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  1. गीता ओ भागौत कौ कान्त - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (6)

    श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि भले कोई श्री गीताजी और श्रीमद्भागवत महापुराण का कितना ही बड़ा उपदेश क्यों न दे, किन्तु यदि उनका हृदय पत्थर के समान कठोर है, तो वे रसोपासना के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ सकते। इस अनन्य रसिकों के देश (नित्य वृन्दावन) में प्रवेश केवल प्रेममय हृदय वाले रसिक ही कर सकते हैं।

  2. रहौ मेरे उर में ऐंन करि प्यारी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (69)

    हे प्यारी जू, मेरी प्रार्थना पर विचार कीजिए - आपकी यह मृदुल एवं माधुर्यमयी मूर्ति की छटा रात-दिन मेरे हृदय में सदा बनी रहे और यह छवि मेरे ध्यान से टालने पर भी कभी न टले।

  3. इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)

    श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कहकर वे हृदय से विवश हो गईं और आर्त होकर रुदन करने लगीं। जैसे ही उन्होंने अश्रु-पूरित नेत्रों से अपनी प्राण-प्रिया श्री राधा को रो कर पुकारा, ठीक उसी क्षण, मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरती हुई श्री राधा जू वहाँ साक्षात् प्रकट हो गईं।

  4. कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (5)

    श्रीयुगल सरकार न तो द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत और न ही विशिष्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों की सीमाओं में आबद्ध हैं। वे वेदों के समस्त तार्किक विवादों से परे, पूर्णतः स्वतंत्र और रसमय हैं। रसिकों के लिए तो केवल श्यामा-श्याम की यह परम-प्रिय जोड़ी ही एकमात्र उपास्य और आधार है।

  5. प्यारे को नचवत प्रिया कबहुँ लकुट लै त्रासि - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी, दोहा (93)

    प्रिया जी (श्री राधा) अपने प्रियतम श्री कृष्ण को नाचना सिखा रही हैं, और कभी-कभी वे अपने हाथ में लकुटी (छड़ी) लेकर उन्हें तनिक डराती भी हैं। जैसे-जैसे लाड़िली जी उन्हें नचाती हैं, श्री कृष्ण उनके अधीन होकर बिल्कुल वैसे-वैसे ही नाचते हैं।

  6. राधामाधव अद्भुत जोरी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)

    रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।

  7. स्वारथ कौ संसार सब परमारथ कौ खोल - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (7)

    सारा संसार अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगा हुआ है, और वास्तविक परमार्थ केवल दिखावा मात्र अथवा खोल (ऊपरी आवरण) रह गया है। लोग प्रेम और रस-रीति की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, परंतु उनके हृदय का भंडार भीतर से पूरी तरह खाली है।

  8. मुख सो भाषे अनन्यता तन में राखे टोंठि- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (30)

    लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।

  9. बंदौं श्रीहरिदास के चरन कमल चित लाइ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (19)

    मैं मन लगाकर स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों का वंदन करता हूँ जिन्होंने अपने हृदय की रस-माधुरी अर्थात् प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करके दिखाया है ।

  10. अरी मेरे नैननि को आहार - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (37)

    श्रीहरिप्रिया सखी कहती हैं — हे सखि! मेरे नयनों का एकमात्र आहार यही है कि सुरति-केलि में आरूढ़ प्रिया-प्रीतम का मैं सदा दर्शन करती रहूँ। उनके दर्शन से मेरे हृदय के समस्त मनोरथ सफल हो जाते हैं।

  11. श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)

    जो स्वामी हरिदास जी के अनन्य जन हैं, वे युगलवर, श्री श्यामा कुंज बिहारी के नित्य विहार रूपी रस-केलि में ही अपने मन को लगाते हैं तथा युगल किशोर दंपति की रूप-रस माधुरी का नित्य अपने नयनों से पान करते रहते हैं।

  12. मेरे श्रीराधारमन अति सरूप सुकमार - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक, दोहा (2)

    मेरे श्री राधारमण अत्यंत सुंदर और सुकुमार अवस्था वाले हैं। उनके सौंदर्य की छवि ऐसी अनुपम है कि उस पर मैं कोटि-कोटि कामदेव और रति को भी बार-बार न्यौछावर कर दूँ।

  13. जयति जयति नम जयति नम श्रीवृन्दावन वाग- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (7)

    बार-बार श्रीवृंदावन धाम की इस धरा को प्रणाम है जिसमें प्रिया-प्रियतम का सुहाग सदा अविचल बना रहता है अर्थात् युगल रस माधुरी की अखंड धारा प्रवाहित होती रहती है ।

  14. श्री वृन्दाविपिनेस्वरी रस सिन्धु बिहारी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (77)

    श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर प्रेम-रस की माधुरी में सराबोर दृष्टिगोचर हो रहे हैं; उनके हृदयों में अनुराग का अगाध सिन्धु उमड़ रहा है। श्रीप्रियाजी के मुख-कमल के मकरन्द का पान कर सौभाग्यशाली श्रीलालजी का मन-रूपी भ्रमर पूर्णतः मत्त हो उठा है।

  15. अनुछिन लालहु रहत हैं सदा प्रिया आधीन - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी, दोहा (92)

    लालजी (श्रीकृष्ण) हर क्षण अपनी प्रिया (श्रीराधा) के अधीन रहते हैं। उसी भाव-रस में समस्त सहचरियाँ उसी प्रकार मग्न रहती हैं, जैसे मछलियाँ जल में तन्मय होकर लीन रहती हैं।

  16. श्रीवृन्दावन सघन सरस-सुख - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (4)

    दिव्य श्रीवृन्दावन धाम सघन और सरस रस की खानी है, जिसकी छटा चारों ओर छा रही है। इन्द्र के नन्दनवन जैसे कोटि-कोटि वन श्रीवृन्दावन को निहारकर लज्जित हो रहे हैं, अर्थात् वृन्दावन की शोभा उससे अनंत गुना अधिक श्रेष्ठ है।

  17. जय श्रीराधिका रसभरी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (32)

    रस से परिपूर्ण उन श्रीराधारानी की सदा जय हो, जो श्यामसुंदर के प्राणों की संजीवनी हैं । जिनकी कृपा से ही पूर्ण प्रेम प्रकाशित हुआ है और जो प्रेम समुद्र को परिपूर्ण करके उसमें स्वयं ही निमग्न हो गई हैं।

  18. रतन-खचित वृदाविपुन भूमि लता-द्रुम रंग - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (22)

    श्रीधाम वृंदावन की दिव्य भूमि रत्नों से जड़ित है, जहाँ रंग-बिरंगी लताएँ और विविध रंगों के वृक्ष सौंदर्य बिखेर रहे हैं। उसी परम पावन भूमि पर श्री स्वामी हरिदास जी के लाड़ले श्यामा-कुंजबिहारी, प्रेम-केलि में उन्मत्त होकर नित्य विहार रस बरसा रहे हैं।

  19. न काहू को निन्दनौ ना काहू की संस - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (20)

    मैं न तो किसी की निन्दा करूँ, न ही किसी की चापलूसी करूँ। श्री कान्त रसिक कहते हैं कि मेरे हृदय के परम आभूषण रूपी हार एक मात्र स्वामी श्री हरिदास जू ही हैं।