रस में रस पियें कुंजबिहारी - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (101)
कुंजबिहारी श्री कृष्ण रस के सागर में मग्न होकर निरंतर प्रेम-रस का ही पान करते हैं। उनकी आपसी बातचीत और समस्त हाव-भाव भी केवल रस से ही ओत-प्रोत हैं तथा वे परस्पर एक-दूसरे को अत्यंत अनुराग और रसपूर्ण दृष्टि से निहारते हैं।
