रस रसिकन को रस पान - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (01)
रस ही रसिकों का जीवनाधार है। वही उनका आहार, भोग और आत्मिक पोषण है। श्री राधा और श्रीकृष्ण के संयोगमय (नित्य विहार) रस के बिना वे क्षणभर भी नहीं रह सकते।
