नित्य विहार पदावली

नित्य विहार पदावली निम्बार्क संप्रदाय के श्री हरिव्यास देवाचार्य के शिष्य श्री रूपासिक देवाचार्य द्वारा रचित नित्य विहार के पदों की एक काव्य रचना है।

16 लेख उपलब्ध हैं

  1. लाल संग लै पौढी ललनां - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (65)

    परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।

  2. तोसी न निहारी मैं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (58)

    हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प्रकार मान करना—यह अद्भुत कला तुमने कहाँ से सीखी है?

  3. आज विराजत आलीरी नवल किसोर - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (19)

    हे सखी! आज नवल किशोर श्री श्यामा श्याम अद्भुत रूप से विराज रहे हैं। भोर में दोनों एक दूसरे को आलिंगन किए हुए, एक दूसरे की भुजाओं में भुजाएं डाले रसरंग में भींजे हुए हैं।

  4. कर लै दरपन स्यांम दिखावत - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (63)

    श्री श्यामसुंदर अपने कर-कमलों में दर्पण लिए हुए दिखा रहे हैं एवं श्री श्यामा जू उसमें देख-देख के अपने सिर पर सुशोभित मोती को संवार रही हैं।

  5. अवकै तो करुणा कियैं बनैं वलि - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (71)

    हे स्वामिनी जू (श्री राधे)! अबकी बार तो आपकी कृपा मुझपर होनी बनती है। यह भवसागर अत्यंत विकराल एवं विपुल है, मैं तुम्हारी कृपा के बिना इस भँवर जाल रूपी सांसारिक द्वन्दों से कैसे पार उतर सकता हूँ ?

  6. कोंन तप कीनों नथ कैं मोती - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (44)

    श्री प्रिया जी (श्री राधा) के नथ के मोतियों ने ऐसी कौन सी तपस्या की है कि श्री राधा ने उन्हें अपने नथ का मोती बनाया है और वे नित्य ही अधर सुधा का आचमन करते हैं, और एक क्षण को भी बिछड़ते नहीं ।

  7. मेरौ कछु वस नाहिन करुणामई - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (72)

    हे करुणामई श्री राधिका, मेरे बस में कुछ भी नहीं है । मैं तो अपनी सुधि बुधि भुला कर भ्रम में भटक रहा हूँ, एवं अपने कर्मों द्वारा आपके प्रतिकूल चल रहा हूँ ।

  8. स्वस्ति श्री वृंदावन सर्वोपर राजमांन - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (36)

    मंगलकारी श्री धाम वृंदावन सर्वोपरि विराजमान है जहां सकल सुख निधान प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) विराजमान हैं।

  9. राधे प्यारी तें मोहन वस कीनौं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (25)

    हे श्री राधे प्यारी! आपने तो श्याम सुंदर को नित्य ही अपने वश में कर रखा है । समस्त लोक जिनके वश में हैं वही श्यामसुन्दर भगवान श्री कृष्ण आपके आधीन हैं ।

  10. राधे नाम सुन्यौ जब स्याम - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (62)

    श्री श्यामसुंदर को “राधे" नाम इतना रुचिकर है कि जब श्री श्यामसुंदर के कर्ण में “राधे” नाम पड़ता है तो उनके अंग अंग में प्रगाढ़ पुलकाली जागृत हो उठती है एवं उनका अंग अंग सुख का धाम बन जाता है ।

  11. प्यारी जू तुम्हीं हौ गति मेरी - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (70)

    हे प्यारी जु तुम ही मेरी गति हो । मैं तो तेरी जनम जनम की दासी हूँ, यदि मेरे द्वारा कोई अपराध [चूक] हो गए हों तो उसे क्षमा कर मेरे दुःख का हरण करिए ।