मीरा बाई

मीरा बाई (1498-1546) भक्ति आंदोलन की एक हिंदू कृष्ण भक्त थीं।

22 लेख उपलब्ध हैं

  1. डारि गयो मनमोहन पासी आँबाकी - श्री मीराबाई

    मनमोहन श्रीकृष्ण मुझ पर अपने प्रेम का पाश डाल गए हैं। अब आम की डाल पर जब कोयल कूकती है, तो वह विरह-वेदना मेरे लिए मृत्यु के समान कष्टकारी सिद्ध होती है और संसार मेरी हँसी उड़ाता है।

  2. जाके प्रिय न राम बैदैही - श्री तुलसीदास जी (मीराबाई को भेजा पत्र)

    एक बार मीराबाई ने तुलसीदास जी से पूछा — “मेरे परिवारवाले भजन-मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं, मुझे क्या करना चाहिए?” इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास जी ने यह पद रचकर उन्हें भेजा। जिसको भगवान राम प्रिय न हों अर्थात् जिसका भगवान से प्रेम न हो, भले ही वे हमारे अत्यन्त स्नेही क्यों न हों, फिर भी उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए।

  3. मैं तो सांवरे के रंग रांची - श्री मीराबाई

    मीराबाई जी कहती हैं कि मैं तो साँवले स्वरूप वाले श्री कृष्ण के श्याम रंग में रँग गयी हूँ। अब मैंने लोक-लाज की मर्यादाओं का त्याग कर दिया है, और श्री कृष्ण को रिझाने के लिए ही अपना संपूर्ण श्रृंगार कर, पैरों में घुँघरू बाँधकर, नाच रही हूँ ।

  4. पिय बिन सूनो छै जी म्हारो देस - श्री मीरा बाई

    मेरे प्रियतम श्री कृष्ण के वियोग में सारा संसार सूना लगता है। जो मुझे मेरे प्रिय प्रभु श्री श्यामसुंदर से मिलवा देगा, उसके लिए मैं अपना मन और तन न्योछावर कर दूंगी।

  5. साँवरे की दृष्टि मानो प्रेम की कटारी है - श्री मीरा बाई

    साँवरे श्री कृष्ण की दृष्टि मानो प्रेम का ख़ंजर है । यदि एक बार किसी को लग गई, तो वो तो बेहाल होकर तन मन की सुधि भुला कर प्रेम में मतवाला होकर घूमेगा ।

  6. दिन नहिं भूख, रैन नहीं निद्रा - श्री मीराबाई

    विरह की व्याकुलता में अब न तो दिन में भूख लगती है और न ही रात्रि में निद्रा आती है; यह शरीर विरह की अग्नि में पल-पल क्षीण होता जा रहा है। मीराबाई अपने प्रभु श्री गिरधर लाल से विनय करती हैं कि हे प्रभु! अब मुझ पर कृपा कर दर्शन दीजिए और मिलकर फिर कभी विलग मत होने दीजिएगा।

  7. तुमरे कारण सब सुख छोड़यो - श्री मीरा जी

    श्री मीरा जी कहती हैं "हे प्रभु, मैंने आपके लिए ही समस्त सुखों का त्याग कर दिया है, अब मुझे आप क्यों तरसाते हो। मेरा ह्रदय आपके वियोग से संतप्त हो रहा है, इसलिए कृपा कर आकर मेरे ह्रदय को शीतलता प्रदान करो।"

  8. चाकर रहसूं बाग़ लगासूं, नित उठ दरसन पासूं - मीराबाई

    हे कृष्ण, मैं सदा आपकी दासी रहूँगी और आपके लिए एक बाग लगाउँगी। प्रतिदिन सुबह उठ कर आपका दर्शन करुँगी। वृंदावन की कुञ्ज गलियों में विचरण कर, मैं आपके दिव्य लीलाओं को गाऊँगी।

  9. हमरो प्रणाम बांके बिहारी को - श्री मीराबाई जी

    इस पद् में श्री मीराबाई जी ने श्री बांके बिहारी जी को प्रणाम एवं उनके मधुर रूप का वर्णन किया है। श्री बांके बिहारी जी के सिर पर मोर मुकुट एवं माथे पर तिलक विराजता है, उन्होंने कुंडल और काली अलकावली धारण कर रखी है ।