विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी
मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।
निकुंज केली माधुरी निंबारक संप्रदाय के रसिक संत श्री अली माधुरी द्वारा लिखित ग्रंथ है, जिसमें निकुंज की अंतरंग केली माधुरी का वर्णन है।
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मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।
एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।
श्री विहारिणी जी (श्री राधा) ही सर्वोपरि हैं और सभी की सिरताज (शिरोमणि) स्वामिनी हैं। साक्षात् श्री बिहारी जी (श्री कृष्ण) भी सदैव उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और वे अपनी सखियों के समूह के संग शोभायमान रहती हैं। समस्त कुंजें-निकुंजें रसमय पुंजों से भरी हैं, जहाँ स्वाभाविक रूप से ही रस की अविरल धारा बहती है।
श्री राधा श्री कृष्ण का स्वरूप हैं और श्री कृष्ण साक्षात् श्री राधा का ही स्वरूप हैं। दर्शन (लीला) मात्र के लिए ये दो प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये दोनों एक ही हैं।
मैं उन रसिकजनों पर बलिहारी जाती हूँ, जिनके हृदय में अनन्य रूप से प्रिया-प्रियतम बसते हैं । वे वृन्दावन धाम में विचरण करते हैं, स्वयं निरभिमानी होकर भी सबको मान देने वाले वचन बोलते हैं।
श्रीराधा पर अटूट विश्वास रख, ऐसा निश्चित मान कि स्वयं साक्षात् श्रीराधा ही तेरा पालन-पोषण करेंगी।
हे चतुराई की शिरोमणि, लाडिली श्रीराधे! अभिमान, प्रशंसा, ईर्ष्या और सांसारिक हर्ष-शोक आदि केवल दुखदायी हैं। कृपा कर मुझे इन सब दोषों से बचाकर, अपने चरणकमलों की भक्ति में सदैव लगाए रखो।
अब मेरा मन श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों में अटक गया है। इस संसार में मैंने अनगिनत जन्म लिए और धर्म-कर्म की उलझनों में भटकता रहा।
जीव चाहे जितने भी धर्म-कर्म, व्रत, तप या साधन क्यों न कर ले, उसकी भटकन समाप्त नहीं होती, और न ही वह अंततः लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । केवल श्री राधारानी की कृपा से ही जीव को परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
हे वनों के राजा, महाराज श्री वृंदावन धाम! आपको “प्रणतपाल” — शरणागत के रक्षक — के नाम से जाना जाता है।
हे श्यामा जू (श्री राधा)! यदि मैं अपने दोषों को गिनाना आरंभ करूँ, तो उनकी कोई गिनती ही नहीं है, वे तो अनंत हैं। किंतु आप तो मेरे अंतरतम हृदय की हर बात को जानने वाली सर्वज्ञा स्वामिनी हैं। इसलिए मैं केवल आपसे ही कृपा की याचना करता हूँ। आपकी अकारण कृपा से ही मेरी बिगड़ी बात बनेगी।
जब लाड़िली जी (श्री राधा) कृपा करती हैं तब हृदय के समस्त भ्रम-जाल स्वतः ही मिट जाते हैं । वे अपने श्रीचरणों की सेवा प्रदान कर जीव को सहज ही प्रेम-रस में सराबोर कर देती हैं।
हे परम करुणामयी प्यारी जू (श्री राधा)! यदि आप अपनी कृपामयी दृष्टि मेरी ओर डाल देंगीं तो मेरी अनंत जन्मों की बिगड़ी बन जाएगी । इसके अतिरिक्त मेरे पास अन्य कोई साधन नहीं है ।
हे करुणा की सागर, श्री लाड़िलीजी (श्री राधा), कृपा करके मुझे अपनाइए, क्योंकि मुझमें न तो कोई बल है, न बुद्धि, और न ही कोई अन्य उपाय (साधन) काम आ रहा है। अब मुझे केवल आपकी कृपा का ही आसरा है ।
हे श्यामा जू (श्री राधा)! यदि मैं अपने दोषों को गिनाना आरंभ करूँ, तो उनकी कोई गिनती ही नहीं है, वे तो अनंत हैं। किन्तु आप तो मेरे अंतरतम हृदय की हर बात को जानने वाली सर्वज्ञा स्वामिनी हैं। इसलिए, मैं केवल आपसे ही कृपा की याचना करता हूँ। आपकी कृपा से ही मेरी बिगड़ी बात बनेगी ।
हे परम करुणा निधान, नित्य किशोरी, श्री श्यामा प्यारी जू(श्री राधा)! कृपा कर मुझे यह आज्ञा दीजिए कि मैं सदैव अपने मन को आपके चरण कमलों में ही रखूँ ।
हे प्यारी श्री राधा स्वामिनी जू! आप तो सदा अपनी निज सहचरियों को सुख प्रदान करने वाली हो, अली माधुरी आपके चरणों की शरण में पड़ी, आपसे कृपा की याचना कर रही है ।
श्री धाम वृंदावन की कुंजों में, नित्य ही दोनों प्रिया-प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) परम आह्लाद पूर्वक, समस्त रसों के सार रस, नित्य विहार रस का वर्षन करते हैं।
श्री राधा की जय हो, जय हो, जय हो, जिनके गौर अंग की छवि बड़ी सुन्दर है, एवं जो चरण नख से शिखा पर्यन्त सुन्दर रूप माधुरी की अगाध सागर हैं, जिसको देखकर सबके मन को मोहनेवाले श्री श्यामसुंदर के नयनों को बहुत सुख मिलता है।
हे परम करुणामयी स्वामिनी श्री राधा, मेरी विनती को कृपा सुनो! तुम्हारे चरण कमलों को देखे बिना मुझे पल भर को भी चैन नहीं है ।