श्री हरिराय जी
श्री हरिराय जी सोलहवीं शताब्दी के आचार्य और पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के कवि विद्वान थे
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श्री वल्लभ वल्लभ रटत हो - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (08)
मैं निरंतर 'श्री वल्लभ-श्री वल्लभ' नाम का रटन करता हूँ, क्योंकि श्री वल्लभ ही मेरे जीवन और प्राण हैं। मुझे अपने माता-पिता की सौगंध है, मैं श्री वल्लभ को कभी भी नहीं भूलूँगा और सर्वदा उनका ही स्मरण रखूँगा।
पिय तेरी चितबन ही में - गोस्वामी श्री हरिराय जी
हे प्रियतम! तुम्हारी चितवन में ही कोई अद्भुत जादू है। जब से मैंने तुम्हारे इस लावण्यमयी सुंदर मुख के दर्शन किए हैं, तब से मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ भूल गई हूँ।
घर आवे वैष्णव जबहीं दीजे - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (49)
जब भी कोई वैष्णव भक्त घर पर पधारें, तब उन्हें चार बहुमूल्य रत्न अवश्य अर्पित करने चाहिए। वे चार रत्न हैं—बैठने के लिए आदरपूर्वक आसन, पीने के लिए शीतल जल, अत्यंत मधुर एवं प्रिय वाणी, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रेमपूर्वक भोजन या अन्न-प्रसाद।
हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी
ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।
धन्य धन्य श्री गिरिराज जु - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (81)
श्री गिरिराज जी धन्य हैं, धन्य हैं। वे भगवान श्रीहरि के समस्त भक्तों में श्रेष्ठ और अग्रणी हैं। वे निरन्तर श्रीकृष्ण के सान्निध्य में रहकर उनकी सेवा करते हैं, और इसीलिए वे बलभद्र और श्यामसुंदर के मन को अत्यंत प्रिय लगते हैं अथवा श्री गिरिराज जी मनमोहन के मन को मोहने का सामर्थ रखते हैं।
सुख निधि श्री गिरिराज तरहटी - गोस्वामी श्री हरिराय जी
श्री गिरिराज जी की तलहटी समस्त सुखों की निधि (खजाना) है, जहाँ के विभिन्न कुंडों के जल का आचमन करके और उसमें स्नान करके, भक्त बार-बार व्रज-रज में लोटकर आनन्द का अनुभव करते हैं।
रंचक दोष ना देखिये - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (31)
प्रभु के विशुद्ध प्रेमी रसिक भक्त में भूलकर भी कभी रंचमात्र भी दोष-दर्शन नहीं करना चाहिए। उनके लौकिक अथवा बाह्य आचरण को न देखकर केवल उनके भीतर का वह अनमोल प्रेम-धन रूपी दिव्य गुण को ही निहारना चाहिए। इस संसार में सर्वप्रथम तो ऐसे प्रेमी संत का मिलना ही अत्यंत सुदुर्लभ है; किन्तु यदि भगवद्-कृपा और परम सौभाग्य से कभी कहीं वे मिल जायें, तो उनके सम्मुख अपने हृदय के समस्त कपाट (भाव) खोलकर स्वयं को समर्पित कर देना चाहिए।
मन नग ताको दीजिये जो प्रेम पारखी होय - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (29)
अपने मन रूपी अनमोल रत्न को केवल उसी व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो प्रेम का सच्चा पारखी अर्थात् रसिक संत हो। यदि कोई प्रेम की गहराई और मूल्य को समझने वाला न मिले, तो मौन धारण कर लेना ही श्रेष्ठ है। व्यर्थ के लोगों के पीछे अपना अनमोल जीवन नष्ट करने से क्या लाभ?
हरि जन आवे बारने हँसी हँसी नावे शीश - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (27)
जब श्रीहरि के भक्त आपके द्वार पर पधारें, तब पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ, नतमस्तक होकर उनका वंदन करना चाहिए। उनके हृदय का आंतरिक भाव क्या है, यह तो वे ही जानें; किंतु हमारा भाव तो यही होना चाहिए कि स्वयं अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक जगदीश्वर ही उनके रूप में साक्षात् पधारे हैं।
चले पिय भाँवती रस लेन - गोस्वामी श्री हरिराय जी
प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उनकी गति कामदेव के समान अत्यंत मतवाली और लुभावनी हो गई है।
श्री वृंदावन के वृक्ष को मरम न जाने कोय - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (73)
श्री वृन्दावन के वृक्षों की ऐसी महिमा है जिसका मर्म कोई भी नहीं जानता। यहाँ के वृक्षों के केवल एक पत्ते का स्मरण कर लेने मात्र से ही जीव के भीतर दिव्य, चतुर्भुज समान सामर्थ्य प्रकट हो जाता है, क्योंकि यहाँ के प्रत्येक वृक्ष और पत्ते में साक्षात श्रीकृष्ण विराजमान हैं।
पतितन में विख्यात हों - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (17)
हे श्रीकृष्ण! मैं पतितों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हूँ — ‘महापतित’ ही मेरा नाम है। अब मैं आपसे याचक बनकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रत्येक क्षण मेरी शरणागति आपके श्रीचरणों में अटल बनी रहे।
बैठे लाल फूलन की पिछबारी - गोस्वामी श्री हरिराय जी
फूलों से सजी पिछवाड़े की बाड़ी में हमारे लाल विराजमान हैं। सुंदर श्याम, शोभा की पराकाष्ठा हैं, उनके कंठ की मालाएँ मन को हर लेती हैं।
श्री वल्लभ वर को छांडि के भजे जो भैरव भूत - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (59)
जो व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण को छोड़कर भैरव-भूत आदि की उपासना करता है, उसका अंत अत्यंत अपमानजनक होता है जैसे किसी गणिका (वेश्या) के बेटे को समाज आदर-सम्मान नहीं देता।
अरे मन श्री वल्लभ गुन गाय - गोस्वामी श्री हरिराय जी
अरे मन! तू श्री वल्लभ (श्री वल्लभाचार्य / श्रीकृष्ण) के गुणों का प्रेमपूर्वक गान कर। तू वेद-पुराण पढ़ने में अपना समय व्यर्थ क्यों कर रहा है?
जग में मिलन अनूप है भगवदियन को संग - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (26)
इस संसार में सबसे अनुपम मिलन भगवत्प्रेमियों का संग है क्योंकि उनके संग के प्रभाव से मन सहजता से श्री कृष्ण के प्रेम-रंग में सराबोर हो जाता है।
रतन खचित कंचन महा - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (80)
श्रीवृन्दावन की महान भूमि रत्नों से जड़ी हुई स्वर्णमयी है जहाँ समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और फल-फूलों से लदी डालियाँ झूमती रहती हैं।
ललित लतान पर नन्हीं नन्हीं बूँद परें - गोस्वामी श्री हरिराय जी
मनमोहक लताओं पर वर्षा की नन्हीं-नन्हीं बूँदें गिर रही हैं और राधा-कृष्ण दोनों प्रेममय भीग रहे हैं।
श्री यमुनाजी सो नेह करि यह नेमी तू लेह - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (76)
यदि जीवन में कोई नियम अपनाना है, तो बस इतना कर — यमुना जी से अटूट प्रेम कर, और श्रीकृष्ण के दासों (भगवद्प्राप्त संतों) को छोड़ अन्य किसी से स्नेह न कर।
श्री वृंदावन के दरस ते - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (71)
श्री वृंदावन का दर्शन जीव के लिए भगवत्प्राप्ति के मार्ग में अत्यंत अनुकूल और सहायक होता है। यह संसार एक अथाह समुद्र के समान है, जिसे पार करने का श्रेष्ठ साधन श्री वृंदावन ही है।