श्रृंगार रस के पद [श्री ललित किशोरी देव]

श्री राधा कृष्ण के श्रृंगार रस को समर्पित पदों का संकलन श्री ललित किशोरी देव जी द्वारा लिखित 'श्री ललित किशोरी देव जी की वाणी' नामक ग्रंथ का भाग है।

22 लेख उपलब्ध हैं

  1. रस रसिकन को रस पान - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (01)

    रस ही रसिकों का जीवनाधार है। वही उनका आहार, भोग और आत्मिक पोषण है। श्री राधा और श्रीकृष्ण के संयोगमय (नित्य विहार) रस के बिना वे क्षणभर भी नहीं रह सकते।

  2. मैं जानी मैं जानी लडैती जू - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (55)

    हे लाड़िली जू! अब मैंने आपके वास्तविक स्वरूप और महिमा को जान लिया है। हे किशोरी जी! आप अत्यंत उदारमयी हैं और विलक्षण प्रेम एवं आनंद की अक्षय निधि हैं।

  3. रस मत्त बिहारिनि प्यारी है - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (69)

    श्री कुंजबिहारिन (श्री राधा) प्यारी प्रेमोन्माद में उन्मत्त रहती हैं। उनका रूप अद्भुत उज्ज्वलता से युक्त है; केवल थोड़ी सी दृष्टि से निहारने मात्र से ही श्री कृष्ण उनके अधीन हो जाते हैं।

  4. सहज बिहार निरन्तर मेरौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (103)

    प्रिया-प्रियतम की कृपा से उनका नित्य विहार मुझे अब सहज उपलब्ध है। दोनों प्रिया-प्रियतम तन-मन से एक होकर विहरण करते हैं, और हर क्षण प्रेम और भी अधिक गहरा होता रहता है।

  5. लडैती आनंद निधि सुखरासी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (2)

    नित्य विहारिणी श्रीराधा आनंद की निधि और सुख का अगाध सागर हैं। वह महाप्रेम से भरी हुई, सहज रूप से छबीली एवं सदा अपने प्रियतम कुंजबिहारी के निकट रहती हैं।

  6. लडैती जू तेरी रङ्ग भरी मुसिक्यानि - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (10)

    हे लड़ैती जू (श्री राधा), आपकी मुस्कान प्रेम रंग से भरी है, जो सुख की अद्भुत खान है एवं तन-मन में आनंद को बढ़ाने वाली है।

  7. श्री कुंजबिहारिनी सब सुखकारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (65)

    श्री कुंज बिहारिणी (श्री राधा) समस्त सुखों का दान करने वाली हैं। श्रीधाम वृंदावन के निभृत निकुंज में, वे अपने प्रियतम कुंजबिहारी के संग सदा “नित्य विहार” के एक रस में निमग्न रहती हैं।

  8. बिहारिनि तेरेई रंग रंगी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (20)

    हे मेरी प्यारी श्री बिहारीनी जू (श्री राधा), मैं तो सदा से तुम्हारे ही रंग में रंगी हुई हूँ । तुम्हारे पक्ष में ही सदा खड़ी होकर, तुम्हारे ही प्रेम में डूबी हुई हूँ ।

  9. मेरी बिहारिनि मेरी मेरी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (89)

    मेरी बिहारिनी (राधा), मेरी है, मेरी है जो तन और मन से मिली हुई, रस में उन्मत्त होकर, विहारण करती है तथा मेरी ओर निहार निहार कर हर क्षण मुस्कुराती है ।

  10. सुख रासि हमारी प्यारी जू - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (15)

    हमारी प्यारी जू [श्री राधा] सुख की राशि हैं । वे प्रगाढ़ आनंद से सदा भरी रहती हैं, रस में उन्मत्त होकर, रोम रोम से प्रेम बरसाती हैं ।

  11. आजु सखी आये मेह सुहाये - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (45)

    अरी सखी! आज इधर आकाश में सुन्दर श्याम घन को उमड़ता देखकर उधर निकुंज मन्दिर में प्रिया जी आनंदमयी गौर-घटा बनकर उमड़ पड़ी हैं और प्रियतम पर प्रेम रस की घनघोर वर्षा करती हुई अघा नहीं रहीं हैं ।

  12. जै राधे मेरी प्रान अधार - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (8)

    श्री राधे रानी की जै हो, जो मेरे प्राणों की एक मात्र आधार हैं । वे सदा अद्भुत रंग रूप एवं रस की वर्षा करती हैं एवं महा प्रेम एवं सर्वोच्च सुख का सार स्वरूपा हैं ।

  13. जै जै जै लड़ैती प्यारी की - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (54)

    लड़ैती प्यारी श्री राधा की जय हो, जय हो, जय हो जो कुंजों में नित्य विहार करती हैं, जो अति हितकारिनी हैं एवं जिनका अद्भुत रूप उज्जवल है ।

  14. तो सी तुही मेरी प्रान पियारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (71)

    हे मेरी प्रान प्यारी श्री श्यामा प्यारी, आपके समान तो केवल और केवल आप ही हो, अन्य कोई नहीं (अर्थात श्री राधा जू की तुलना अन्य किसी से कदापि नहीं की जा सकती) । इस अखंड नित्य विहार में तन से तन मिला है, मन से मन मिला है, और भाव से भाव मिला है, एक क्षण को भी विलग नहीं होती ।

  15. प्रीति की रीति रंगीलीये जानें - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (37)

    प्रीति की रीति तो रंगीली [श्री राधा] ही जानती हैं, जो अपना तन, मन, धन श्री श्याम सुंदर को ही मानकर नित्य ही अपने हृदय से प्रेमपूर्वक लगायी रखती हैं ।

  16. सरि कौन करै मेरी प्यारी की - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (45)

    मेरी प्यारी श्री राधिका की समानता कौन कर सकता है? जिनका रूप सौंदर्य साक्षात रूप को भी मोहित कर लेता है; जिन्हें श्री बांके बिहारी [भगवान कृष्ण] अपलक नेत्रों से निहारते रहते हैं।

  17. आजु सखि आये मेह सुहाये - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (45)

    अरी सखी ! आज इधर आकाश में सुन्दर श्याम-घन को उमड़ता देखकर उधर निकुंज-मन्दिर में प्रिया जी आनन्दमयी गौर-घटा बनकर उमड़ पड़ी हैं और प्रियतम पर प्रेम-रस की अजस्र बर्षा करती हुई अघा नहीं रही हैं।