सुख निधि श्री गिरिराज तरहटी - गोस्वामी श्री हरिराय जी
श्री गिरिराज जी की तलहटी समस्त सुखों की निधि (खजाना) है, जहाँ के विभिन्न कुंडों के जल का आचमन करके और उसमें स्नान करके, भक्त बार-बार व्रज-रज में लोटकर आनन्द का अनुभव करते हैं।
श्री हरिराय जी सोलहवीं शताब्दी के आचार्य और पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के कवि विद्वान थे
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श्री गिरिराज जी की तलहटी समस्त सुखों की निधि (खजाना) है, जहाँ के विभिन्न कुंडों के जल का आचमन करके और उसमें स्नान करके, भक्त बार-बार व्रज-रज में लोटकर आनन्द का अनुभव करते हैं।
प्रभु के विशुद्ध प्रेमी रसिक भक्त में भूलकर भी कभी रंचमात्र भी दोष-दर्शन नहीं करना चाहिए। उनके लौकिक अथवा बाह्य आचरण को न देखकर केवल उनके भीतर का वह अनमोल प्रेम-धन रूपी दिव्य गुण को ही निहारना चाहिए। इस संसार में सर्वप्रथम तो ऐसे प्रेमी संत का मिलना ही अत्यंत सुदुर्लभ है; किन्तु यदि भगवद्-कृपा और परम सौभाग्य से कभी कहीं वे मिल जायें, तो उनके सम्मुख अपने हृदय के समस्त कपाट (भाव) खोलकर स्वयं को समर्पित कर देना चाहिए।
अपने मन रूपी अनमोल रत्न को केवल उसी व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो प्रेम का सच्चा पारखी अर्थात् रसिक संत हो। यदि कोई प्रेम की गहराई और मूल्य को समझने वाला न मिले, तो मौन धारण कर लेना ही श्रेष्ठ है। व्यर्थ के लोगों के पीछे अपना अनमोल जीवन नष्ट करने से क्या लाभ?
जब श्रीहरि के भक्त आपके द्वार पर पधारें, तब पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ, नतमस्तक होकर उनका वंदन करना चाहिए। उनके हृदय का आंतरिक भाव क्या है, यह तो वे ही जानें; किंतु हमारा भाव तो यही होना चाहिए कि स्वयं अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक जगदीश्वर ही उनके रूप में साक्षात् पधारे हैं।
प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उनकी गति कामदेव के समान अत्यंत मतवाली और लुभावनी हो गई है।
श्री वृन्दावन के वृक्षों की ऐसी महिमा है जिसका मर्म कोई भी नहीं जानता। यहाँ के वृक्षों के केवल एक पत्ते का स्मरण कर लेने मात्र से ही जीव के भीतर दिव्य, चतुर्भुज समान सामर्थ्य प्रकट हो जाता है, क्योंकि यहाँ के प्रत्येक वृक्ष और पत्ते में साक्षात श्रीकृष्ण विराजमान हैं।
हे श्रीकृष्ण! मैं पतितों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हूँ — ‘महापतित’ ही मेरा नाम है। अब मैं आपसे याचक बनकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रत्येक क्षण मेरी शरणागति आपके श्रीचरणों में अटल बनी रहे।
फूलों से सजी पिछवाड़े की बाड़ी में हमारे लाल विराजमान हैं। सुंदर श्याम, शोभा की पराकाष्ठा हैं, उनके कंठ की मालाएँ मन को हर लेती हैं।
जो व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण को छोड़कर भैरव-भूत आदि की उपासना करता है, उसका अंत अत्यंत अपमानजनक होता है जैसे किसी गणिका (वेश्या) के बेटे को समाज आदर-सम्मान नहीं देता।
अरे मन! तू श्री वल्लभ (श्री वल्लभाचार्य / श्रीकृष्ण) के गुणों का प्रेमपूर्वक गान कर। तू वेद-पुराण पढ़ने में अपना समय व्यर्थ क्यों कर रहा है?
इस संसार में सबसे अनुपम मिलन भगवत्प्रेमियों का संग है क्योंकि उनके संग के प्रभाव से मन सहजता से श्री कृष्ण के प्रेम-रंग में सराबोर हो जाता है।
श्रीवृन्दावन की महान भूमि रत्नों से जड़ी हुई स्वर्णमयी है जहाँ समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और फल-फूलों से लदी डालियाँ झूमती रहती हैं।
मनमोहक लताओं पर वर्षा की नन्हीं-नन्हीं बूँदें गिर रही हैं और राधा-कृष्ण दोनों प्रेममय भीग रहे हैं।
यदि जीवन में कोई नियम अपनाना है, तो बस इतना कर — यमुना जी से अटूट प्रेम कर, और श्रीकृष्ण के दासों (भगवद्प्राप्त संतों) को छोड़ अन्य किसी से स्नेह न कर।
श्री वृंदावन का दर्शन जीव के लिए भगवत्प्राप्ति के मार्ग में अत्यंत अनुकूल और सहायक होता है। यह संसार एक अथाह समुद्र के समान है, जिसे पार करने का श्रेष्ठ साधन श्री वृंदावन ही है।
जो श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण अथवा श्री वल्लभाचार्य) के चरणकमलों के रंग में रंग जाता है, उसके हृदय में किसी भी प्रकार का कुसंग व्याप्त नहीं रहता। वह सहज ही संतों की संगति प्राप्त कर लेता है।
हे मन! मोहक देह के सुंदर रूप को देखकर बहको मत। यह कभी न भूलो कि श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण) के अतिरिक्त इस संसार में कोई भी तुम्हारा सच्चा साथी नहीं है।
जो अपने हृदय में गोकुल बसाए रखते हैं, जिनकी आँखों में भक्ति के आँसू छलकते हैं, और जिनके मुख पर सदा श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण) नाम रहता है, ऐसे भक्त की समस्त मनोकामनाएं सहज ही पूर्ण हो जाती हैं।
घने वृक्षों और प्रफुल्लित लताओं से सुसज्जित वन को देखकर, ब्रजवासियों के हृदय आनंद से भर उठते हैं।
चाहे जाग्रत अवस्था हो, निद्रा हो या स्वप्न; चाहे प्रातःकाल, मध्यान्ह, संध्या या रात्रि का समय हो, सदा सर्वदा ब्रजेश्वर श्री कृष्णचंद्र के चरणकमलों को अपने हृदय में बसा कर रखो ।