vrindavan
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वृंदावन को चूहरौ बेचि खातु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (43)
श्रीवृन्दावन धाम में निवास करने वाला चूहड़ा समुदाय का वह व्यक्ति भी, जो छाज बेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता है, इतना परम सौभाग्यशाली है कि किसी अन्य गाँव अथवा नगर का राजा भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। श्रीधाम वृंदावन के वास की महिमा सर्वोपरि है।
ठाड़े री मोहन चरण पहाड़ी - श्री हित वृंदावन दास जी
हे सखी! श्रीमोहन चरण पहाड़ी पर खड़े हैं। वायु के वेग से उनका पीतांबर फहरा रहा है और मस्तक पर झुके मुकुट की शोभा अत्यंत न्यारी लग रही है।
सेज सुसंपति जुगल रति दंपति - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (45)
श्रीवृन्दावन के दिव्य निकुञ्ज-भवन में सुन्दर शय्या और समस्त मनोहर रस-सामग्रियों से सुशोभित श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अपनी अनन्य गति, मति और प्रेम को एक-दूसरे में समर्पित कर परस्पर गहन प्रेम में लीन हैं। श्रीवृन्दावन रूपी उनके निज धाम में युगल दंपति के नित्य-बिहार के अलौकिक सुख का निरंतर दर्शन प्राप्त होता है।
सा वै सुमाता च पिता - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.45)
जो श्रीवृन्दावन में वास करने के लिए आदेश दे, वही मेरी सुमाता है तथा वही मेरा पिता, वही बन्धु, वही सखा और वही मेरा वन्दनीय देवता है।
किया था गोपियों ने यहीं - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (23)
गोपियों ने मन को चुराने वाले चंचल श्रीकृष्ण को पाने की तीव्र लालसा में इसी श्रीधाम वृन्दावन में श्री कात्यायनी देवी का व्रत किया था।
गुन रूपकी अवधि राधिका - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)
गुण और सौंदर्य की पराकाष्ठा श्री राधिकाजू ने रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण का तन, मन, धन, यौवन, आभूषण और प्राण—सब कुछ उनकी प्राणप्रिया श्रीराधाजी के लिए ही समर्पित है।
धन-धन वृन्दावन के साँप प्यारे - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (81)
वृंदावन धाम के वे प्यारे सर्प अत्यंत धन्य हैं, जो वास्तव में काले भुजंग होकर भी सीधे ठाकुर जी के मंदिर में निवास करते हैं और वहाँ बोलते हैं।
सुजस जाहु व्यौहार लागि परमारथ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (8)
भले ही संसार के लोक-व्यवहार में मेरा यश और सुकीर्ति नष्ट हो जाए तथा परमार्थ के क्षेत्र में भी मेरा नाम पूर्ण रूप से मिट जाए, फिर भी मैं श्री धाम वृन्दावन को छोड़कर किसी भी अन्य स्थान पर कभी नहीं जाऊँगा।
तालन पै ताल पै तमालन - श्री पद्माकर
शरद ऋतु की उज्ज्वल चाँदनी सरोवरों पर, ताल एवं तमाल के वृक्षों पर, गले की मालाओं पर, वृंदावन की गलियों में तथा विहार-स्थल बंशीवट पर सर्वत्र फैल गई है।
श्रीमद् वृन्दावनभुवि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (6.35)
जिस व्यक्ति ने परमानंद साम्राज्य के मूलस्वरूप श्रीधाम वृंदावन की पावन भूमि में जीवन के अंतिम क्षण तक निवास करने का दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसे मैं सादर प्रणाम करता हूँ। क्योंकि श्रीराधारानी और रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण ऐसे व्यक्ति को अपने निजजनों में सम्मिलित होने के योग्य समझकर, परस्पर प्रेमपूर्वक विचार करते हैं कि “हमें इसकी किस प्रकार देखभाल करनी चाहिए और इसके लिए क्या व्यवस्था करनी चाहिए?”
यह रस अनुभव जनित है - चाचा श्री वृंदावन दास जी
यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।
कोई कहौ कुलटा कुलीन अकुलीन - श्री देव जी
चाहे कोई मुझे दुराचारिणी कहे, कुलीन अथवा अकुलीन कहे, दरिद्र, कलंकिनी या कुल की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली स्त्री कहे, मुझे इन बातों की तनिक भी परवाह नहीं है।
उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् - श्री वल्लभाचार्य, निरोधलक्षणम (3)
जिस प्रकार श्रीउद्धवजी के आगमन पर श्रीवृन्दावन अथवा गोकुल में महान उत्सव और आनंद प्रकट हुआ था, उसी प्रकार का दिव्य हर्ष और उत्सव मेरे हृदय में भी क्या कभी प्रकट होगा?
वृन्दावन ही बीज है वृन्दावन - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (86)
श्रीवृन्दावन ही विशुद्ध प्रेमाभक्ति का बीज है और श्रीवृन्दावन ही उसका खिला हुआ पुष्प है। श्रीवृन्दावन ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है तथा श्रीवृन्दावन ही प्रेम-रस का मूल स्रोत और आधार है।
राधिका कौ नाम सुखधाम विसराम - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (20)
हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता?
ललित सरोवर ललित वन ललना लाल समेत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (17)
अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।
श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
श्री वृन्दावन धाम पूरी तरह से श्री राधाजी के स्वरूप से ओत-प्रोत है, जहाँ प्रतिदिन, हर क्षण और आठों पहर निरंतर केवल 'राधा-राधा' नाम का ही संकीर्तन होता रहता है।
करौ कृपा नव नागरी अद्भुत - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (18)
हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे।
यहीं तो थी कभी ऋषि - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (20)
यही वह स्थान है जो यमुना जी के तट के बिल्कुल निकट है और कभी परम तपस्वी सौभरि ऋषि की पवित्र तपोभूमि हुआ करता था।
हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)
हमें शास्त्रों की कोई समझ नहीं है और न ही हम उन्हें समझना चाहते हैं। जो लोग इन्हें अब तक नहीं समझ पाए वे आगे भी नहीं समझेंगे, परंतु जिन महापुरुषों ने शास्त्रों के वास्तविक सार को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम केवल उसी का पालन करेंगे।