जो मैं ऐसा जानती प्रीत करे दुःख होए - श्री मीराबाई
यदि मुझे पहले से ज्ञात होता कि प्रेम करने से दुःख मिलता है, तो मैं नगर-नगर ढिंढोरा पीटकर कहती कि कोई भी प्रेम न करे।
मीरा बाई (1498-1546) भक्ति आंदोलन की एक हिंदू कृष्ण भक्त थीं।
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यदि मुझे पहले से ज्ञात होता कि प्रेम करने से दुःख मिलता है, तो मैं नगर-नगर ढिंढोरा पीटकर कहती कि कोई भी प्रेम न करे।
एक बार मीराबाई ने तुलसीदास जी से पूछा — “मेरे परिवारवाले भजन-मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं, मुझे क्या करना चाहिए?” इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास जी ने यह पद रचकर उन्हें भेजा। जिसको भगवान राम प्रिय न हों अर्थात् जिसका भगवान से प्रेम न हो, भले ही वे हमारे अत्यन्त स्नेही क्यों न हों, फिर भी उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए।
हे राधे रानी! मेरी बाँसुरी मुझे दे दो। जिस बाँसुरी में मेरी जान है वही बाँसुरी चोरी हो गई है ।
मैं मोहन (कृष्ण) के सुंदर रूप से मोहित हो चुकी हूँ, जिनका सुंदर मुख है, कमल जैसे नेत्र हैं, जिनकी चितवनी बाँकी है एवं जिनकी मधुर मुस्कान है ।
मीराबाई जी कहती हैं कि मैं तो साँवले स्वरूप वाले श्री कृष्ण के श्याम रंग में रँग गयी हूँ। अब मैंने लोक-लाज की मर्यादाओं का त्याग कर दिया है, और श्री कृष्ण को रिझाने के लिए ही अपना संपूर्ण श्रृंगार कर, पैरों में घुँघरू बाँधकर, नाच रही हूँ ।
मैं गोविंद के गुण गाऊँगीं । यदि राजा रूठे तो रूठता रहे, अपना साम्राज्य वो अपने पास रखे। परंतु यदि हरि रूठ गये तो मैं कहाँ जाऊँगी ? [1]
मेरे प्रियतम श्री कृष्ण के वियोग में सारा संसार सूना लगता है। जो मुझे मेरे प्रिय प्रभु श्री श्यामसुंदर से मिलवा देगा, उसके लिए मैं अपना मन और तन न्योछावर कर दूंगी।
साँवरे श्री कृष्ण की दृष्टि मानो प्रेम का ख़ंजर है । यदि एक बार किसी को लग गई, तो वो तो बेहाल होकर तन मन की सुधि भुला कर प्रेम में मतवाला होकर घूमेगा ।
विरह की व्याकुलता में अब न तो दिन में भूख लगती है और न ही रात्रि में निद्रा आती है; यह शरीर विरह की अग्नि में पल-पल क्षीण होता जा रहा है। मीराबाई अपने प्रभु श्री गिरधर लाल से विनय करती हैं कि हे प्रभु! अब मुझ पर कृपा कर दर्शन दीजिए और मिलकर फिर कभी विलग मत होने दीजिएगा।
मैंने ब्रज में एक टोना होते हुए देखा । एक ब्रज की युवती अपने सिर पर दही बेच रही है। रास्ते में उसे नंदलाल श्री कृष्ण मिले ।
हे सखी, मैं तो प्रेम दीवानी हूँ, मेरा दर्द कौन जाने ?
श्री मीरा जी कहती हैं "हे प्रभु, मैंने आपके लिए ही समस्त सुखों का त्याग कर दिया है, अब मुझे आप क्यों तरसाते हो। मेरा ह्रदय आपके वियोग से संतप्त हो रहा है, इसलिए कृपा कर आकर मेरे ह्रदय को शीतलता प्रदान करो।"
नटवर नागर नंदा, भजो रे मन गोविंदा । श्याम सुंदर मुख चंदा, भजो रे मन गोविंदा ।।
हे कृष्ण, मेरे नैनों मैं आप नित्य ही निवास करो । आपकी साँवरी सूरत एवं मोहिनी स्वरूप, विशाल नयन मन को मोहने वाले हैं।
हे सखी, मुझे वृंदावन अति प्रिय लगता है।
हे कृष्ण, मैं सदा आपकी दासी रहूँगी और आपके लिए एक बाग लगाउँगी। प्रतिदिन सुबह उठ कर आपका दर्शन करुँगी। वृंदावन की कुञ्ज गलियों में विचरण कर, मैं आपके दिव्य लीलाओं को गाऊँगी।
हे सखी, मुझे वृंदावन अति प्रिय लगता है। यहाँ हर घर में श्री तुलसी जी विराजमान हैं एवं श्री ठाकुर जी की पूजा होती है एवं नित्य दर्शन होता है।
अरी सखी, वृंदावन धाम मुझे अत्यंत प्रिय है।
इस पद् में श्री मीराबाई जी ने श्री बांके बिहारी जी को प्रणाम एवं उनके मधुर रूप का वर्णन किया है। श्री बांके बिहारी जी के सिर पर मोर मुकुट एवं माथे पर तिलक विराजता है, उन्होंने कुंडल और काली अलकावली धारण कर रखी है ।
मीराबाई भगवान श्री कृष्ण और उनकी खोज में साल 1524 में वृंदावन आयी थी। वह वृंदावन में 1524 से 1539 तक रही थीं। उसके बाद, उन्होंने वृंदावन छोड़ दिया और अपनी मृत्यु तक (वर्ष 1550) द्वारका में ही रही। मीराबाई भगवान श्री कृष्ण को अपने पति के रूप में मानती थीं। जबकि वृंदावन के रसिक संत, सहचरी भाव या श्री राधा रानी की सखी भाव में युगल उपसना (राधा कृष्ण एक साथ) के रूप में आदेश किये हैं जिसका रस निकुंज रस है और सर्वोत्तम है और श्री राधा रानी को वृन्दावन में रसिक संतों का जीवन माना जाता है। और द्वारिका में, श्री कृष्ण को पति के रूप में पूजा की जाता है जो वृन्दावन के रसिकों को नहीं सुहाता।