ठाड़े री मोहन चरण पहाड़ी - श्री हित वृंदावन दास जी
हे सखी! श्रीमोहन चरण पहाड़ी पर खड़े हैं। वायु के वेग से उनका पीतांबर फहरा रहा है और मस्तक पर झुके मुकुट की शोभा अत्यंत न्यारी लग रही है।
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हे सखी! श्रीमोहन चरण पहाड़ी पर खड़े हैं। वायु के वेग से उनका पीतांबर फहरा रहा है और मस्तक पर झुके मुकुट की शोभा अत्यंत न्यारी लग रही है।
जिन्होंने अपने चित्त में यश की कामना और धन की आशा रखकर श्रीराधा-कृष्ण के कुंज-विलास की काव्य-रचनाएँ गाई है अथवा घर-बार का त्याग करने पर भी देह की सुख-सुविधा और श्रृंगार आदि की इच्छा संजोई है, उनके मन में सांसारिक आशाओं और वासनाओं का नगाड़ा ही बज रहा है।
श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य रास-केलि की मनोहर प्रेममयी क्रीड़ा का वर्णन करने में मेरी बुद्धि कहाँ समर्थ है? वहाँ ऐसी अद्भुत और अनुपम लीलाएँ हो रही हैं कि उनका वर्णन करने में अपनी असमर्थता का अनुभव कर मुझे लज्जा आती है।
हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे।
हमें शास्त्रों की कोई समझ नहीं है और न ही हम उन्हें समझना चाहते हैं। जो लोग इन्हें अब तक नहीं समझ पाए वे आगे भी नहीं समझेंगे, परंतु जिन महापुरुषों ने शास्त्रों के वास्तविक सार को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम केवल उसी का पालन करेंगे।
आज निकुंजों में ब्रज के प्राण-सर्वस्व असीम सुख की वर्षा कर रहे हैं, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं।
जीभ निरंतर प्रेम के परम सुंदर नाम 'राधा-राधा' का ही रटन कर रही है। श्री राधा साक्षात् प्रेम का धाम हैं और वे ही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।
सहज और अजन्मा रूप वाले दोनों श्रेष्ठ रसिक निरंतर परस्पर विहार करते हैं। मैं निरंतर एकरस होकर उसी अनुपम केलि का भजन करता हूँ, जो श्री हरिदासी पद्धति की अत्यंत विलक्षण और अद्वितीय क्रीड़ा है।
श्रीवृषभानुकिशोरी श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ शयन कर रही हैं और अपने प्राणप्रिय नन्दनन्दन के मुखमण्डल की अनुपम छवि को निहारते हुए उनके कण्ठ से लग गई हैं।
धन, यौवन, स्वजन, ज्ञान और बल—ये सभी केवल अहंकार (गुमान) उत्पन्न करने के मूल कारण हैं. श्री कान्त किशोर जी कहते हैं कि इन साधनों के बल पर श्री वृन्दावन की रसमय केलि कदापि प्राप्त नहीं की जा सकती।
श्रीप्रिया जी रात भर प्रियतम श्यामसुंदर के साथ जागती रही हैं। उनके सुवर्ण के समान कांतियुक्त कपोलों की सुंदर आभा पर प्रियतम के वस्त्रों की छाप अंकित है, जो अत्यंत सुशोभित हो रही है।
हे श्री विहारिणी जी! यह संपूर्ण लीला-विलास और ऐश्वर्य आपका ही विस्तार है। प्रियतम श्री विहारी जी सदा आपके ही रुख (संकेत और इच्छा) की ओर निहारते रहते हैं और उसी के अनुसार अनंत क्रीड़ाओं की रचना करते हैं।
श्री हित हरिवंश महाप्रभु के चरणों के अतिरिक्त मैं और किसका बल (आश्रय) ग्रहण करूँ? जिनके लिए लाड़ली-लाल (श्री राधा-कृष्ण) का दिव्य केलि-मिलाप और सुखदायक श्री वृन्दावन ही एकमात्र वास्तविक धन है।
मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।
नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं।
श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं— हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं।
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।
परम सुकुमार किशोरी जी (ललना) अपने प्राणप्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) को साथ लेकर शैया पर शयन कर रही हैं। वे दोनों एक-दूसरे के हृदय से हृदय को लगाकर, परस्पर आलिंगनबद्ध होकर, बिना किसी संकोच के इस अत्यंत एकांत निकुंज में दिव्य रस-विलास में मग्न हैं।
जो एकान्तिक निकुञ्ज-केली-लीलाओं के सुख का मूल (आश्रय) हैं तथा सखियों के प्रेम को बढ़ाने वाली हैं, जो निष्पाप हैं, जो सदा श्रीकृष्ण के आनन्द एवं महिमा को बढ़ाने वाली हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर प्रसन्न हों।
एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।