मथुरामण्डलं रम्यं सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम् - सनत्कुमार संहिता (32.2)
मनोहर मथुरा-मण्डल समस्त तीर्थों में श्रेष्ठतम है। उसके मध्य में पाँच योजन तक विस्तृत परम रमणीय श्रीवृन्दावन स्थित है।
श्री हंस भगवान के चार शिष्य हुए। वे चार शिष्य ब्रह्मा के चार पुत्र सनक, सनंदन, सनातन और सनत थे। इन चारों ने भगवान हंस की शिक्षाओं को लिपिबद्ध करते हुए ‘अष्टयम लीला’ और ‘गोपी भाव उपासना’, पुस्तकों की रचना की। इन पुस्तकों को सनतकुमार संहिता भी कहा जाता है।
29 लेख उपलब्ध हैं
मनोहर मथुरा-मण्डल समस्त तीर्थों में श्रेष्ठतम है। उसके मध्य में पाँच योजन तक विस्तृत परम रमणीय श्रीवृन्दावन स्थित है।
जो एकान्तिक निकुञ्ज-केली-लीलाओं के सुख का मूल (आश्रय) हैं तथा सखियों के प्रेम को बढ़ाने वाली हैं, जो निष्पाप हैं, जो सदा श्रीकृष्ण के आनन्द एवं महिमा को बढ़ाने वाली हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर प्रसन्न हों।
मुझे श्रीधाम वृन्दावन का एक तुच्छ सियार बनना भी स्वीकार है, परंतु ज्ञानियों की तथाकथित मुक्ति नहीं चाहिए — क्योंकि उस निर्लिप्त मोक्ष में वह रस-लवलेश भी नहीं है, जो वृन्दावन में सहज ही उपलब्ध है।
श्रीकृष्ण ने शिवजी से कहा — हे रुद्र! तुम मेरी प्रिया श्रीराधा की शरण में जाओ। जो श्री राधा की कृपा का पात्र बनता है, वह सहज ही मुझे अपने वश में कर लेता है। यह अत्यंत गोपनीय, परम गूढ़ रहस्य मैंने तुम्हें आज प्रकट किया है ।
भक्तों के आनंद का वर्धन करने वाली, ध्यान का परम विषय, करोड़ों सूर्य-चन्द्रों की कान्ति को हेय कर देने वाली, हे राधिका, मुझ पर कृपा करो!
भगवान शिव नारदजी से कहते हैं—हे ऋषिवर, वे भगवान, जो वासुदेव के पुत्र और मथुरा के राजा हैं, वे श्रीकृष्ण ही मथुरा में प्रस्थान करते हैं। परंतु जो नंद लाल (श्री कृष्ण) हैं, वे वृंदावन को कभी नहीं त्यागते । वे तो सदा वृंदावन की कुंजों में लीलामग्न होकर छिपे रहते हैं।
व्रजराज नंदनंदन श्री कृष्णचन्द्र पूर्णतम स्वरूप से श्री वृंदावन धाम में सदा वास करते हैं जहां वे सोलह कलाओं से युक्त होकर नित्य विहार करते हैं ।
श्री कृष्ण श्री शिवजी से कहते हैं – हे शिव! तुम भी मेरी प्रिया वल्लभा श्री राधिका का आश्रय लेकर, मेरे युगल मंत्र का जप करते हुए, सदा मेरे आलय (घर) श्री वृंदावन में ही रहना।
श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे महेश्वर! जो जन मेरा प्रपन्न (शरणागत) होकर मेरी प्रिया (राधा) का प्रपन्न नहीं होता है । वह मुझको कभी प्राप्त नहीं हो सकता । यह मैंने तुम्हें स्पष्ट रूप से बताया है।”
हे कृष्ण की स्वामिनी ! कृष्ण की प्राणभूता ! कृष्ण के मन को चुराने वाली ! भक्तों को अपना धाम देने वाली, हे श्री राधिके! तुम मुझपर प्रसन्न हो!
श्री कृष्ण श्री शिवजी से कहते हैं – श्री राधा के प्रेम से वशीभूत होकर मैं सदा नित्य ही उनके संग विहार करता हूँ । श्री राधिका को ही मेरी प्रिया जानना और वे ही पर देवता हैं ।
श्री कृष्ण श्री शिवजी से कहते हैं – यह वृंदावन, आनंद कन्द नाम से प्रसिद्ध है जिसमें प्रवेश करने मात्र से ही पुनर्जन्म नहीं होता है ।
त्रैलोक में पृथ्वी धन्य है,उस में जम्बुद्वीप श्रेष्ठ है, उस में भारत वर्ष श्रेष्ठ है, और भारत वर्ष में मथुरा पुरी श्रेष्ठ है । उस में वृन्दावन श्रेष्ठ है, उस में गोपी समूह श्रेष्ठ हैं, उस में राधासखीवर्ग श्रेष्ठ हैं, उस में श्री राधिका सर्वश्रेष्ठ हैं ।
श्री कृष्ण शिव जी से कहते हैं - मेरे वृन्दावन में आकर जो मूढ़ जन अन्यत्र गमन करता है, महादेव वह आत्मघाती होता है, इस में कोई संशय नहीं है ।
शिवजी नारद जी से बोले: श्री राधिका की अनुचरी बनकर श्री राधिका की नित्य सेवा परायण रहकर, श्री कृष्ण से भी अधिक प्रेम श्री राधिका में करना ही सर्वोत्तम भक्ति भाव है ।
श्रीराधा कृष्ण ने परस्पर मिलकर जब आनन्दमयी सुरति केलि की, उस समय श्री राधा के नूपुर का जो शब्द हुआ उसी को शब्द ब्रह्म कहते हैं । उसी शब्द से मायातीत 'पुरुष' प्रकट हुआ जिससे प्रकृति तथा पुरुष (मायान्तर्यामी) आविर्भाव हुए। जिनसे श्रीनारायण प्रकट हुए। इनकी नाभि कमल से वेद वेत्ताओं में श्रेष्ठ श्री ब्रह्माजी प्रकट हुए । उनसे श्रीमहादेव जी तथा अन्य प्रजापति प्रकट हुए ।
साधक को अंतस्चिंतित (मानसिक) देह से श्री कृष्ण प्रेयसी श्री राधिका की सखी भाव को यत्न पूर्वक आश्रय करके, आलस को त्याग कर, अहर्निश उन दोनों (राधा कृष्ण) की सेवा में लग जाना चाहिए ।
एक समय श्रीप्रियाजू ने श्री लाल जू के साथ परम पवित्र सुरति केलि की जिससे उनके मुखारविंद पर स्वेद विन्दु आये उनको देखकर सखियों में श्रेष्ठ श्रीललिता जी कहने लगी: आप दोनों के लीला विलास के श्रम से जो, मुखारविंद में परम पवित्र श्रम कण आये हैं निश्चय इनसे कोई उत्तमा नदी प्रकट होनी चाहिये उसके जल को हम सब सखी पान करेंगी। आप प्रसन्न होकर इनसे एक नदी निर्माण करिये। आपका जो लीला विलास का श्रम जल है यह परम पवित्र है। इस प्रकार श्रीललिता जी के वाक्य सुन कर श्री युगल ने परम पवित्र नदी श्रीयमुना जी को प्रकट किया।
मथुरा मण्डल में यमुना तट पर स्थित यह भव्यधाम वृन्दावन लता पता, द्रुम-पल्लवों से अत्यन्त सुशोभित है । वहाँ के वृक्ष सदा फूले-फले हुए रहते हैं । सभी ऋतुयें समान रहती हैं । वहाँ का प्रत्येक जीव-जन्तु सहज ही युगलकिशोर के ध्यान में तत्पर रहता है ।
श्रीकृष्ण के विहार के लिये विविध प्रकार की कुजें हैं। यद्यपि ये असंख्य हैं, तो भी स्थूल रूप से इनकी संख्या लगभग एक हजार है। ये कुञ्जे इतनी सुन्दर हैं कि इनकी कान्तियों से अन्य लोकों को कान्तियों का तिरस्कार हो रहा है ।