शेष महेश दिनेश गणेश लौं - श्री प्रेम जी
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
69 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।
श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।
श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।
सच्चे प्रेमी भक्त के लक्षण बताते हुए सहजो बाई कहती हैं कि कभी वह भक्त प्रेम-भाव में इतना डूब जाता है कि स्तब्ध रह जाता है और उसे बाहर की कोई सुधि नहीं रहती। कभी-कभी वही प्रेम का वेग उसे सहसा गाने के लिए प्रेरित करता है। कभी वह आँखें मूँदकर ध्यान में लीन हो जाता है, और कभी अपनी चेतना में लौटकर बाह्य जगत की सुधि में आ जाता है।
जो ब्रह्मा के ध्यान में एक क्षण के लिए भी नहीं आते, जिनका शंकर जी पूर्ण एकाग्रता से समाधि लगाकर ध्यान कर रहे हैं।
हे प्यारी ! आपके चरणारविंद से नूपुर ध्वनि की सुंदर झंकार का श्रवण कर, श्रीवृन्दावन की समस्त अचल सम्पत्ति चलायमान हो रही है एवं चलायमान अचल हो रहे हैं। खग- मृग आदि पक्षीगण एवं अन्य जन्तु मुनियों की भाँति रस-समाधि में तदाकार हो रहे हैं।
श्री चतुरदासजी का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में किसी मथुरिया चतुर्वेदी परिवार में भाद्र शुक्ल 6, 1753 को हुआ था।
श्री परमानंददास जी ब्रज के रसिक संत थे और पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में से एक थे । श्री परमानंद दास जी अपने द्वारा रचित छंदों का बड़े मधुर राग में गान और कीर्तन करते थे ।
ललित कुंज वृंदावन में स्थित है जो श्री वंशी अली जी की भजन स्थली एवं समाधी स्थली है । यहीं श्री वंशी अली जी भजन करते थे एवं अपने आराध्य श्री किशोरी रमण जी की सेवा करते थे ।
हे मित्र, यदि तू बाँके बिहारी की अनन्य भक्ति करेगा तो तू सपने में भी योग, जप, संयम, समाधि, भुक्ति, एवं मुक्ति के सुख को नहीं निहारेगा।
श्री गोविंद स्वामी (1505 - 1586), पुष्टिमार्ग के अष्ठछाप कवियों में से एक थे, जो गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे । इन्होने ब्रज में इसी स्थान पर निवास कर भजन किया, जो ऐरावत कुंड, जतिपुरा के पास स्थित है ।
श्री ललित किशोरी जी का जन्म लखनऊ में मिती कार्तिक कृष्णा में द्वितीय दिन सन 1825 में हुआ था। इनके पितामह शाह बिहारीलालजी उस समय लखनऊ में प्रसिद्ध धनाढ्य थे नवाबों से उनको “शाह" उपाधि प्राप्त थी।
ताज बीबी श्री कृष्ण की परम भक्त थीं । इनका जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था । ताज बीबी के पिता का नाम पद्न खान था । ताज बीबी का विवाह बादशाह अकबर के साथ हुआ था ।
जिसका ध्यान ब्रह्मा आदि देवता समाधि में करते हैं, और योग की सिद्धियों को प्राप्त करने पर भी जिनका अंत नहीं पा सकते।
श्रीनाथजी का मंदिर पूंछरी, गोवर्धन में स्थित है । गोवर्धन जी का आकार मयूर के समान है एवं पूंछरी गोवर्धन जी की पूंछ है, ऐसी मान्यता है ।
न मैंने उन्हें वेदों में देखा है, न ही ब्रह्म शास्त्रों में। मैंने उन्हें वेदांत दर्शन या ब्रह्म के मूल में भी नहीं पाया।
जब श्री कृष्ण के कहने से ब्रजवासी गोवर्धन की पूजा करने लगे तो इन्द्र क्रोधित हो घनघोर वर्षा करने लगे और ब्रज मण्डल जल-मग्न होने लगा । सबकी रक्षा हेतु श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ ऊँगली पर गोवर्धन पर्वत धारण किया ।
श्री बणीठणी जी की रचना बड़ी सरस है एवं युगल किशोर श्री श्यामाश्याम की लीलाओं से परिपुष्ट है। इन्होने अपने उपास्य श्री राधा कृष्ण के यश का विस्तार किया।
संकर्षण कुंड ब्रज में सबसे महत्वपूर्ण लीला स्थलों में से एक है। इस कुंड का नाम भगवान कृष्ण के बड़े भाई संकर्षण के नाम पर रखा गया है, जिन्हें बलदाऊ या दाऊजी के नाम से भी जाना जाता है।