1931 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. सरस-सुगन्ध-मन्द मलयानिल विहरत - श्री सूरदास, सूर सागर (4891)

    श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में रसमयी, सुगंधित और मंद-शीतल मलय पवन बहती है। श्री धाम वृंदावन में जो अलौकिक प्रेम-क्रीड़ा होती है, वैसी विहार लीला तीनों लोकों में कहीं भी नहीं है।

  2. धन हित सटकौ अनत कौ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (16)

    यदि धन-संपदा की तृष्णा के वशीभूत होकर मैं श्रीधाम वृन्दावन को पीठ दिखाकर किसी अन्य स्थल की ओर पलायन करूँ, तो मैं अपने ही नेत्र फोड़ लेने योग्य हूँ।।

  3. धन-धन बृन्दाविपिन बसैं हलवाई - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (95)

    श्री वृन्दावन धाम में निवास करने वाले हलवाइ अत्यंत धन्य और सौभाग्यशाली है। वे परम प्रेम से अत्यंत सुंदर जलेबी, खुरमा, खाजा और मलाई इत्यादि मिष्ठान तैयार करते हैं।

  4. वृन्दावने नन्दित कृष्णचन्द्र - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.14)

    जिस श्रीवृन्दावन में श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दपूर्वक नित्य विहार करते हैं और जहाँ निरालस काम-विलास-लीलाओं का अखण्ड समूह विद्यमान है, वहाँ मेरा मन श्रीराधा महारानी के चरण-कमलों पर गुंजार करने वाली भ्रमरी के समान सदा अनुरक्त रहे।

  5. ऐसी कृपा करो श्रीराधे मिले - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    हे श्री राधे! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे श्री वृन्दावन में अखण्ड वास प्राप्त हो। मुझे अपने निज कुञ्ज-भवन में स्थान देकर अपनी निज सेवा प्रदान कीजिए।

  6. विहरति नित्य विलास सुख श्री - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी

    मन को हरण करने वाली परम श्रेष्ठ श्री युगल जोड़ी अपनी सहचरियों के समूह के साथ श्री वृन्दावन के निकुंजों में नित्य विलास के परम सुख का निरंतर विहार करती है।

  7. कब रसिकनिके पैर परि रोऊँ - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (04)

    वह समय कब आएगा जब मैं अत्यन्त दीन होकर रसिक महापुरुषों के चरणों में गिरकर विलाप करूँगा? और वह अवस्था कब प्राप्त होगी जब अपने प्रियतम के दर्शन के बिना मैं जल के बिना तड़पती हुई मछली के समान व्याकुल हो जाऊँगा?

  8. राधा पदाब्जसेवान्यस्पृहा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.34)

    भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों में श्रीराधा-दासी को श्रीराधा के चरण-कमलों की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। वह श्रीराधा के विशुद्ध प्रेम से प्रकट होने वाले असीम रस-सागर में सदा निमग्न रहती है।

  9. धन-धन वृन्दावन के लवा बटेर - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (72)

    धन्य हैं श्री वृन्दावन के लवा और बटेर पक्षी। बाज के भय से वे दिन-रात कुंजों की ओट के भीतर दुबकेहुए बैठे रहते हैं, फिर भी कभी वृन्दावन छोड़कर बाहर नहीं जाते और सदा कुंजों की शरण लिए रहते हैं।

  10. श्री वृन्दावन छांडिकै जो कहू - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (18)

    यदि मैं श्री वृंदावन धाम को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर चला जाऊँ, तो मैं दृढ़तापूर्वक घोषित करता हूँ कि तुम मुझे इस अनन्य निष्ठा से भटका हुआ पतित समझकर दामोदर नाम से कदापि न पुकारना अर्थात् मेरा अस्तित्व, पहचान और जीवन सब कुछ श्री वृन्दावन से ही जुड़ा हुआ है।

  11. वृन्दावन परम मधुर सुखदानी भाव - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (7)

    श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।

  12. या रस कों हौं हीं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)

    श्री प्रिया-प्रियतम के अत्यंत गोपनीय और अनिर्वचनीय निकुंज-रस का गान करते हुए रसिक शिरोमणि कवि आनंदघन जी कह रहे हैं— इस परम अलौकिक और गूढ़ प्रेम-रस का बखान भला मैं अपनी तुच्छ वाणी से किस प्रकार कर सकता हूँ? परम पावन श्रीधाम श्रीवृंदावन में, यमुना जी के सुंदर तट पर श्रीराधा-मोहन जिस अंतरंग भाव से नित्य विहार करते हैं, वह वाणी से सर्वथा परे है।

  13. वौरी ह्वै मग डोलिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)

    हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।

  14. हम न भये व्रज में प्रगट - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (07)

    यद्यपि व्रजभूमि की पावन रज में जन्म लेने का सौभाग्य मुझे प्राप्त न हो सका, तथापि अब मेरे हृदय की एकमात्र अभिलाषा यही है कि श्रीधाम वृन्दावन का मैं अखंड वास करूँ तथा नित्य-प्रति श्री राधा-कृष्ण की मनोहर युगल छवि का दर्शन एवं चिंतन करते हुए अपना जीवन कृतार्थ करूँ।

  15. समता वृन्दाविपिन की - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.70)

    श्री वृन्दावन धाम अद्वितीय है, उसकी तुलना भला किससे की जा सकती है? वहाँ निवास करना तथा उसके पावन यमुना-तट पर प्राण त्यागना परम मंगलमय और आनन्ददायक है।

  16. वंदे श्री वृंदावन धाम - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (3)

    मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।

  17. मिलि खेलि मोहन सौं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)

    श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं— हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलकर क्रीड़ा कीजिए। जब आप रस में उन्मत्त होकर अपने प्राणप्यारे कुंजबिहारी संग रस-विलास में प्रवृत्त होती हैं केवल तभी हमारे तन-मन-प्राण प्रफुल्लित होते हैं मानो हमारा रोम-रोम सब प्रकार से परितृप्त हो उठता है।