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  1. आरति करत नवल सुकुमारी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं।

  2. रूप प्रिया कौ कहन कौं - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार सभा मण्डल (39)

    श्री प्रियाजी (श्री राधा) के रूप का वर्णन करने की सामर्थ्य मेरी अल्प बुद्धि में कहाँ है? जिनके नयनों की केवल एक कटाक्ष-मात्र से स्वयं सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण भी मोहित होकर उनके चरण कमलों में विभोर होकर लोटने लगते हैं।

  3. जयति जयति वृषभानु दुलारी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (06)

    वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बार-बार जय हो। उस परम मनोहर श्री धाम वृन्दावन की जय हो, जहाँ लताओं, कुंजों और पुष्पों की सुगन्धित फुलवारी सदा शोभायमान रहती है।

  4. सरद उज्यारी रास रच्यौ पिय-प्यारी - श्री प्रियादास, भक्ति रस बोधिनी (371)

    भक्तमाल की टीका में श्री प्रियादास जी, श्री हरिराम व्यास जी के जीवन के एक अनुपम प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखते हैं — शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि में जब प्रियतम-प्रिया (श्री राधा-कृष्ण) ने दिव्य रास रचा, तब उसमें ऐसा गहन प्रेम-रंग चढ़ा कि उसकी मधुरता को शब्दों में बाँधना असम्भव है ।

  5. श्रीबिहारीदास ब्रज में बसत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (365)

    प्रेमधाम श्रीब्रजमंडल में बसने से हमें वे श्री बाँकेबिहारीजी महाराज प्राप्त हुए हैं, जो एक मात्र प्रेमी भक्तों से प्रेम के कारण ही सपरस (स्पर्श/आलिंगन) करते हैं। प्रेम-विहीन बाह्य अपरस-सपरस के विचारों में उलझे रहने वाले सकामी जनों से तो वे सदा काल दूर रहते हैं, इसलिए वे लोग सदा दुखी बने रहते हैं।

  6. कमल से लोइन ललित अति शोभा देत - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)

    कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं।

  7. नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनि - देवी भागवत (9.50.46)

    भगवान नारायण कहते हैं - हे परमेशानि! आप रासमण्डल में विराजमान रहती हो! आपको नमस्कार है! हे रासेश्वरी! भगवान श्रीकृष्ण को आप उनके प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। आपको बारंबार प्रणाम है।

  8. मंडल रास रच्यौ बिमल निर्तति कुँवरि सुजान - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (10)

    जब श्री राधा ने रास मंडल में प्रत्येक गोपी के संग नृत्यमय रास रचाया, तब ब्रज-बालाओं को वास्तविक आनंद की परम अनुभूति हुई। उस दिव्य रासलीला के अद्भुत प्रेमरस में डूबकर सभी गोपियों ने अपने प्राणों को बार-बार श्री राधा पर न्योछावर कर दिया।

  9. महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला

    निज धाम श्री वृंदावन में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक दूसरे के अंक में विराज रहे हैं, जिनकी महाछवि की कांति कोटि-कोटि सूर्यों की आभा को भी तुच्छ कर रही है।

  10. कलित कदम्बों के कमनीय केलि कुंजों में - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (33)

    जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो।

  11. अपि कीटः पतंगो वा तिर्यग्योनिगतोऽपि वा - वराहपुराण, मथुरा महात्म (169.34)

    मथुरा (ब्रज मण्डल) में जो मृत्यु को प्राप्त करता है वह चाहे कीड़ा-मकौड़ा क्यों न हो, वह भी भगवद् स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

  12. अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, प्रेम पचासा (42)

    हे सखी, अब तो मैं ब्रज मंडल में बदनाम हो चुकी हूँ। गुरुजनों की लज्जा आदि खो चुकी हूँ, अब चाहे वे मुझसे नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे कोई परवाह नहीं।