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  1. प्यारी अति रस प्रेम प्रवीन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (185)

    परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।

  2. रहौ मेरे उर में ऐंन करि प्यारी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (69)

    हे प्यारी जू, मेरी प्रार्थना पर विचार कीजिए - आपकी यह मृदुल एवं माधुर्यमयी मूर्ति की छटा रात-दिन मेरे हृदय में सदा बनी रहे और यह छवि मेरे ध्यान से टालने पर भी कभी न टले।

  3. एक राधा ब्रज में बसै - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (714-716)

    एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से विराजमान हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरूप से निकुंजों में नित्य विहार करती हैं, जिन्हें रसिक-शिरोमणि स्वामी हरिदास जी लाड़ लड़ाते हैं।

  4. रसिकवर रसिकनी रस रासि - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (74)

    परम रसिकों में श्रेष्ठ श्री कृष्ण और रसिक शिरोमणि श्री राधा साक्षात् रस की राशि हैं। वे दोनों ही अत्यंत चतुर रसिक हैं और समस्त रसिक जनों के जीवन के आधार हैं, जो सदैव परस्पर हास-विलास में मग्न रहते हैं।

  5. आरति कीजै सुंदरवर की - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (39)

    इन परम सुंदर युगल किशोर की आरती कीजिए। ये नवीन रसिक युगल, निकुंज के दो युगल चंद्रमाओं के समान हैं, जो भक्तों के हृदय के समस्त दुखों और अज्ञान रूपी अंधकार को हर लेने वाले हैं।

  6. नित्त सरद नित्त तीज है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (1185)

    जहाँ नित्य ही शरद ऋतु है, नित्य ही तीज का उत्सव है और नित्य ही बसन्त तथा होली का आनंद है। जहाँ प्रतिक्षण युगल की नित्य नई-नई केलि-लीलाएँ होती रहती हैं, जिनके सुख का कभी अंत नहीं होता—वही नित्य वृन्दावन धाम है।

  7. राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)

    यह पद साधक के उस करुण भाव को प्रकट करता है, जहाँ वह श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) से विनम्र निवेदन करता है— हे स्वामिनी! आप तो प्रेमरस की अमृतधारा हैं, फिर आपने अपने उस प्रेम-रस-सुधा रूपी खज़ाने को छिपाकर सारहीन विषय-प्रपंच रूपी भूसे में क्यों उलझा दिया है?

  8. कहों री जो कहिबे की होइ - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (182)

    हे सखी, चाहे कोई इसे कितना भी बताने का प्रयास करे, पर सत्य यही है कि श्री बिहारी–बिहारिणी जू का नित्य विहार ऐसा अद्भुत और विलक्षण रस से परिपूर्ण है, जिसकी गहराई को कोई भी पूर्णतः समझ नहीं सकता।

  9. अरी मेरे नैननि को आहार - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (37)

    श्रीहरिप्रिया सखी कहती हैं — हे सखि! मेरे नयनों का एकमात्र आहार यही है कि सुरति-केलि में आरूढ़ प्रिया-प्रीतम का मैं सदा दर्शन करती रहूँ। उनके दर्शन से मेरे हृदय के समस्त मनोरथ सफल हो जाते हैं।

  10. ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)

    श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।

  11. रास-रस रसिक रँगीली राधा - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)

    श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।

  12. श्री वृन्दाविपिनेस्वरी रस सिन्धु बिहारी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (77)

    श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर प्रेम-रस की माधुरी में सराबोर दृष्टिगोचर हो रहे हैं; उनके हृदयों में अनुराग का अगाध सिन्धु उमड़ रहा है। श्रीप्रियाजी के मुख-कमल के मकरन्द का पान कर सौभाग्यशाली श्रीलालजी का मन-रूपी भ्रमर पूर्णतः मत्त हो उठा है।

  13. आचारी सौं ठाकुर डरैं - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (113)

    जो केवल नियम-आचार, विधि-निषेध एवं बाहरी रीति-रिवाज में फँसे होते हैं, उनसे ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) दूर ही रहते हैं — उनके पास नहीं आते। परंतु सच्चे प्रेमी रसिक के संग तो ठाकुरजी उमंग में भरकर, रीझ-रीझ कर उन्हें हृदय से लगाते रहते हैं।

  14. तन मन वचननि लाड़िली मेरी जीवन प्रान - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (650)

    मेरे तन, मन और वाणी में पूर्ण रूप से लाड़ली जी (श्री राधा) ही समाई हुई हैं, जो मेरे जीवन की प्राण स्वरूपा हैं। नित्य विहार की सुंदर केली-लीलाओं में सदा लीन होकर, वे कुंज बिहारी के साथ रस-क्रीड़ा में निरंतर मग्न रहती हैं।

  15. मेरी स्वामिनी प्रसन्न बदन साँवरौ सुखरासि - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (20)

    मेरी स्वामिनी श्री राधा जी प्रसन्न मुख वाली हैं और श्रीकृष्ण सुख की राशि हैं । मैं इन दोनों को नित्य-प्रतिदिन, क्षण-क्षण लाड़ लड़ाता रहूँ और इनकी शाबाशी पाता रहूँ । [1]

  16. सुनीहूँ न देखी ऐसी जोरि जुगल किसोर किसोरि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (56)

    युगल किशोर की जैसी यह जोड़ी है ऐसी न तो कहीं सुनी न ही कहीं देखी। इनके अंग प्रत्यंगों की शोभा पर करोड़ों कामदेवों को न्यौछावर करके वार डालना दीजिये।

  17. मात तात जाके नहीं वृषभानु सुता नहिं नाम - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (686)

    स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में श्री राधा एवं श्री कृष्ण को जन्मादि लीलाओं से पृथक सदा नित्य किशोर माना जाता है। श्री राधा का “वृषभानु दुलारी” आदि नामों से भी कोई सरोकार नहीं माना जाता क्योंकि इस उपासना में उनका कोई माँ-बाप नहीं है, वे सदा निकुंज में नित्य विहार करती हैं। यहाँ श्री कृष्ण का नाम ‘कुंजबिहारी’ है एवं श्री राधा का ‘कुंजबिहारिणी’। यहाँ ब्रज रस के गोप, गोपी, गौ, ग्वाल, मात-पिता आदि से रहित श्यामा-कुंजबिहारी की विशुद्ध निकुंज उपासना ही प्राणों का आधार है।