swamini
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श्री राधा हौं जानति तो मन की - श्री वृंदावन दास जी
(एक सखी कहती है) हे श्री राधा! मैं आपके मन की बात भली-भाँति जानती हूँ। अपने प्रियतम (श्री कृष्ण) के विनय भरे वचन सुनकर आपका हृदय द्रवित हो जाता है क्योंकि आप अपने प्रेम के सच्चे प्रण का पोषण करने वाली हैं।
रे मन कर वृन्दावन वास - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
हे मन! अब तू श्री वृन्दावन में ही अखंड वास कर। संसार की व्यर्थ आशाओं को छोड़कर अब केवल अपनी स्वामिनी श्री राधा महारानी के चरणों का ही अनन्य आश्रय धारण कर।
श्यामा चरण कमल की आस - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (32)
हे श्यामा जू! मुझे केवल आपके चरण-कमलों की ही आशा है। हे श्री वृन्दावन की स्वामिनी श्री राधे! कृपा करके मुझे अपने समीप ही स्थान दीजिए। जहाँ यमुना जी का प्यारा तट सुशोभित है और आपका अपना निज-खास स्थली श्री सेवाकुञ्ज है, वहीं मुझे वास दीजिए।
गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)
हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निरंतर तुम्हारा ही यश गा रहे हैं। वे केवल तुम्हारे ही नाम का जाप कर रहे हैं और विरह में बिलख (रो) रहे हैं। काम ने श्याम को इतना व्यथित कर दिया है कि वे तुम्हारे प्रेम में पूरी तरह व्याकुल हो उठे हैं।
नव कुंज-सदन मैं आज रँगीली होरी - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.2)
नव-निकुंज-महल में आज रंगों से सराबोर होली की अद्भुत छटा छाई हुई है। एक ओर श्रीकिशोरीजी हैं और दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर दृढ़ता से उपस्थित हैं। दोनों अनन्त उमंगों और हर्षोल्लास के साथ परस्पर होली-लीला में उन्मत्त हैं।
जय जय श्री ललिता ललित - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5)
श्री ललिता जी की जय हो, जो सदैव युगल (श्री राधा कृष्ण) के आनंद को बढ़ाने वाली हैं। वे कीर्ति-नंदिनी, श्री राधा को अपना जीवन-प्राण मानती हैं।
प्रेमामृत रसानन्द मकरन्दौघ - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (29)
हे स्वामिनि! हे प्रेमामृत के आनंदरस का मधुर रस बरसाने वाली श्री राधे! आप कब मुझे अपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करेंगी?
राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)
यह पद साधक के उस करुण भाव को प्रकट करता है, जहाँ वह श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) से विनम्र निवेदन करता है— हे स्वामिनी! आप तो प्रेमरस की अमृतधारा हैं, फिर आपने अपने उस प्रेम-रस-सुधा रूपी खज़ाने को छिपाकर सारहीन विषय-प्रपंच रूपी भूसे में क्यों उलझा दिया है?
जयति जयति वृषभानु दुलारी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (06)
वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बार-बार जय हो। उस परम मनोहर श्री धाम वृन्दावन की जय हो, जहाँ लताओं, कुंजों और पुष्पों की सुगन्धित फुलवारी सदा शोभायमान रहती है।
भानुनन्दिनी मो तन हेरो - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (15)
हे भानुनन्दिनी, श्री राधा! मेरी ओर कृपा-दृष्टि डालिये। विषय-वासनाओं से मेरा हृदय तप रहा है— अपनी कृपा-कटाक्ष का एक कण बरसा कर इसे शीतलता प्रदान कीजिए
परमप्रेम गुन रूप अमित कवि को कहै - श्री अलबेली अलि
हे श्री राधे! तुम्हारे अगाध प्रेम, गुणों और सौंदर्य (रूप) का वर्णन कौन कवि कर सकता है? एक दीन मछली पानी में रहती है, भला वो अगाध सागर का अंत कैसे पा सकती है?
गिरिधर पिय के हृदवसी - श्री कुम्भनदास जी की वाणी (163)
हे सखि! गिरिधर पिय के हृदय में बसने वाली श्री राधिका के बदन की छवि अत्यंत सुंदर है। उनके एक अंग की शोभा के सामने तो करोड़ों चंद्रमा-सूर्य भी फीके पड़ जाते हैं।
प्यारीजू कौन तिहारी खोट - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (68)
हे प्यारीजू (राधे)! आपमें कोई भी दोष नहीं है (अर्थात् आपकी कृपा में कोई कमी नहीं है)। दोष तो मुझमें ही है, क्योंकि मैं तो अवगुणों की मोट (गठरी) हूँ।
राखि दृढ़ भरोसो तोको पोषैगी जय श्रीराधा - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, विनयावली (161)
श्रीराधा पर अटूट विश्वास रख, ऐसा निश्चित मान कि स्वयं साक्षात् श्रीराधा ही तेरा पालन-पोषण करेंगी।
जावक चरण देत चूम उर धर लेत - श्री हित चतुर्भुजदास
श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों में जावक लगते हैं, उन कोमल चरणों को चूमकर हृदय से लगाते ही प्रेम-वेग से रोमांचित हो उठाते हैं एवं नेह के आँसू बहाते हैं ।
राधे आन पड़ो तेरे द्वार - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (33)
हे राधे! मैं तुम्हारे द्वार पर आन पड़ी हूँ । हे वृषभानु नंदिनी! तुम्हें छोड़कर अब मैं किसे पुकारूँ? मैं संसार-सागर में डूब रही हूँ, कृपया अपनी कृपा की नाव से मुझे पार लगा दो।
मेरी स्वामिनी प्रसन्न बदन साँवरौ सुखरासि - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (20)
मेरी स्वामिनी श्री राधा जी प्रसन्न मुख वाली हैं और श्रीकृष्ण सुख की राशि हैं । मैं इन दोनों को नित्य-प्रतिदिन, क्षण-क्षण लाड़ लड़ाता रहूँ और इनकी शाबाशी पाता रहूँ । [1]
जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
जय हो ललितादिक सखियों में श्रेष्ठ, सखियों की चूड़ामणि श्री राधा महारानी की। हे स्वामिनी! मुझ पर अनुग्रह कर मेरी सुध लें और कृपापूर्वक अपने चरणकमलों को मेरे मस्तक पर सुशोभित कराएं।
प्रीतम कुंवारि चरन बिनु को है - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (24)
श्री राधा की परम अनन्यता धारण किए हुए एक सहचरी कहती है कि मेरा प्रियतम (प्रेम/लाड़ लड़ाने योग्य) किशोरी जी के चरणों के अतिरिक्त और कौन है? सम्पूर्ण जग अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध करता है, यहाँ प्रेम का लवलेश भी नहीं है और न ही इस मिथ्या जगत में वह वास्तविक सुख है जो श्री राधा के चरणों में है।
श्रीराधे अब बेग सम्हारौ - श्री प्रेम दास जी की वाणी (97)
हे श्रीराधे! अब कृपया शीघ्र मुझे संभाल लीजिए। हे परम नागरी! अब तनिक भी देर न लगाइए, मुझे अपनी निज दासी जान, मुझ पर कृपादृष्टि डालिए।