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  1. वृन्दावन ही बीज है वृन्दावन - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (86)

    श्रीवृन्दावन ही विशुद्ध प्रेमाभक्ति का बीज है और श्रीवृन्दावन ही उसका खिला हुआ पुष्प है। श्रीवृन्दावन ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है तथा श्रीवृन्दावन ही प्रेम-रस का मूल स्रोत और आधार है।

  2. मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)

    श्रीराधा ने मेरे मन, शरीर और नेत्रों को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिसके कारण अब मुझे किसी अन्य वस्तु या परिस्थिति की कोई सुधि नहीं रही है। हृदय में विरह का ऐसा तीव्र कोलाहल और व्याकुलता मची हुई है कि मन में जो कुछ भी उमड़ता है, मैं उन्मादवश वही बकने लगता हूँ।

  3. जगत भगत सबहीं हँसो बुरौ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (44)

    चाहे संसारी लोग हों या भक्तजन, सभी मिलकर मेरी हँसी उड़ाएँ, मैं किसी की बात का तनिक भी बुरा नहीं मानूँगा। श्रीराधा के प्राणप्रिय श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अब जीवन में जो भी होनी हो, वह भले ही हो जाए।

  4. सुखनिधि सुन्दरि सरसनी सुनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (92)

    हे सुख-समुद्र-रूपा सुन्दरीजू, हे स्वामिनीजू, मेरी बात सुनिये! आप ही रस को उद्दीप्त करने वाली हैं। हे श्रीराधा गोरीजू, हे प्रियाजू, आपकी सदा जय हो। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं सदा आपकी दासी बनी रहूँ।

  5. तेरह लाख सँडीले उपजे सब - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)

    सूरदास मदनमोहन जी कहते हैं कि संडीला में प्राप्त तेरह लाख रुपये साधु-संतों की सेवा एवं भंडारे में समर्पित कर, वे स्वयं सब कुछ त्यागकर वृंदावन की ओर प्रस्थान कर गए। कहा जाता है कि वे अकबर के समय संडीला के राजस्व अधिकारी थे और शाही खजाने में भेजे गए संदूकों में कंकड़-पत्थर भरकर उनके भीतर यह दोहा लिख कर भिजवा दिया था। जब यह बात बादशाह अकबर तक पहुँची तो उन्होंने सूरदास मदनमोहन जी की निष्कपटता को देखते हुए उनको क्षमा कर उन्हें पुनः बुलाया, किंतु सूरदास जी राजकीय सेवा से विरक्त होकर श्रीवृन्दावन में ही रहने लगे थे।

  6. श्रीवृन्दावन लता वेलि तरु करौ - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा

    हे श्रीवृन्दावन की समस्त लताओं, बेलों और वृक्षों! आप सब मिलकर मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे परम सुकुमारी प्यारी श्रीराधाजी हमसे हिल-मिलकर अत्यंत लाड़-दुलार करें।

  7. धन-जोवन-जन-ज्ञान-बल सब गुमान के - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (2)

    धन, यौवन, स्वजन, ज्ञान और बल—ये सभी केवल अहंकार (गुमान) उत्पन्न करने के मूल कारण हैं. श्री कान्त किशोर जी कहते हैं कि इन साधनों के बल पर श्री वृन्दावन की रसमय केलि कदापि प्राप्त नहीं की जा सकती।

  8. अहो कुँवरि तुब रूप यह - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)

    हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।

  9. छिन-छिन हैं नव लाड़ली करिये - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा

    क्षण-क्षण नित्य नवीन रहने वाली श्री लाड़ली जी और प्रियतम श्यामसुन्दर निरंतर दिव्य रास-क्रीड़ा का विलास करते रहें। आप दोनों का यह परम निर्मल और श्रेष्ठ प्रेम नित्य नवीन भाव से दिव्य रस और आनंद से सदैव परिपूर्ण बना रहे।

  10. गीता ओ भागौत कौ कान्त - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (6)

    श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि भले कोई श्री गीताजी और श्रीमद्भागवत महापुराण का कितना ही बड़ा उपदेश क्यों न दे, किन्तु यदि उनका हृदय पत्थर के समान कठोर है, तो वे रसोपासना के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ सकते। इस अनन्य रसिकों के देश (नित्य वृन्दावन) में प्रवेश केवल प्रेममय हृदय वाले रसिक ही कर सकते हैं।

  11. रहौ मेरे उर में ऐंन करि प्यारी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (69)

    हे प्यारी जू, मेरी प्रार्थना पर विचार कीजिए - आपकी यह मृदुल एवं माधुर्यमयी मूर्ति की छटा रात-दिन मेरे हृदय में सदा बनी रहे और यह छवि मेरे ध्यान से टालने पर भी कभी न टले।

  12. इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)

    श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कहकर वे हृदय से विवश हो गईं और आर्त होकर रुदन करने लगीं। जैसे ही उन्होंने अश्रु-पूरित नेत्रों से अपनी प्राण-प्रिया श्री राधा को रो कर पुकारा, ठीक उसी क्षण, मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरती हुई श्री राधा जू वहाँ साक्षात् प्रकट हो गईं।

  13. कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (5)

    श्रीयुगल सरकार न तो द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत और न ही विशिष्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों की सीमाओं में आबद्ध हैं। वे वेदों के समस्त तार्किक विवादों से परे, पूर्णतः स्वतंत्र और रसमय हैं। रसिकों के लिए तो केवल श्यामा-श्याम की यह परम-प्रिय जोड़ी ही एकमात्र उपास्य और आधार है।

  14. प्यारे को नचवत प्रिया कबहुँ लकुट लै त्रासि - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी, दोहा (93)

    प्रिया जी (श्री राधा) अपने प्रियतम श्री कृष्ण को नाचना सिखा रही हैं, और कभी-कभी वे अपने हाथ में लकुटी (छड़ी) लेकर उन्हें तनिक डराती भी हैं। जैसे-जैसे लाड़िली जी उन्हें नचाती हैं, श्री कृष्ण उनके अधीन होकर बिल्कुल वैसे-वैसे ही नाचते हैं।

  15. राधामाधव अद्भुत जोरी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)

    रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।

  16. स्वारथ कौ संसार सब परमारथ कौ खोल - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (7)

    सारा संसार अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगा हुआ है, और वास्तविक परमार्थ केवल दिखावा मात्र अथवा खोल (ऊपरी आवरण) रह गया है। लोग प्रेम और रस-रीति की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, परंतु उनके हृदय का भंडार भीतर से पूरी तरह खाली है।

  17. मुख सो भाषे अनन्यता तन में राखे टोंठि- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (30)

    लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।

  18. बंदौं श्रीहरिदास के चरन कमल चित लाइ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (19)

    मैं मन लगाकर स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों का वंदन करता हूँ जिन्होंने अपने हृदय की रस-माधुरी अर्थात् प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करके दिखाया है ।