Samadhi
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कीरति की कामना चढ़ाय चित्त - श्री कान्त किशोर, श्री कान्त किशोर जी की वाणी (11)
जिन्होंने अपने चित्त में यश की कामना और धन की आशा रखकर श्रीराधा-कृष्ण के कुंज-विलास की काव्य-रचनाएँ गाई है अथवा घर-बार का त्याग करने पर भी देह की सुख-सुविधा और श्रृंगार आदि की इच्छा संजोई है, उनके मन में सांसारिक आशाओं और वासनाओं का नगाड़ा ही बज रहा है।
बृजमाँहि महा निज धाम बन्यो - ब्रज के सवैया
ब्रजमंडल में साक्षात् परम निज धाम प्रकट हुआ है, जहाँ समस्त देवता और असुर भी इस पावन भूमि का आश्रय लेने के लिए शरीर धारण करके निवास कर रहे हैं।
लगी समाधि बिहार की छुटै - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (319)
श्री हरिदासी (स्वामी श्री हरिदास जी) के निकुंज-धाम में श्री गौर-श्याम (श्री राधा-कृष्ण) सदैव निरंतर विहार करते रहते हैं। इस दिव्य युगल-विहार की ऐसी अखंड समाधि लग गई है, जो दिन-रात कभी भी भंग नहीं होती है।
गावैं सुनि गनिका गन्धर्ब औ - श्री रसखान रत्नावली
जिन भगवान के गुणों का गान गन्धर्व, सरस्वती और शेषजी निरन्तर करते हैं, जिनकी महिमा का यथार्थ वर्णन कोई नहीं कर सकता।
शेष महेश दिनेश गणेश लौं - श्री प्रेम जी
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)
मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।
चितवत चित करषत जिते - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (54)
श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।
रास-रस रसिक रँगीली राधा - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)
श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।
कबहूँ हकधक हो रहै, उठै प्रेम हित गाय - श्री सहजो बाई
सच्चे प्रेमी भक्त के लक्षण बताते हुए सहजो बाई कहती हैं कि कभी वह भक्त प्रेम-भाव में इतना डूब जाता है कि स्तब्ध रह जाता है और उसे बाहर की कोई सुधि नहीं रहती। कभी-कभी वही प्रेम का वेग उसे सहसा गाने के लिए प्रेरित करता है। कभी वह आँखें मूँदकर ध्यान में लीन हो जाता है, और कभी अपनी चेतना में लौटकर बाह्य जगत की सुधि में आ जाता है।
ब्रह्मा हूँ के ध्यान में न आवै कभू एक क्षण - ब्रज के कवित्त
जो ब्रह्मा के ध्यान में एक क्षण के लिए भी नहीं आते, जिनका शंकर जी पूर्ण एकाग्रता से समाधि लगाकर ध्यान कर रहे हैं।
तेरे नूपुर - धुनि री प्यारी स्रवन सुनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (33)
हे प्यारी ! आपके चरणारविंद से नूपुर ध्वनि की सुंदर झंकार का श्रवण कर, श्रीवृन्दावन की समस्त अचल सम्पत्ति चलायमान हो रही है एवं चलायमान अचल हो रहे हैं। खग- मृग आदि पक्षीगण एवं अन्य जन्तु मुनियों की भाँति रस-समाधि में तदाकार हो रहे हैं।
श्री चतुरदासजी की जीवनी
श्री चतुरदासजी का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में किसी मथुरिया चतुर्वेदी परिवार में भाद्र शुक्ल 6, 1753 को हुआ था।
श्री परमानंद दासजी की समाधि, सुरभि कुंड, गोवर्धन
श्री परमानंददास जी ब्रज के रसिक संत थे और पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में से एक थे । श्री परमानंद दास जी अपने द्वारा रचित छंदों का बड़े मधुर राग में गान और कीर्तन करते थे ।
ललित कुंज, वृंदावन
ललित कुंज वृंदावन में स्थित है जो श्री वंशी अली जी की भजन स्थली एवं समाधी स्थली है । यहीं श्री वंशी अली जी भजन करते थे एवं अपने आराध्य श्री किशोरी रमण जी की सेवा करते थे ।
जोग जप संजम समाधि भुक्ति मुक्ति सुख - श्री सुंदर श्याम गोस्वामी
हे मित्र, यदि तू बाँके बिहारी की अनन्य भक्ति करेगा तो तू सपने में भी योग, जप, संयम, समाधि, भुक्ति, एवं मुक्ति के सुख को नहीं निहारेगा।
श्री गोविंद स्वामी समाधि स्थल, गोवर्धन
श्री गोविंद स्वामी (1505 - 1586), पुष्टिमार्ग के अष्ठछाप कवियों में से एक थे, जो गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे । इन्होने ब्रज में इसी स्थान पर निवास कर भजन किया, जो ऐरावत कुंड, जतिपुरा के पास स्थित है ।
श्री ललित किशोरी जी की जीवनी (गौड़ीय संप्रदाय)
श्री ललित किशोरी जी का जन्म लखनऊ में मिती कार्तिक कृष्णा में द्वितीय दिन सन 1825 में हुआ था। इनके पितामह शाह बिहारीलालजी उस समय लखनऊ में प्रसिद्ध धनाढ्य थे नवाबों से उनको “शाह" उपाधि प्राप्त थी।
ताज बीबी की समाधि, गोकुल महावन
ताज बीबी श्री कृष्ण की परम भक्त थीं । इनका जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था । ताज बीबी के पिता का नाम पद्न खान था । ताज बीबी का विवाह बादशाह अकबर के साथ हुआ था ।
लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक - श्री रसखान
जिसका ध्यान ब्रह्मा आदि देवता समाधि में करते हैं, और योग की सिद्धियों को प्राप्त करने पर भी जिनका अंत नहीं पा सकते।
श्रीनाथजी मंदिर, पूंछरी, गोवर्धन
श्रीनाथजी का मंदिर पूंछरी, गोवर्धन में स्थित है । गोवर्धन जी का आकार मयूर के समान है एवं पूंछरी गोवर्धन जी की पूंछ है, ऐसी मान्यता है ।