बिहरत दोऊ लाड़िली लाल - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (43)
श्री लाड़िली लाल दोनों वृंदावन में विहार परायण हैं । श्री श्यामा श्याम के बड़े एवं सुंदर नैनों को देख देख देख सहचरियों के हृदय और नयन शीतल बने रहते हैं ।
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श्री लाड़िली लाल दोनों वृंदावन में विहार परायण हैं । श्री श्यामा श्याम के बड़े एवं सुंदर नैनों को देख देख देख सहचरियों के हृदय और नयन शीतल बने रहते हैं ।
श्री राधा कृष्ण नृत्य कर रहे हैं। सहचरियाँ ताल मृदंग इत्यादि बजा रही हैं और बीच बीच में मोहन श्री कृष्ण मुरली की तान उस ताल से मिला कर बजा रहे हैं।
श्री ध्रुवदास जी कहते है कि मैं नित्य विहारिणी श्री प्रिया की निज सहचरियों की बलिहारी जाता हूँ, जिनका आस्वादनीय जीवन अमृत है - लाड़िली-लाल युगल के प्रति सहज प्रीति एवं अहर्निश उनका रूप-दर्शन ।
अब प्रिया लाल [राधा कृष्ण] रस विलास के सुख में डूब कर सो रहे हैं। वे दोनों परस्पर गलबाँहीं दिये हैं, जिससे उनके अंग अंग की छटा और भी मनोरम हो रही है ।
श्री राधा के महल की टहल पाना, एवं सहचरी बनना अत्यंत कठिन है। यह छवि एवं रस तभी फलीभूत होता है जब श्री स्वामिनी (राधारानी) के चरण कमल का मकरंद प्राप्त होता है (अर्थात श्रीजी के चरणों में अनन्य प्रेम हो जाता है ) ।
हे वृषभानु नंदिनी श्री राधा, आप भक्तों के प्राणों की आधार हैं। हे वृन्दावन विहारिणी, मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ। हे कृष्ण प्रिया, हे समस्त सुखों की धाम, मैं जैसा भी हूँ, जो भी हूँ, परन्तु आपका ही हूँ।
श्रीस्वामिनी जी का दिव्य मंगल विग्रह एक प्रकार की स्वर्ण कमलों की माला होकर श्रीलालजू के अंग-अंग में सुशोभित है। श्रीहरिप्रियाजू प्रार्थना करती हैं कि इस सुख में मग्न और प्रेम-क्रीड़ा में विलास करते हुए उन दोनों की रूप-माधुरी मेरे हृदय में सदा विराजमान रहे।
श्री यमुना जी श्रीमति राधारानी की नित्य सहचरी हैं। ब्रज धाम के बाहर, यमुना जी को एक पवित्र नदी के रूप में माना जाता है और लोग उनकी पूजा करते हैं, पुराण उन्हें यमपुरी के राजा यम की बहन के रूप में वर्णित करते हैं।
भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं, कि हम अनन्य रसिक (युगल सरकार के अनन्य) कुंजमहल के वासी हैं, जहां हमें प्रिया प्रियतम की नित्य ही नवायमान केलि लीलाओं का दर्शन होता है।
हृदयों में उमंगें भरी हुई सहचरियाँ परस्पर कह रही हैं, "इस समय इस युगल-रस के सुख को देखकर अपने नेत्रों का फल लीजिये।"
मेरे जीवन के प्राण धन एक मात्र दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण हैं। वे दोनों एक ही रस में लीन हैं, दोनों के रूप और आयु भी एक समान है, दोनों ही प्रेम रस में छके हैं और एक-दूसरे के नए-नए भाव सौंदर्य से मुग्ध हैं।
आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है।
हे मन, श्री राधावल्लभ के गुणों का गान कर। असाधुओं का त्याग करते हुए, संतों का नित्य संग कर, भजन का अभ्यास कर और श्री हरि चरणों में प्रेम को बढा।
हमारी महारानी श्री राधिका रानी सर्वोपरि है, जिन्होंने तीनों लोकों को मोहित करने वाले श्री श्यामसुंदर को जीत लिया है और उन्हें प्रेमामृत का दान कर रहीं हैं।
जहाँ पर श्री श्यामा श्याम नित्य ही नई-नई केली लीलाएँ करते रहते हैं, ऐसे दिव्य श्री वृंदावन धाम को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्री युगल किशोर स्वरूप से एक हैं, लेकिन दो नामों को धारण करते हैं। श्री राधारानी स्वयं श्रीकृष्ण को आनंद प्रदान करने वाली हैं, जो कि स्वयं आनंद हैं।
इस रसोपासना में सबकुछ मंगलमय है,यह बताते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस नित्यबिहार की किशोरीजी मंगल की मूर्ती है, लालजी भी मंगल की मूर्ती है और नित्य सहचरी (श्रीहरिदासजी) भी मंगल की मूर्ति है ।
श्रीराधानागर के केलिसमुद्र में निमग्न सखियों के नेत्रों को जो सुख होता है, श्रीभगवान् के सकल सुखोत्सव भी उस सुख के लवलेश तुल्य नहीं हैं । अनुपम सौभाग्य लक्ष्मीवान जिस किसी व्यक्ति की यदि उस सुख को प्राप्त करने की आशा हो, तो श्रीवृन्दावन नामक परमधाम में अपने शरीर का पात करे, देहान्त करे ॥१.५४॥
सभी रसिक संतों की राजधानी श्री वृन्दावन धाम की जय हो, जय हो, जहां श्री राधा सर्वोच्च रानी ('महारानी') और श्री कृष्ण राजा (’महाराज') हैं। यह दिव्य युगल और वृंदावन का निरंतर अमृत शाश्वत है, जिसकी दिव्यता भी वेदों की समझ से परे है। दिव्य युगल के सेवक श्री हरिप्रिया सहचरी हमेशा इस दिव्य निवास यानी श्री वृंदावन को निहारती हैं।
मेरा बल केवल एक श्री राधा प्यारी हैं। उनके समान कृपालु कौन है जो अपनी सहचरी मान कर नित्य (हर क्षण) रस प्रदान करती हैं। श्री अली किशोरी कहते हैं कि हम श्री राधा पर बलिहारी हैं, जो मेरे जीवन की सम्पूर्ण निज सम्पति हैं।