहे, परंतु यदि उसने श्री गोविंद का डट कर भजन नहीं किया, यदि वह हरि नाम के सुमिरन से वंचित रहा, तो वह कभी भी संसार के बंधनों से मुक्त नहीं हो सकता।
प्रेम कटारी हँसि हँसि मारी - श्री गुरुछौना जी महाराज
मेरे मनमीत मोहन (श्रीकृष्ण) ने हँस-हँसकर प्रेम का खंजर चलाकर मुझे घायल कर दिया है।
सबसे न्यारी रीति ये जाको ओर न छोर - श्री गुरु छौनाजी महाराज
सबसे अनोखी रीति, जिसका कोई आदि-अंत नहीं, वह यही है कि अपने भाव के अनुसार श्री श्यामा-श्याम को प्रेम से लाड़ लड़ाओ।
सोई सांचा सूरमा मंड्या जुगल सों हेत - श्री गुरु छौनाजी
सच्चा शूरवीर तो वही है जो रसक्षेत्र वृंदावन को कभी नहीं छोड़ता, और युगल (श्री राधा-कृष्ण) से प्रेम करने में ही अपना सर्वस्व समर्पित मानता है।
सखीभाव धारण करै, जब पहुँचे निज धाम - श्री गुरु छौनाजी महाराज
श्यामा श्याम की सखी भाव को धारण करके ही साधक निज़धाम तक पहुँच सकता है जहां अनन्य रसिक जन अविचल नित्य विहार रस का पान करते हैं ।
गुरुछौना रज सेइये, धार मतो मजबूत - श्री गुरु छौनाजी महाराज
सच्चा राजपूत तो वे है जो सदा वृंदावन की रज का सेवन करता है एवं वृंदावन की रज में रज होकर मिलने की मजबूत मत रखता है।
राधे तैं प्रीतम बस कीनौ - श्री गुरुछौना जी महाराज
हे श्री राधे! प्रीतम श्री कृष्ण को तुमने अपने वशीभूत कर लिया है । जो अखिल लोक के चूड़ामणि भगवान श्री कृष्ण सबके मन को मोहित करते हैं, उनके मन का हरण भी आपने कर लिया है ।
परम धाम परिकर जहाँ, आनंद सहज अपार - श्री गुरु छौनाजी महाराज
जहाँ श्री श्यामा-श्याम का परम धाम श्री वृंदावन है, जहाँ उनके समस्त परिकर विराजते हैं, जहाँ सहज ही अपार रस बरसता है, वहीं मेरे नैंन भी नित्य विहार को अपलक निहारते हैं।