श्री राधा सिद्धांत
श्री राधा सिद्धांत ललित संप्रदाय के संस्थापक श्री वंशी अली जी द्वारा लिखित श्री राधारानी की अनन्य भक्ति के सिद्धांत का पोषण का वर्णन करने वाले दोहों [संस्कृत] का संकलन एवं रचना है ।
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अन्यथा त्वनवस्था स्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (08)
यदि ऐसा न माना जाए कि समस्त शक्तियाँ श्री राधा के अधीन हैं, और श्री राधा को भी किसी अन्य के अधीन माना जाए, तो अनवस्था-दोष उत्पन्न होगा। अतः श्री राधा के भक्त को यही मानना चाहिए कि समस्त शक्तियाँ श्री राधिका के आश्रित एवं अधीन हैं और वे स्वयं पूर्णतः स्वाधीन हैं।
बृजे सख्य रसा विष्ठा सख्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (45, 46)
ब्रज में सख्य रस में निमग्न श्री ललितादिक सखियाँ हैं जो श्री राधा के चरण-कमलों के बिना आधे पल का भी वियोग सहन नहीं कर सकतीं। वे श्री राधिका को ही अपना पति मानती हैं और सदा उन्हीं के आश्रय में रहकर नथ, कड़े, चूड़ियाँ, झलका आदि सौभाग्य-चिह्न धारण करती हैं।
भजन्ति राधिकां येतु ते- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (91)
जो श्री राधिका का नित्य भजन करते हैं, वे सदा श्री राधिका के समीप ही रहते हैं। वे एक क्षण के लिए भी उनसे विलग नहीं होते अथवा यों कहें कि वे अष्ट सखियों के ही अंशावतारी हैं।
श्रीराधा भजनीया च तद्भक्तकानां - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (97)
श्री राधा का भजन करना और उनके अनन्य भक्तों का संग करना चाहिए। बुद्धिमानों को यह नित्य करना चाहिए, जिससे किशोरीजी के चरणों में भक्ति दृढ़ होती है — यही सिद्धान्त का मत है।
निरये स्थिति रेवास्तु - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (101)
भले ही मुझे नरक का वास मिले, भले ही कभी भी परम पद की प्राप्ति न हो, जहाँ-तहाँ कहीं भी जन्म मिलता रहे—परंतु श्री राधा के चरणों की अनन्य भक्ति अथवा उन श्री चरणों की सेवा से मेरा मन कभी भी विचलित न हो।
नित्यं भक्तपराधीना तेन राधा बिहारिणी - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (21)
श्री राधिका महारानी नित्य ही भक्त के आधीन हैं। श्री कृष्ण उनके अनन्य भक्त हैं, उनकी भक्ति के आधीन होकर, स्वामिनीजी समान भाव से, श्री कृष्ण के संग विहार करती हैं । अपने भक्त की रुचि के अनुसार ही स्वामिनी जी उस रस से ही भक्त को भी भजती हैं।
किं करिष्यन्ति नो वेदा - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (102)
श्री राधा के अनन्य भजन में न मुझे वेद–शास्त्र की आज्ञा की आवश्यकता है और न ही किसी अन्य देवता या ईश्वर को प्रसन्न करने अथवा उनसे भयभीत होने की आवश्यकता है। चाहे वे मेरे लिए शुभ हों या अशुभ — मुझे इसकी कोई परवाह नहीं । मुझे तो केवल स्वामिनीजी की चरण–सेवा चाहिए, जो देवताओं की कृपा या वेद–विधान से नहीं, केवल श्री राधा महारानी की कृपा से ही प्राप्त होती है।
न लोकाच्च भयं किंचित न - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (99)
श्री राधा के चरणों की भक्ति में ऐसा कमाल है कि न तो लोक का कोई भय रह जाता है, न ही वेद-शास्त्र आदि के बंधनों का कोई भय रहता है। इतना ही नहीं, ऐसे अनन्य श्री चरणों के भक्त को किसी विशेष संप्रदाय को धारण करने की इच्छा भी नहीं रहती। उसे तो केवल श्री राधा के चरणों की अनन्य एवं निष्काम भाव से सेवा करने की ही एकमात्र लालसा रह जाती है।
राधाभक्तपदाम्भोज - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (17)
श्री राधा महारानी के अनन्य भक्तों की चरण-धूलि को अपने मस्तक पर धारण कर लेना चाहिए। फिर यम-नियम आदि अन्य साधनों की क्या आवश्यकता? न तो वैराग्य की आवश्यकता रह जाती है, और न ही जप आदि की। स्वामिनीजी के अनन्य भक्तों की चरण रज ही उद्धार करने के लिए पर्याप्त है।
मुञ्चन्त्यश्रूणि सरव्यस्तु - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (26)
श्री राधा के अलौकिक सौंदर्य रूपी मतवाले हाथी से कुचले गए, उनके प्रेम में बँधे हुए उनकी अनन्य सखियाँ और स्वयं श्रीकृष्ण सदा नेत्रों से प्रेमाश्रु बहाते रहते हैं।
राधां समर्प्यये चान्नं - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (16)
श्री राधा को सर्मपण करके जो मनुष्य प्रसाद ग्रहण करते हैं, उनके कोटि पाप इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे अग्नि रुई के ढेर को भस्म कर देती है।
कटाक्ष दृक निपातेन - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (27)
श्री राधा की केवल एक तिरछी कटाक्ष में ऐसा अद्भुत जादू है कि उसको देखने वाले श्रीकृष्ण और उनके अनन्य भक्तों के हृदय और आत्मा पूरी तरह से बिंध जाते हैं। कामनाओं की तो बात ही क्या है, वह चितवन अन्य किसी रूप का ध्यान या चिंतन करने का कोई अवकाश ही नहीं छोड़ती।
एवं सिद्धो निर्विकल्पो रतिरुपो रसोवने - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (73)
श्री राधा का नित्य विहार सुंदर वृंदावन धाम में ही होता है, अत: वहाँ का वास सर्वोपरि है । वहीं पर कृष्ण और लालितादिक के ह्रदय में नित्य सिद्ध निर्विकल्पक रस विद्यमान है ।
कृष्ण: सख्यश्च राधाया: भक्ता: - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (5)
श्री राधा की सेवा, एवं वंदना उसी भाव से करना चाहिए जिस भाव से श्री कृष्ण एवं उनके चरणों के आश्रित अनन्य भक्त ललिता आदि करते हैं ।
अद्यैव शरणापन्ने तथा श्री ललितादिषु - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (89)
जो जीव श्री राधा की शरण में अभी तुरंत ही आया है वह भी उनको उतना ही प्रिय है, जितने कि श्रीकृष्ण और ललितादि । श्री राधा की दृष्टि में दोनों में अणुमात्र भी भेद नहीं है ।
संयोगस्य वियोगस्य - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (96)
जहां संयोग और वियोग का निश्चय ही न हो सके, इन दोनों से भिन्न स्थिति जहां हो, और दोनों (संयोग एवं वियोग) जहां एक रूप होकर रहते हों, वही अद्बुत रस नित्य विहार है ।
तन्नामांकित धामेषु सम्बन्धानुगतेषुच - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (86)
श्री राधा नाम से अंकित धाम में तथा उनसे सम्बन्धित किसी भी स्थान पर जो श्रीराधा की लीलाओं के उद्दीपक हो, निवास करना सिद्धिप्रद होता है।
नापेक्षते च या शास्त्रं प्रेमैकप्रचुरा भवेत् - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (25)
श्री राधा प्रेम की विशुद्ध मूर्ति हैं जो शास्त्रों से परे हैं तथा वे अपने अनन्य भक्त श्री कृष्ण एवं अन्य सखियों के हृदय में नित्य विराजमान रहती हैं ।
स्यादब्रह्मपरपर्याय: सर्वानुस्यूतरूपिणी - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (7)
श्री राधा का ही पर्यायवाची [दूसरा नाम] परम ब्रह्म है जो सर्ववस्तुओं एवं प्राणीमात्र में अनुस्यूत है । वे स्वतंत्र हैं तथा सब कुछ उसके [श्री राधा के] आश्रित हैं ।
उत्सवास्तु ब्रजे ज्ञेया - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (92)
ब्रज लीला से संबंधित सभी उत्सव नैमित्तिक हैं । उनकी आवश्यकता श्री राधा के चरणों में प्रेम को दृढ़ करना ही है । निकुंज की शुद्ध रसमयी लीलायों से इनको प्रथक ही मानना चाहिए ।