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  1. बिहरत दोऊ लाड़िली लाल - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (43)

    श्री लाड़िली लाल दोनों वृंदावन में विहार परायण हैं । श्री श्यामा श्याम के बड़े एवं सुंदर नैनों को देख देख देख सहचरियों के हृदय और नयन शीतल बने रहते हैं ।

  2. हौं निज सखियनि की बलिहारी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (34)

    श्री ध्रुवदास जी कहते है कि मैं नित्य विहारिणी श्री प्रिया की निज सहचरियों की बलिहारी जाता हूँ, जिनका आस्वादनीय जीवन अमृत है - लाड़िली-लाल युगल के प्रति सहज प्रीति एवं अहर्निश उनका रूप-दर्शन ।

  3. सुरति सुख सोये स्यामाँ स्याम - श्री भगवत रसिक, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.5)

    अब प्रिया लाल [राधा कृष्ण] रस विलास के सुख में डूब कर सो रहे हैं। वे दोनों परस्पर गलबाँहीं दिये हैं, जिससे उनके अंग अंग की छटा और भी मनोरम हो रही है ।

  4. कठिन है रंग महलको रिझाइबौ (औ) सहचरि कहाइबौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (88)

    श्री राधा के महल की टहल पाना, एवं सहचरी बनना अत्यंत कठिन है। यह छवि एवं रस तभी फलीभूत होता है जब श्री स्वामिनी (राधारानी) के चरण कमल का मकरंद प्राप्त होता है (अर्थात श्रीजी के चरणों में अनन्य प्रेम हो जाता है ) ।

  5. श्री राधा चालीसा - चालीस श्लोकों में श्री राधा महिमा गुणगान

    हे वृषभानु नंदिनी श्री राधा, आप भक्तों के प्राणों की आधार हैं। हे वृन्दावन विहारिणी, मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ। हे कृष्ण प्रिया, हे समस्त सुखों की धाम, मैं जैसा भी हूँ, जो भी हूँ, परन्तु आपका ही हूँ।

  6. बिलसौ दोउ लाल मेरे हिय - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (19)

    श्रीस्वामिनी जी का दिव्य मंगल विग्रह एक प्रकार की स्वर्ण कमलों की माला होकर श्रीलालजू के अंग-अंग में सुशोभित है। श्रीहरिप्रियाजू प्रार्थना करती हैं कि इस सुख में मग्न और प्रेम-क्रीड़ा में विलास करते हुए उन दोनों की रूप-माधुरी मेरे हृदय में सदा विराजमान रहे।

  7. श्री यमुना रसरानी, वृंदावन

    श्री यमुना जी श्रीमति राधारानी की नित्य सहचरी हैं। ब्रज धाम के बाहर, यमुना जी को एक पवित्र नदी के रूप में माना जाता है और लोग उनकी पूजा करते हैं, पुराण उन्हें यमपुरी के राजा यम की बहन के रूप में वर्णित करते हैं।

  8. हैं हम रसिक अनन्य प्रिया पिय - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.6)

    भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं, कि हम अनन्य रसिक (युगल सरकार के अनन्य) कुंजमहल के वासी हैं, जहां हमें प्रिया प्रियतम की नित्य ही नवायमान केलि लीलाओं का दर्शन होता है।

  9. मेरे प्रान धन स्वामिनि स्याम राधे - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.7)

    मेरे जीवन के प्राण धन एक मात्र दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण हैं। वे दोनों एक ही रस में लीन हैं, दोनों के रूप और आयु भी एक समान है, दोनों ही प्रेम रस में छके हैं और एक-दूसरे के नए-नए भाव सौंदर्य से मुग्ध हैं।

  10. आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (10)

    आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है।

  11. श्री राधावल्लभ के गुन गाइ लेहु - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (217)

    हे मन, श्री राधावल्लभ के गुणों का गान कर। असाधुओं का त्याग करते हुए, संतों का नित्य संग कर, भजन का अभ्यास कर और श्री हरि चरणों में प्रेम को बढा।

  12. सर्वोपरि म्हारी महरानी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (38)

    हमारी महारानी श्री राधिका रानी सर्वोपरि है, जिन्होंने तीनों लोकों को मोहित करने वाले श्री श्यामसुंदर को जीत लिया है और उन्हें प्रेमामृत का दान कर रहीं हैं।

  13. एक स्वरूप सदा द्वै नाम - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सिद्धान्त सुख (२६)

    श्री युगल किशोर स्वरूप से एक हैं, लेकिन दो नामों को धारण करते हैं। श्री राधारानी स्वयं श्रीकृष्ण को आनंद प्रदान करने वाली हैं, जो कि स्वयं आनंद हैं।

  14. मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.3)

    इस रसोपासना में सबकुछ मंगलमय है,यह बताते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस नित्यबिहार की किशोरीजी मंगल की मूर्ती है, लालजी भी मंगल की मूर्ती है और नित्य सहचरी (श्रीहरिदासजी) भी मंगल की मूर्ति है ।

  15. राधानागरकेलिसागरनिमग्नालीदृशां यत् सुखं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.54)

    श्रीराधानागर के केलिसमुद्र में निमग्न सखियों के नेत्रों को जो सुख होता है, श्रीभगवान् के सकल सुखोत्सव भी उस सुख के लवलेश तुल्य नहीं हैं । अनुपम सौभाग्य लक्ष्मीवान जिस किसी व्यक्ति की यदि उस सुख को प्राप्त करने की आशा हो, तो श्रीवृन्दावन नामक परमधाम में अपने शरीर का पात करे, देहान्त करे ॥१.५४॥

  16. जै जै वृन्दावन रजधानी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (31)

    सभी रसिक संतों की राजधानी श्री वृन्दावन धाम की जय हो, जय हो, जहां श्री राधा सर्वोच्च रानी ('महारानी') और श्री कृष्ण राजा (’महाराज') हैं। यह दिव्य युगल और वृंदावन का निरंतर अमृत शाश्वत है, जिसकी दिव्यता भी वेदों की समझ से परे है। दिव्य युगल के सेवक श्री हरिप्रिया सहचरी हमेशा इस दिव्य निवास यानी श्री वृंदावन को निहारती हैं।

  17. हमारें बल इक राधिका प्यारी, प्यारी हू सुख देत सहज ही, जानत निजु सहचारी। - श्री किशोरी अली, किशोरी अली ग्रंथावली

    मेरा बल केवल एक श्री राधा प्यारी हैं। उनके समान कृपालु कौन है जो अपनी सहचरी मान कर नित्य (हर क्षण) रस प्रदान करती हैं। श्री अली किशोरी कहते हैं कि हम श्री राधा पर बलिहारी हैं, जो मेरे जीवन की सम्पूर्ण निज सम्पति हैं।