तालन पै ताल पै तमालन - श्री पद्माकर
शरद ऋतु की उज्ज्वल चाँदनी सरोवरों पर, ताल एवं तमाल के वृक्षों पर, गले की मालाओं पर, वृंदावन की गलियों में तथा विहार-स्थल बंशीवट पर सर्वत्र फैल गई है।
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शरद ऋतु की उज्ज्वल चाँदनी सरोवरों पर, ताल एवं तमाल के वृक्षों पर, गले की मालाओं पर, वृंदावन की गलियों में तथा विहार-स्थल बंशीवट पर सर्वत्र फैल गई है।
यही वह स्थान है जो यमुना जी के तट के बिल्कुल निकट है और कभी परम तपस्वी सौभरि ऋषि की पवित्र तपोभूमि हुआ करता था।
सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं।
श्री प्रियाजी (श्री राधा) के रूप का वर्णन करने की सामर्थ्य मेरी अल्प बुद्धि में कहाँ है? जिनके नयनों की केवल एक कटाक्ष-मात्र से स्वयं सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण भी मोहित होकर उनके चरण कमलों में विभोर होकर लोटने लगते हैं।
वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बार-बार जय हो। उस परम मनोहर श्री धाम वृन्दावन की जय हो, जहाँ लताओं, कुंजों और पुष्पों की सुगन्धित फुलवारी सदा शोभायमान रहती है।
भक्तमाल की टीका में श्री प्रियादास जी, श्री हरिराम व्यास जी के जीवन के एक अनुपम प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखते हैं — शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि में जब प्रियतम-प्रिया (श्री राधा-कृष्ण) ने दिव्य रास रचा, तब उसमें ऐसा गहन प्रेम-रंग चढ़ा कि उसकी मधुरता को शब्दों में बाँधना असम्भव है ।
प्रेमधाम श्रीब्रजमंडल में बसने से हमें वे श्री बाँकेबिहारीजी महाराज प्राप्त हुए हैं, जो एक मात्र प्रेमी भक्तों से प्रेम के कारण ही सपरस (स्पर्श/आलिंगन) करते हैं। प्रेम-विहीन बाह्य अपरस-सपरस के विचारों में उलझे रहने वाले सकामी जनों से तो वे सदा काल दूर रहते हैं, इसलिए वे लोग सदा दुखी बने रहते हैं।
कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं।
हे जीव! जिस मथुरा (ब्रज मंडल) में त्रैलोक्य प्रकाशक गोपी एवं गोविन्द विराजमान हैं, तुम वहाँ वास करो! वास करो!
जाति, पंथ और कुल का अभिमान त्यागकर, मैं नित्य रसिकों के चरणों में श्रद्धापूर्वक सिर नवाऊँगा।
भगवान नारायण कहते हैं - हे परमेशानि! आप रासमण्डल में विराजमान रहती हो! आपको नमस्कार है! हे रासेश्वरी! भगवान श्रीकृष्ण को आप उनके प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। आपको बारंबार प्रणाम है।
जब श्री राधा ने रास मंडल में प्रत्येक गोपी के संग नृत्यमय रास रचाया, तब ब्रज-बालाओं को वास्तविक आनंद की परम अनुभूति हुई। उस दिव्य रासलीला के अद्भुत प्रेमरस में डूबकर सभी गोपियों ने अपने प्राणों को बार-बार श्री राधा पर न्योछावर कर दिया।
निज धाम श्री वृंदावन में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक दूसरे के अंक में विराज रहे हैं, जिनकी महाछवि की कांति कोटि-कोटि सूर्यों की आभा को भी तुच्छ कर रही है।
जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो।
मथुरा (ब्रज मण्डल) में जो मृत्यु को प्राप्त करता है वह चाहे कीड़ा-मकौड़ा क्यों न हो, वह भी भगवद् स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
हे रसिया श्री कृष्ण, मुझे ब्रज मण्डल दिखा दो। आपके ब्रज में बहुत से मोर हैं, जिनकी कूक से मेरा हृदय प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो उठता है।
हे सखी, अब तो मैं ब्रज मंडल में बदनाम हो चुकी हूँ। गुरुजनों की लज्जा आदि खो चुकी हूँ, अब चाहे वे मुझसे नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे कोई परवाह नहीं।
आज भी यमुना जी तटों से होकर बहती है। वंशीवट के मध्य में रास मंडल फैला हुआ है।
बहु जन्मों के संचित पाप मथुरा (ब्रज मण्डल) के प्रभाव से क्षण मात्र में नष्ट हो जाते हैं।
हे सखी, मुझे श्री वृन्दावन बहुत प्यारा लगता है, जहाँ मेरे आँखों के तारे श्री राधावल्लभलाल विराजमान हैं।