आज सखि वन की सोभा देखि - श्री ठाकुर दास जी
एक सखी दूसरी सखी से कहती है—"हे सखि! आज श्री वृन्दावन के वन की अनुपम शोभा तो देखो! श्री यमुना जी के पावन जल में निर्मल कमल के फूल अत्यंत खिले हुए हैं, जिनकी छटा देखते ही बनती है।"
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एक सखी दूसरी सखी से कहती है—"हे सखि! आज श्री वृन्दावन के वन की अनुपम शोभा तो देखो! श्री यमुना जी के पावन जल में निर्मल कमल के फूल अत्यंत खिले हुए हैं, जिनकी छटा देखते ही बनती है।"
वृन्दावन में रहने वाले पपीहे धन्य हैं। वे अन्य जल नहीं पीते, केवल स्वाति नक्षत्र की बूंद की ही प्रतीक्षा करते हैं।
प्रिया प्रीतम की यह दिव्य रस रीतिः नित्यविहार रस स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के समान दिव्य और फलदायी है।
हे राधे, मैं सदा-सदा की आपकी दासी हूँ। कृपया मुझे अपने महल की टहल प्रदान कर, मेरे भाव का पोषण कीजिए एवं, मुझे अपनी निज सेवा प्रदान करें।
प्रेम मृत्यु की परवाह नहीं करता, जैसे दीपक को देखकर पतंगा बिना सोचे-समझे जल जाता है।
प्रेमियों की गति प्रेमी ही जानते हैं। जैसे गंगा जी में रहने वाला पपीहा पक्षी भी साक्षात गंगा जी के पानी को छोड़कर स्वाति बूँद की ओर ही निहारता है।
रसिक गुरुओं ने बताया है कि श्री धाम वृंदावन अगाध रस का धाम है जहां निवास करके श्री प्रिया प्रियतम का यशोगान करना चाहिए।
वृंदावन के वृक्ष अत्यंत प्यारे हैं जिनको देखकर समस्त कामनाएँ विलीन हो जाती हैं क्योंकि इनके नीचे सदा श्री राधा मोहन विहार करते हैं ।
श्री श्यामसुंदर मोरों के संग मनभावन नृत्य कर श्री श्यामा जू को रिझा रहे हैं ।
आज कुंज महल में दादुर, मोर, पपीहा मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं एवं कोयल मधुर शब्दों से किलकारी कर रही है।
हे श्री कृष्ण, मेरे इस प्यासे पपीहा पक्षी की भांति आँखों को अपना दर्शन देकर इन्हें ज़रा स्वाति की बूँद पीला जाओ।
आज ब्रज में काले बादल छा गए हैं। बिजली के बार बार चमकने के कारण हृदय में प्रेम की नित्य नई लहरें उठ रही हैं।
हे प्रभु, कितनी विलक्षण बात हो यदि चंद्र चकोर की चाह करे, और अत्यंत आनंद प्रदान करने वाला स्वाति नक्षत्र का मेघ पपीहे के पास दौड़ कर आए।
हे सखी, देखो कितनी सुंदर कुंज बनी है । नवल नागरी अरु नागर वहाँ विराजमान हैं जिसकी अत्यंत सुंदर छवि का वर्णन करना सर्वथा असम्भव है ।
श्री आनंदघन कह रहे है "हे ब्रज के नायक श्री कृष्ण, मेरा जो भी भाग्य आप बनाओगे वही होगा, मेरे सोचने से कहाँ कुछ होगा। अब तक आपने मेरी बहुत अच्छी बनायी है, आगे भी मंगल ही होगा।
श्री श्याम सुंदर, ब्रजराज-दुलारे जिनके नित्य ही वश में रहकर स्वयं को अभिमानी मानते हैं वही परम सुहागिनी श्री राधा रानी हैं।