श्री रसखान

श्री रसखान मुस्लिम कवि थे, जो भगवान कृष्ण के भक्त बन गए थे । उन्होंने श्री विट्ठल नाथ जी से दीक्षा ग्रहण की थी।

114 लेख उपलब्ध हैं

  1. मित्र कलत्र सुबन्धु सुतइ नमें सहज सनेह - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (20)

    यद्यपि संसार में मित्र, पत्नी, भ्राता और पुत्र आदि संबंधों में स्वाभाविक अनुराग दृष्टिगोचर होता है, तथापि इसे 'विशुद्ध प्रेम' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। वास्तव में शुद्ध प्रेम की महिमा विलक्षण और वर्णनातीत है, जो निष्काम भाव से केवल प्रेमी को सुख देने के लिए ही किया जाता है।

  2. प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (26)

    जो प्रभु के प्रेम के बंधन में बँधकर मर जाता है, वही वास्तव में शाश्वत जीवन (अमरत्व) को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, प्रेम के इस गूढ़ रहस्य को जाने बिना, इस संसार में देह मात्र से जीवित रहने वाला व्यक्ति रसिकों की दृष्टि में मृत के समान है। ऐसा जीव मरने के बाद भी शाश्वत चिन्मय जीवन को प्राप्त नहीं कर पाता।

  3. खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    एक सखी अन्य सखी से फागलीला का वर्णन करते हुए कहती है कि हे सखी! मैंने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा को फाग (होली) खेलते हुए देखा है। उनके मुखों की सुंदरता की उपमा भला किससे दी जा सकती है? वह छवि तो केवल देखते ही बनती है, ऐसी कौन सी वस्तु है जिसे उस छवि पर न्योछावर न कर दिया जाए?

  4. स्वारथमूल असुद्ध त्यों सुद्ध स्वभाव अनुकूल - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (41)

    जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहा जाता है और जो निष्काम अथवा सहज भाव से केवल प्रियतम के सुख के लिए किया जाता है, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है। नारद आदि महर्षियों ने इन दोनों प्रकार के प्रेम का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।

  5. कैंधो रसखान रस कोस - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    श्री राधा के अद्भुत सौन्दर्य का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि विधाता ने संसार को प्यासा जानकर उसकी पूर्ण तृप्ति के लिए तुम्हारे नेत्रों में आनन्द की अखण्ड निधि भर दी है।

  6. याही तें सब मुक्ति तें लही बड़ाई प्रेम - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (35)

    प्रेम में दो शरीरों को एक कर देने की शक्ति होती है, इसी कारण प्रेम का स्थान मुक्ति से भी ऊँचा माना गया है। जहाँ प्रेम प्रकट हो जाता है, वहाँ समस्त नियम और बंधन स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं अर्थात् प्रेम किसी भी नियम का पालन नहीं करता।

  7. डरै सदा चाहे न कछु सहै सबै हो होय - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (22)

    रसखान कहते हैं — जो इस भावना से डरता रहता है कि कहीं उसकी किसी चेष्टा से प्रियतम को कोई कष्ट न हो जाए, जो अपने प्रियतम से कोई भी कामना नहीं रखता, सब प्रकार की विपत्तियाँ सहकर भी जिसका प्रेम बढ़ता रहे, जो सदा एक प्रियतम के प्रेम-रस में डूबा रहता है — वही प्रेम, शुद्ध प्रेम कहलाता है।

  8. जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं जात्यौ जात बिसेष - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (18)

    जिसे जाने बिना और किसी का बोध नहीं होता, और जिसे जानने पर स्वयं दिव्य ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् जिसका बोध हो जाने पर कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता, वही सारों का सार तत्त्व प्रेम है।

  9. नन्द महर कै बगर तन ऊब मेरे को जाय - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि नन्द महल के आँगन में अब मेरी बलाय जाय, अर्थात् मैं वहाँ बिल्कुल नहीं जाऊँगी क्योंकि वहाँ व्यर्थ ही मन रूपी चरण में प्रेम रूपी काँटा गड़ जायेगा, अर्थात् कृष्ण से प्रेम हो जायेगा।

  10. ज्ञान करम रु उपासना सब अहमिति को मूल - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (12)

    ज्ञान, कर्म-काण्ड, उपासना आदि यह सब मन में अहंकार उत्पन्न करते हैं। जब तक मनुष्य अपने को पूर्णतः प्रेममार्ग में नहीं समर्पित करता, उसके अनुकूल नहीं बनाता, तब तक भगवान में अटूट श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती।

  11. जोहन नन्दकुमार कौ गई नन्द के गेह - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    हे सखी! श्री कृष्ण के दर्शन करने के लिए मैं नन्द के घर गई थी। कृष्ण ने मुझे देखकर मुस्कुरा दिया। उनकी मुस्कान से प्रेम का मेघ बरस पड़ा, अर्थात मैं उनके प्रेम में पूरी तरह डूब गई।

  12. नैन दलालिन चौहटें मन माणिक पिय हाथ - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    एक गोपी कहती है, इन नेत्र-रूपी दलालों ने मेरे हृदय रूपी माणिक (बहुमूल्य रत्न) को बीच बाजार में श्री कृष्ण को बेच दिया और उन्होंनें (श्री कृष्ण ने) मेरे प्राणों को अपने वश में कर लिया। इस प्रकार मैंने ढोल बजाकर (प्रकट रूप से) अपने मन और प्राणों को बेच दिया है।

  13. पै मिठास या मार के रोम-रोम भरपूर - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (30)

    प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण रस से भरपूर हो जाता है। जो प्रेम में अपना बलिदान देता है वही अमरत्व को प्राप्त करता है। प्रेम में गिरता हुआ व्यक्ति ही वास्तव में संभलता है। जो अपने अहंकार को त्याग कर प्रेम की ओर अग्रसर होता है, उसी का जीवन सुधरता है।

  14. सरस नेह लवलीन नव द्वै सुजानि रसखानि - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    श्री रसखान कहते हैं कि जो रसिक श्री राधा और श्री कृष्ण के सरस एवं नूतन प्रेम में तल्लीन हैं, उन्हीं की कृपा की आशा और विश्वास से मेरे प्राण सदैव पगे हैं।