16 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. आज सखि वन की सोभा देखि - श्री ठाकुर दास जी

    एक सखी दूसरी सखी से कहती है—"हे सखि! आज श्री वृन्दावन के वन की अनुपम शोभा तो देखो! श्री यमुना जी के पावन जल में निर्मल कमल के फूल अत्यंत खिले हुए हैं, जिनकी छटा देखते ही बनती है।"

  2. राधे तेरी सदा-सदा की दासी- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (18)

    हे राधे, मैं सदा-सदा की आपकी दासी हूँ। कृपया मुझे अपने महल की टहल प्रदान कर, मेरे भाव का पोषण कीजिए एवं, मुझे अपनी निज सेवा प्रदान करें।

  3. नेहिन की गति जानत भाखी - श्री किशोरी अलि जी, अष्टयाम प्रथम (36)

    प्रेमियों की गति प्रेमी ही जानते हैं। जैसे गंगा जी में रहने वाला पपीहा पक्षी भी साक्षात गंगा जी के पानी को छोड़कर स्वाति बूँद की ओर ही निहारता है।

  4. प्‍यारे वृन्‍दावन के रूख - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (10)

    वृंदावन के वृक्ष अत्यंत प्यारे हैं जिनको देखकर समस्त कामनाएँ विलीन हो जाती हैं क्योंकि इनके नीचे सदा श्री राधा मोहन विहार करते हैं ।

  5. देखौ माई सुंदर कुंज बनी - श्री हित कमल नैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (20)

    हे सखी, देखो कितनी सुंदर कुंज बनी है । नवल नागरी अरु नागर वहाँ विराजमान हैं जिसकी अत्यंत सुंदर छवि का वर्णन करना सर्वथा असम्भव है ।

  6. जो तुम बनावौगे सोई बनिहै - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (720)

    श्री आनंदघन कह रहे है "हे ब्रज के नायक श्री कृष्ण, मेरा जो भी भाग्य आप बनाओगे वही होगा, मेरे सोचने से कहाँ कुछ होगा। अब तक आपने मेरी बहुत अच्छी बनायी है, आगे भी मंगल ही होगा।