bhamini
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श्री राधा हौं जानति तो मन की - श्री वृंदावन दास जी
(एक सखी कहती है) हे श्री राधा! मैं आपके मन की बात भली-भाँति जानती हूँ। अपने प्रियतम (श्री कृष्ण) के विनय भरे वचन सुनकर आपका हृदय द्रवित हो जाता है क्योंकि आप अपने प्रेम के सच्चे प्रण का पोषण करने वाली हैं।
मन लाग्यो भान दुलारी सों - श्री किशोरी अलि
मेरा मन वृषभानु की दुलारी, श्री राधा में रम गया है। वे माता कीर्ति के कुल का गौरव बढ़ाने वाली, समस्त दुखों का नाश करने वाली और श्रेष्ठ बरसाने में वास करने वाली हैं। वे गौर वर्ण की हैं और भोली छवि वाली हैं जो सदा किशोर अवस्था में रहती हैं, जिनकी टेढ़ी भौंहें और तीखे नेत्र अत्यंत चित्ताकर्षक हैं।
राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (23)
हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग और कंचन के समान कांतिवान गौर देह से रसिकलाल श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है।
जय बोलौ श्रीराधा महारानी जू की - श्री हित परमानंद दास जी
श्री राधा महारानी की जय बोलो—श्री धाम वृन्दावन, जो अखिल लोकों की राजधानी है, उसमें एकछत्र (एक मात्र) श्री राधा जू का ही राज है।
श्रीवृन्दावन सहज जी ललितमाधुरी रूप - श्री ललित माधुरी
श्रीवृन्दावन स्वभाविक रूप से सौंदर्य एवं मधुरता का साकार रूप है जहाँ ललित त्रिभंगी श्री लालजी भामिनी श्री राधा संग नित्य-विहार के अनुपम रस में निमग्न हैं।
जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
जय हो ललितादिक सखियों में श्रेष्ठ, सखियों की चूड़ामणि श्री राधा महारानी की। हे स्वामिनी! मुझ पर अनुग्रह कर मेरी सुध लें और कृपापूर्वक अपने चरणकमलों को मेरे मस्तक पर सुशोभित कराएं।
कमल से लोइन ललित अति शोभा देत - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)
कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं।
तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (168)
हे भामिनी!, मैं बार बार विचार करता हूँ, परंतु आपके स्वरूप की तुलना के लिए कुछ भी उपयुक्त नहीं पाता ।
श्रीराधा रूप-लावण्य की वन्या - श्री ललित विहारिणी जी
श्री राधा रूप एवं सौंदर्य की सदा प्रवाहित होने वाली नदी के समान हैं। वे सुंदर, सुकोमल, स्वर्ण के समान कांति वाली गोरी हैं जो श्री कृष्ण की प्रियतमा तथा कीर्ति जी की पुत्री हैं। [1]
मंद हँसनि मुख कमल की - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (7)
अपने मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान एवं तिरछी चितवन से मेरी ओर निहार कर, श्री राधा ने मुझे अपने वश कर, मेरे प्राणों का हरण कर लिया।
अहो विहारिन प्राण जीवनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (19)
हे मेरी प्राण-प्यारी श्री विहारिणी जू (श्री राधा)! कृपा कर मेरे अवगुणों पर विचार न कीजिए।
मोहनलाल के रसमाती - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (20)
हे राधे ! तू मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे नव वधू ! उस एकान्त मिलन की गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण संकोच है !
स्वामिनी जू भामिनी जू हंस कल गामिनी जू - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (41)
मेरी स्वामिनी श्री राधा जू भामिनि हैं जिनकी गति हंस के समान है, जिनके बदन की कांति कोटि कोटि दामिनी की द्युति के समान है जो प्रियतम श्री कृष्ण के चित्त को चुराने वाली हैं।
श्री राधेजू सुंदर छता हमारौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (89)
हे भामिनी श्रीराधे! वर्षा की इन मंद-मंद फुहारों से आपके वस्त्र भीग रहे हैं; अतः कृपा कर क्षण-भर के लिए मेरे इस छत्र की छाया में आकर वर्षा से अपनी रक्षा कर लीजिए।
राधिका रवन की मुरलिका श्रवन सुनि - श्री चतुर्भुजदास जी
जब श्री राधिका ने श्री कृष्ण की मुरली सुनी तो अपने भवन से समस्त काज को त्याग कर वे वन की ओर चल पड़ी।
आँधे के सिर सम्प्रदा - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (19)
एक समझदार एवं रसपरक भामिनी (पत्नी) अपने पति को प्रेमविहीन एवं बहिरंग साधन प्रधान संप्रदाय में दीक्षित देखकर कहती है कि जैसे एक अंधे के पीछे अंधा चलता है, जैसे एक नकटे के बहकावे में आकर दूसरा नाकदार भी अपनी नाक कटवाकर नकटा बन जाता है, ऐसे नकटों के से ये पंथ हैं ।
आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (7.3)
आज जो शोभामयी श्रीकिशोरी जी (श्री राधा) प्रेम रस में उन्मत्त होकर डोल (घूम) रही हैं । वे प्रियतम प्यारे के साथ दिव्य मदन के रंग में सराबोर हो रही हैं और उनके अंग अंग से आनंद की उमंगें ऐसे बरस रही हैं, जैसे (हाव भाव आदि) गुणों का खजाना ही खुल गया हो ।
हे स्वामिनि हर्षामिनि भामिनि अब मेरी सुधि लीजै - श्री ललित लड़ैती जी, श्री किशोरी करुणा कटाक्ष, विनय (25)
हे स्वामिनी श्री राधा, अब मेरी भी सुधि ले लीजिए । मैंने अपना बहुत-भाँति से बिगाड़ कर लिया है, मेरी भूल को क्षमा कीजिये ।
जयति श्रीराधिका, श्यामघन साधिका - श्री सरस माधुरी जी
श्री श्यामसुंदर को वशीभूत करने वाली, उन नवल गोरी श्री राधा की जय हो, जो साखियों के प्राणों की आधार हैं ।
सरद सुहाई जामिनि, भामिनि रास रच्यौ - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (234)
शरद कि सुहावनी रात्रि में भामिनी श्री राधा ने रास रचा है । यमुना तट पर वंशीवट के निकट प्रवाहमान शीतल-मंद-सुगंधित पवन सुखमय है ।