18 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. रास-रस रसिक रँगीली राधा - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)

    श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।

  2. गिरि-पति लागी मेरु - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)

    पर्वतराज हिमालय स्वयं मेरु पर्वत के अधीन हैं। मेरु पर्वत पृथ्वी के अधीन है। पृथ्वी का आधार शेषनाग, वराह, कच्छप और जलमय स्वरूप हैं — अतः पृथ्वी इन आधारों के अधीन है।

  3. राधाभक्तपदाम्भोज - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (17)

    श्री राधा महारानी के अनन्य भक्तों की चरण-धूलि को अपने मस्तक पर धारण कर लेना चाहिए। फिर यम-नियम आदि अन्य साधनों की क्या आवश्यकता? न तो वैराग्य की आवश्यकता रह जाती है, और न ही जप आदि की। स्वामिनीजी के अनन्य भक्तों की चरण रज ही उद्धार करने के लिए पर्याप्त है।

  4. मन ना रँगाये रँगाये जोगी कपरा - श्री कबीरदास

    जोगी के मन में प्रेम का रंग तो नहीं है, उसने केवल कपड़े रंगवा लिए हैं। वह आसन मारकर मंदिर में बैठ तो गया है, परंतु मूर्ति में भगवान की भावना बनाने (एवं सब के ह्रदय में भी भगवान हैं ) के बजाय केवल पत्थर की ही पूजा कर रहा है।

  5. न पापेभ्यो भयं यत्र - स्कंद पुराण, मथुरा माहात्म्यम् (2.5.17.46)

    जहाँ पापों का भय नहीं है, जहाँ यमराज (मृत्यु) का भय नहीं है, और जहाँ गर्भवास का भय नहीं है, ऐसे दिव्य मथुरा क्षेत्र (ब्रज) की शरण कौन नहीं लेगा?

  6. जम की मार बुरी अहै, छुटै न और उपाइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (75)

    यमराज का दण्ड (मृत्यु और नरक का कष्ट) अत्यंत भयानक है, जिससे बचने का संसार में अन्य कोई उपाय नहीं है। यदि कोई जीव दृढ़तापूर्वक श्री हरि की भक्ति को अपना लेता है, तब भगवान स्वयं अपने भक्त की सहायता के लिए तत्पर हो जाते हैं और उसे यम के भय से मुक्त कर देते हैं।

  7. जो मन बुद्धि दै के भजे आठु यामा - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्यामा श्याम गीत (18)

    जो जीव मन-बुद्धि का समर्पण कर निरन्तर श्रीराधा का स्मरण करता है उसका योगक्षेम वह उसी प्रकार वहन करती हैं जिस प्रकार नवजात शिशु की देखभाल माँ करती है।

  8. श्री यमुनाष्टकं - श्री वल्लभाचार्य

    मैं श्री यमुना जी को प्रणाम करता हूँ जो समस्त सिद्धि को प्रदान करने वाली हैं । श्री यमुना जी के छोर की रज श्री कृष्ण के चरण कमल के समान चमक रही है । श्री यमुनाजी के तट पर स्थित कुंजों के फूलों की सुगंध से यमुना जी का पानी भी सुगंधित है। समस्त विनम्र एवं चतुर गोपियां यमुना जी की भक्ति करती हैं । श्री यमुना जी श्री कृष्ण की सुंदरता अपने में समेटे हुए है ।

  9. व्रत, तप, निगम, नेम, यम - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (33)

    भक्ति रहित जो भी व्रत, तप, वेद-पाठ, नियम यम,संयम आदि बड़े-बड़े साधन हैं, कष्ट साध्य एवं क्लेशदायक हैं तथा इनका प्रवेश भक्ति-देवी के द्वार तक नहीं है । ये सभी याचकों की भाँति भक्ति-देवी की कृपा की आकांक्षा लिये उनके द्वार पर पड़े रहते हैं ।

  10. श्री यमुना रसरानी, वृंदावन

    श्री यमुना जी श्रीमति राधारानी की नित्य सहचरी हैं। ब्रज धाम के बाहर, यमुना जी को एक पवित्र नदी के रूप में माना जाता है और लोग उनकी पूजा करते हैं, पुराण उन्हें यमपुरी के राजा यम की बहन के रूप में वर्णित करते हैं।

  11. रटो निश दिन राधा नाम रे - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज

    अरे मन! निरंतर "राधा" नाम का रटन कर, जो कि सर्वोच्च भगवान श्री कृष्ण द्वारा भी दिन-रात रटन किया जाता है, श्री राधा नाम स्वयं पूर्ण काम हैं (पूर्ण संतुष्ट) ।

  12. श्यामा श्याम पूछें कहा चाहो ब्रज बामा - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, श्यामा श्याम गीत (237)

    श्यामा श्याम ने ब्रज सखियों से पूछा कि वे क्या चाहती हैं, सखियाँ बोलीं: आप दोनों नित्य मुस्कुराते रहो एहि हमारी चाह है।

  13. श्याम गए मथुरा न गइ ब्रज बामा - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्यामा श्याम गीत (249)

    श्यामसुंदर जब गोपियों से अलग हुए शरीर से तो गोपियाँ उनसे मिलने मथुरा नहीं गयी । उन्होंने केवल श्याम सुन्दर की रूचि में ही अपनी रूचि रखी।