1982 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।

  2. कब रसिकनिके पैर परि रोऊँ - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (04)

    वह समय कब आएगा जब मैं अत्यन्त दीन होकर रसिक महापुरुषों के चरणों में गिरकर विलाप करूँगा? और वह अवस्था कब प्राप्त होगी जब अपने प्रियतम के दर्शन के बिना मैं जल के बिना तड़पती हुई मछली के समान व्याकुल हो जाऊँगा?

  3. राधा पदाब्जसेवान्यस्पृहा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.34)

    भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों में श्रीराधा-दासी को श्रीराधा के चरण-कमलों की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। वह श्रीराधा के विशुद्ध प्रेम से प्रकट होने वाले असीम रस-सागर में सदा निमग्न रहती है।

  4. धन-धन वृन्दावन के लवा बटेर - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (72)

    धन्य हैं श्री वृन्दावन के लवा और बटेर पक्षी। बाज के भय से वे दिन-रात कुंजों की ओट के भीतर दुबकेहुए बैठे रहते हैं, फिर भी कभी वृन्दावन छोड़कर बाहर नहीं जाते और सदा कुंजों की शरण लिए रहते हैं।

  5. श्री वृन्दावन छांडिकै जो कहू - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (18)

    यदि मैं श्री वृंदावन धाम को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर चला जाऊँ, तो मैं दृढ़तापूर्वक घोषित करता हूँ कि तुम मुझे इस अनन्य निष्ठा से भटका हुआ पतित समझकर दामोदर नाम से कदापि न पुकारना अर्थात् मेरा अस्तित्व, पहचान और जीवन सब कुछ श्री वृन्दावन से ही जुड़ा हुआ है।

  6. वृन्दावन परम मधुर सुखदानी भाव - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (7)

    श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।

  7. या रस कों हौं हीं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)

    श्री प्रिया-प्रियतम के अत्यंत गोपनीय और अनिर्वचनीय निकुंज-रस का गान करते हुए रसिक शिरोमणि कवि आनंदघन जी कह रहे हैं— इस परम अलौकिक और गूढ़ प्रेम-रस का बखान भला मैं अपनी तुच्छ वाणी से किस प्रकार कर सकता हूँ? परम पावन श्रीधाम श्रीवृंदावन में, यमुना जी के सुंदर तट पर श्रीराधा-मोहन जिस अंतरंग भाव से नित्य विहार करते हैं, वह वाणी से सर्वथा परे है।

  8. वौरी ह्वै मग डोलिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)

    हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।

  9. हम न भये व्रज में प्रगट - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (07)

    यद्यपि व्रजभूमि की पावन रज में जन्म लेने का सौभाग्य मुझे प्राप्त न हो सका, तथापि अब मेरे हृदय की एकमात्र अभिलाषा यही है कि श्रीधाम वृन्दावन का मैं अखंड वास करूँ तथा नित्य-प्रति श्री राधा-कृष्ण की मनोहर युगल छवि का दर्शन एवं चिंतन करते हुए अपना जीवन कृतार्थ करूँ।

  10. समता वृन्दाविपिन की - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.70)

    श्री वृन्दावन धाम अद्वितीय है, उसकी तुलना भला किससे की जा सकती है? वहाँ निवास करना तथा उसके पावन यमुना-तट पर प्राण त्यागना परम मंगलमय और आनन्ददायक है।

  11. वंदे श्री वृंदावन धाम - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (3)

    मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।

  12. मिलि खेलि मोहन सौं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)

    श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं— हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलकर क्रीड़ा कीजिए। जब आप रस में उन्मत्त होकर अपने प्राणप्यारे कुंजबिहारी संग रस-विलास में प्रवृत्त होती हैं केवल तभी हमारे तन-मन-प्राण प्रफुल्लित होते हैं मानो हमारा रोम-रोम सब प्रकार से परितृप्त हो उठता है।

  13. कानन मो गति कानन मो पति - श्री वृंदावन दास जी

    यह दिव्य कानन (श्री वृन्दावन अथवा बरसाना धाम) ही मेरी एकमात्र गति (आश्रय) है, यही मेरा स्वामी (पति) है, और यही मेरी माता, पिता तथा भाई है। मैं इस पावन कानन में नित्य निर्भय होकर वास करूँ, और मेरा यह मन इस कानन को त्यागकर कभी भी किसी अन्य स्थान पर न भटके।

  14. का इन नयननितैं कबहुं निरखूँ रास विलास - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (08)

    हा! क्या इन नेत्रों से मुझे कभी प्रिया-प्रियतम के श्री रास-विलास का दर्शन प्राप्त होगा? क्या कभी ऐसा समय आएगा जब मैं श्री वृन्दावन में अखंड वास करूँगा जिससे मेरे हृदय की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाएँगी?

  15. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  16. धन धन वृन्दावन गोपेश्वर बाबा - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (07)

    श्री वृन्दावन के गोपेश्वर महादेव धन्य, धन्य हैं। उन्होंने वंशीवट पर अपनी बैठक बनाई है और वे वृन्दावन के कोतवाल (रक्षक) होने का अधिकार रखते हैं।

  17. श्री राधा हौं जानति तो मन की - श्री वृंदावन दास जी

    (एक सखी कहती है) हे श्री राधा! मैं आपके मन की बात भली-भाँति जानती हूँ। अपने प्रियतम (श्री कृष्ण) के विनय भरे वचन सुनकर आपका हृदय द्रवित हो जाता है क्योंकि आप अपने प्रेम के सच्चे प्रण का पोषण करने वाली हैं।

  18. नन्दगाँव गोकुल गोवर्धन की काह कहौं - श्री मधुरेश जी

    नन्दगाँव, गोकुल और श्री गोवर्धन की ऐसी अगाध महिमा है कि इसका कहाँ तक वर्णन करूँ? वहाँ की गोपियों, गोपों, ग्वालबालों और गायों की शोभा का बखान करना शब्दों की सीमा से परे है।