श्री रूप गोस्वामी

श्री रूप गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य थे जिन्होंने वृंदावन में श्री राधा दामोदर मंदिर में निवास किया और वहाँ भजन किया।

29 लेख उपलब्ध हैं

  1. त्वं भज हिरण्यगर्भ त्वमपि हरं - श्रील रूप गोस्वामी, पद्यावली (125)

    तुम चाहे ब्रह्माजी का भजन करो, तुम चाहे भगवान् शंकर का भजन करो, अथवा तुम चाहे उस निराकार परब्रह्म का ही भजन करो। किन्तु मैं तो उस श्रीधाम वृन्दावन की ही वन्दना करता हूँ, जो श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेमानन्द से पूर्णरूपेण ओत-प्रोत है।

  2. त्वद्वार्तोत्तर गीतगुम्फितमुखो - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (3.8)

    ललिता - हे राधे! श्रीकृष्ण की वंशी सदा तुम्हारे ही चरित्र का गान करती रहती है, वे तुम्हारी वेश-रचना के योग्य ही समस्त शिल्प क्रिया करते रहते हैं, समस्त गौएँ तुम्हारे नाम की हो रही हैं अर्थात्‌ गौओं को बुलाते समय वे राधे-राधे ही उच्चारण करते हैं। हे सुंदरि! श्रीकृष्ण के लिए लता समूह मण्डल यह श्रीवृन्दावन इस समय राधामय ही हो रहा है - सर्वत्र उन्हें तुम्हारा ही स्वरूप स्फुरित होता है ।

  3. पौर्णमासी-मयापि मोदकवृन्ददाना - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (1.59)

    पौर्णमासी जी कहती हैं - मैं लड्डू बाँटने के बहाने वृन्दावन जाती हूँ और वहाँ जाकर 'राधा'- इन दो मंगलमय अक्षरों के माधुर्य से कृष्ण के कानों को आनन्दित करूँगी ।

  4. तट-भुवि कृत-कान्तिः - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.243)

    यमुना के तट पर स्थित होने से ब्रज मंडल के वनों की शोभा और भी बढ़ जाती है, जहाँ भिनभिनाती मधुमक्षिकायें अनंत मधुरता से अलंकृत नव कदम्ब के वृक्षों का आश्रय लेती हैं जो मेरे मन में एक दिव्य भाव उत्पन्न करती है।

  5. अहो मधु-पुरी धन्या - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.237)

    ऐसा कौन सा बुद्धिमान व्यक्ति है जो ब्रज मंडल की शरण नहीं लेगा जिस धाम को वैकुंठ धाम से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है, जहां केवल एक दिन भी भाव से रहने से भगवान की भक्ति जागृत हो जाती है ।

  6. मथुरां च परित्यज्य - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.211)

    जो मूर्ख व्यक्ति मथुरा [ब्रज मंडल] को त्यागकर किसी अन्य स्थान से मोहित हो जाता है मानो वह मेरी माया से मोहित होकर जन्म-जन्मान्तर इसी संसार में भटकता रहता है।

  7. अन्येषु पुण्य-तीर्थेषु - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.235)

    अन्य स्थानों एवं धामों में मुक्ति ही सबसे बड़ा फल माना गया है जिसे वहाँ प्राप्त भी किया जा सकता है, परंतु भगवान की भक्ति, जो मुक्तों द्वारा भी वांछित है, उसे मथुरा [ब्रज] में प्राप्त किया जा सकता है।

  8. कदाहं यमुना-तीरे नामानि तव कीर्तयन् - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.156)

    हे कमल नेत्रों वाले भगवान कृष्ण, ऐसा कब होगा कि मैं वृंदावन में यमुना किनारे आपका कीर्तन गाते हुए आखों में आँसु भरकर नृत्य करूँगा?

  9. श्रीगान्धर्वासम्प्रार्थनाष्टकम् - श्री रूप गोस्वामी

    हे राधिके! मुझ पर कृपा कर अपना मुख कमल मेरे समक्ष ऐसे प्रकट करें, जब आप और श्री कृष्ण, मद गज के समान प्रेम में लीन वृन्दावन के कुंजो में विहार करते हैं।

  10. राधा पुरः स्फुरति पश्चिमतश्च राधा - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (5.18)

    हा, यह क्या है! मेरे आगे राधा, मेरे पीछे राधा, मेरे बायीं ओर मेरी सेव्य राधा, मेरे दाहिनी ओर राधा, इस पृथ्वी पर भी राधा, आकाश में राधा, राधामय ही मुझे यह त्रिलोकी क्यों हो गई?

  11. स्मेरां भङ्गी-त्रय-परिचितां - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.239)

    हे मेरे मित्र, यदि आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ ही सुख और चैन से रहना चाहते हैं, तो श्री कृष्ण के उस रूप को कदापि न देखें जो वृंदावन में यमुना नदी के तट पर केशी घाट में विहार कर रहे हैं, जिनके होंठों पर हल्की मुस्कान है, जो त्रिभंगी हैं एवं जिनकी आँखें इधर उधर उन्मत्ता पूर्वक घूम रही हैं, जिनके होंठों पर बांसुरी है और जिन्होंने सिर पर मोर पँख धारण कर रखा है।

  12. सर्वथा ध्वंसरहितं सत्यपि ध्वंसकारणे - श्री रूप गोस्वामी, उज्जवल नीलमणि (14.63)

    ध्वंसका (प्रेम नष्ट) का कारण होने पर भी जो ध्वंस नही होता, जो कभी रुकता, घटता और मिटता नही, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, उसे 'प्रेम' कहते है । प्रेम की ज्यो-ज्यो प्रगाढ़ता होती है, त्यों-त्यों उसमे नये-नये रूपो का आविर्भाव होता रहता है ।

  13. श्री राधा दामोदर मंदिर, वृन्दावन

    श्री श्री राधा दामोदर मंदिर 1542 ईसवी में श्री जीव गोस्वामी द्वारा स्थापित एक प्राचीन मंदिर है। राधा दामोदर की सेवा श्री जीव गोस्वामी द्वारा की जाती थी। श्री राधा दामोदर को श्रील रूप गोस्वामी द्वारा प्रकट किया जिन्हे उन्होंने सेवा और पूजा के लिए अपने प्रिय शिष्य और भतीजे-जीव गोस्वामी को दिया। श्री रूप गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी की समाधि। श्री रूप गोस्वामी के भजन कुटिया और समाधि: श्री श्री राधा-कृष्ण की शीर्ष सेवक श्री रूप मंजरी हैं। उनका भजन-कुटिया और समाधि-मंदिर श्री श्री राधा दामोदर मंदिर के आंगन में स्थित हैं। जीव गोस्वामी समाधि: जीव गोस्वामी की समाधि राधा दामोदर मंदिर में स्थित है। श्रीला कृष्ण दास कविराज गोस्वामी समाधि: श्रीला कृष्ण दास कविराज गोस्वामी की समाधि राधा दामोदर मंदिर में भी स्थित है। अन्य वैष्णव संतों की पुष्प समाधि भी मंदिर में स्थित हैं।

  14. श्री गोविंद देव, वृंदावन

    यह प्रसिद्ध मंदिर 'सात गोस्वामी मंदिर' में से एक है जिसे श्री रूप गोस्वामी ने स्थापित किया था, जिसने भगवान गोविंदा के देवता को उस जगह पर जमीन पर दफनाया जहां अब गोविंद जी का राजसी मंदिर खड़ा है। गोविंद जी देवता को मूल रूप से पांच हजार साल पहले कृष्णा के महान पोते वज्रनाभ् महाराजा ने गोविंद जी योग-पीठ के नाम से जाना था। मूल गोविंद देव जी देवता मुगल साम्राज्य के दौरान जयपुर चले गए थे।

  15. परमरसग्हस्य नन्दनिस्यन्दिवृन्दा - श्री निकुंज रहस्य तत्व, श्री रूप गोस्वामी

    कृपया किसी भी किताबों के विरोधी तर्कों को अनदेखा करें और पूरी तरह से श्री राधा कृष्ण की पूजा करें, जो परम आनंद के बहते अमृत से भरे वृंदावन के वन कुंजो में असीमित अनुवांशिक समय का आनंद देते हैं।

  16. तेरा कदंब - नन्द गांव- रूप गोस्वामी की भजन स्थली!

    तेरा का मतलब है बुलाना और कदंबा मतलब पेड़। इस जगह का बहुत महत्व है क्योंकि श्री कृष्ण कदंब के पेड़ के नीचे खड़े अपनी गायों को बुलाते थे। आज भी यहां गोपाष्टमी का त्यौहार बहुत ही पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। यह श्री रूप गोस्वामी की ध्यान स्थल भी है। श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों पर श्री रूप गोस्वामी ब्रज आए और यहां उनके भजन को शुरू कर दिया। इसलिए यह श्री रूप गोस्वामी की भजन स्थली भी है।

  17. श्री कृष्ण के दो अलग-अलग अवतार श्री चैतन्य महाप्रभु जी रूप गोस्वामी को बताते हैं

    श्री रूप गोस्वामी ने एक बार विचार किया, "श्री चैतन्य महाप्रभु जी की अंततः हृदय की इच्छा को पूरा करने के लिए, मैं एक नाटक लिखूंगा ।