325 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रीहरिवंश चरण बिनु बल गहौं - श्री हित चतुर्भुजदास जी

    श्री हित हरिवंश महाप्रभु के चरणों के अतिरिक्त मैं और किसका बल (आश्रय) ग्रहण करूँ? जिनके लिए लाड़ली-लाल (श्री राधा-कृष्ण) का दिव्य केलि-मिलाप और सुखदायक श्री वृन्दावन ही एकमात्र वास्तविक धन है।

  2. विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।

  3. नमो कृष्ण जै नित्य विहारी - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (3)

    नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं।

  4. राधे जू रंग भीनी राजकुँवारि - श्री किशोरी अलि

    श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं— हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं।

  5. जय जय जमुना सब सुखकारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)

    सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।

  6. लाल संग लै पौढी ललनां - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (65)

    परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।

  7. रहःकेलिसुखस्थाने - सनत्कुमार संहिता, श्रीराधास्तोत्रं (2)

    जो एकान्तिक निकुञ्ज-केली-लीलाओं के सुख का मूल (आश्रय) हैं तथा सखियों के प्रेम को बढ़ाने वाली हैं, जो निष्पाप हैं, जो सदा श्रीकृष्ण के आनन्द एवं महिमा को बढ़ाने वाली हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर प्रसन्न हों।

  8. भुजा परस्पर अंश दे - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।

  9. विहारिणि सर्वोपरि शिरताज - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    श्री विहारिणी जी (श्री राधा) ही सर्वोपरि हैं और सभी की सिरताज (शिरोमणि) स्वामिनी हैं। साक्षात् श्री बिहारी जी (श्री कृष्ण) भी सदैव उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और वे अपनी सखियों के समूह के संग शोभायमान रहती हैं। समस्त कुंजें-निकुंजें रसमय पुंजों से भरी हैं, जहाँ स्वाभाविक रूप से ही रस की अविरल धारा बहती है।

  10. श्याम रूप श्रीराधिका - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    श्री राधा श्री कृष्ण का स्वरूप हैं और श्री कृष्ण साक्षात् श्री राधा का ही स्वरूप हैं। दर्शन (लीला) मात्र के लिए ये दो प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये दोनों एक ही हैं।

  11. नव कुंज-सदन मैं आज रँगीली होरी - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.2)

    नव-निकुंज-महल में आज रंगों से सराबोर होली की अद्भुत छटा छाई हुई है। एक ओर श्रीकिशोरीजी हैं और दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर दृढ़ता से उपस्थित हैं। दोनों अनन्त उमंगों और हर्षोल्लास के साथ परस्पर होली-लीला में उन्मत्त हैं।

  12. कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)

    प्रिया-प्रियतम अपनी अंतरंग केलि में, तन और मन से एक होकर अत्यंत मनोहर लग रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग की शोभा परम मधुर है, और कुंज-महल ही उनकी केलि का निज धाम है।

  13. नित्त सरद नित्त तीज है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (1185)

    जहाँ नित्य ही शरद ऋतु है, नित्य ही तीज का उत्सव है और नित्य ही बसन्त तथा होली का आनंद है। जहाँ प्रतिक्षण युगल की नित्य नई-नई केलि-लीलाएँ होती रहती हैं, जिनके सुख का कभी अंत नहीं होता—वही नित्य वृन्दावन धाम है।

  14. रसिकजन की मैं बलिहारी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2)

    मैं उन रसिकजनों पर बलिहारी जाती हूँ, जिनके हृदय में अनन्य रूप से प्रिया-प्रियतम बसते हैं । वे वृन्दावन धाम में विचरण करते हैं, स्वयं निरभिमानी होकर भी सबको मान देने वाले वचन बोलते हैं।

  15. राधा रास-सिरोमनी राधा केलि-कुलीन - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (81)

    श्रीराधा रास की शिरोमणि और केलि-लीला की परम कुलीन स्वरूपा हैं। वे समस्त कलाओं से परिपूर्ण, स्वयं रसस्वरूपिणी तथा प्रेम में पूर्णतः लीन रहने वाली प्रेम की अधिष्ठात्री हैं।

  16. रूप की रासि किसोर-किसोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (44)

    रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]

  17. ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)

    श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।