vihari
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विहारिणि तुमरोही विस्तार रहत - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी
हे श्री विहारिणी जी! यह संपूर्ण लीला-विलास और ऐश्वर्य आपका ही विस्तार है। प्रियतम श्री विहारी जी सदा आपके ही रुख (संकेत और इच्छा) की ओर निहारते रहते हैं और उसी के अनुसार अनंत क्रीड़ाओं की रचना करते हैं।
मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)
प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है।
नमो कृष्ण जै नित्य विहारी - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (3)
नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं।
सनेही एक विहारी-विहारिनि एक - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (99)
परम स्नेही केवल एक श्रीविहारी और श्रीविहारिणी ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं।
जै जै माधो मन मोहिनी श्रीराधिके - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (01)
माधव के मन को मोहने वाली श्री राधिका की बारंबार जय हो! आप अगाध रस-सिंधु की अमृतमयी धारा हैं, आपकी जय हो!
खेलत हैं वसंत विहारी विहारिन - गोस्वामी श्रीहितलाल जी
युगल सरकार, श्री विहारी-विहारिन, आज वसंत उत्सव माना रहे हैं। अबीर और गुलाल के रस-मेघ उमड़ रहे हैं, मानो रंगों की पिचकारी से प्रेम-रंग बरस रहा हो।
स्यामा सुकुमारी प्राणप्यारी श्रीविहारीजी की - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद
श्रीराधा परम सुकुमारी हैं, श्रीविहारी (कृष्ण) की प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं। वे परम सुंदर, सब की शिरोमणि स्वामिनी हैं।
जहाँ-जहाँ जाव तहाँ राधे-राधे होय रह्यो - श्री मधुरेश जी
जहाँ भी जाओ, “राधे! राधे!” की ध्वनि स्वाभाविक रूप से गूंजती रहती है — यही इस नित्य पुण्य भूमि ब्रज की अलौकिक महिमा है।
लोचन लालची महारी - श्री रूपरसिक देवाचार्य
मेरी आँखें ऐसी लालची हो गई हैं कि लोक-लाज और कुल-मान की परवाह छोड़कर केवल श्रीलालविहारी (श्री कृष्ण) के दर्शन में ही तल्लीन रहती हैं।
जाकी कृपा सों नित्य दिव्य ब्रजमंडल माँहि - श्री गिरिराज गोस्वामी 'अनन्त' (गोकुल)
जिनके श्री चरणों की कृपा से मनुष्य नित्य दिव्य ब्रज धाम वास करता हूँ, रमण-बिहारी एवं बिहारिणी की अंतरंग लीलाओं का अवलोकन करता है।
मोहि भरोसौ स्वामी जी को - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (91)
मुझे तो ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी पर विश्वास है । उनकी करुणा ऐसी है कि वे जिस पर कृपा करते हैं, उसे भी अपने समान बना लेते हैं । अर्थात् जिस प्रकार वे स्वयं श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करते हैं, वही सेवा का अधिकार वे अपने कृपापात्र को भी दे देते हैं। उनके प्राणों का आधार युगल नित्य विहार है ।
आरती भानु दुलारी की - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मैं बृषभानु की लाड़िली पुत्री, बरसाने वारी राधे की आरती करता हूँ। राधा रानी दिव्य धाम वृंदावन में रत्न जड़ित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं।
वाँह-विहारी की गहों बसों विहारी धाम - ब्रज के दोहे
श्री बाँके बिहारी लाल जी की बाँह को पकड़ो, श्री बाँके बिहारीजी के धाम श्री वृंदावन में बसो, श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करो एवं श्री बिहारी जी के नाम का रटन करो।
तनमन हमारो सो तो सबही लडैतीजू को - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (123)
हमारा तन, मन और सर्वस्व तो लड़ैती जू (श्री राधा) का ही है, और हमारा जीवन भी वृषभानु नंदिनी श्री राधा ही हैं।
रसिक विहारी सुकमारी प्रान प्यारी जू कों - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (45)
रसिक बिहारी श्यामसुन्दर की प्राणप्यारी श्री राधा वृंदावन की सजीली छवि का दर्शन करवा रही हैं।
हों न भई रज कुंज ललित वन - श्री ललित माधुरी
यदि मैं वृंदावन की किसी ललित कुंज की रज होता तो यह मेरा परम सौभाग्य होता, जिससे मैं श्री श्यामाश्याम के चरण कमलों से लगा रहता और मेरा मन प्रसन्नता से सदा फूला रहता।
श्री प्रिया विहारी कुंज में, विहरत मदन हुलास - श्री संतदास, विहार रसामृत
दिव्य दंपति बाँके बिहारी एवं बिहारिनी जू, वृंदावन की कुंजों में विहार पारायण हैं, जिनके युगल चरणों की सेवा नित्य ही सखियाँ करती हैं । ऐसी कृपा हो कि वे युगल चरण मेरे ह्रदय को भी प्रकाशित करें ।
राज चक्रवर्ती हू कों - श्री हित चंद्र लाल गोस्वामी जी
मेरा मन पृथ्वी के नश्वर राज्यादि के सुखों का आदर नहीं करता और स्वप्न की सी माया जानकर उसको त्याग देता है।
आराधहि मन राधा दुलहिनि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (100)
हे मेरे मन ! तू श्री राधा नामक नित्य नव-वधू नवल-किशोरी की ही आराघना कर, जिनकी आराधना रसिक शेखर श्री विहारीलाल भी सदा करते हैं।
सनेही एक विहारी-विहारिनि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)
अखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में यदि कोई प्रेमी है, तो वह केवल श्री वृन्दावन निकुञ्ज-विलासी विहारी-विहारिणी श्री लाड़िली-लाल ही हैं, जो केवल अनन्य प्रेम की रंग-रुचि में अद्भुत रूप से अनुरञ्जित हुए देखे जाते हैं।