राग देवगंधार

राग देवगंधार एक बहुत ही प्यारा राग है, इसकी अनूठी उपज दोनों गंधार के आवेदन से हुई है। यह राग सुबह 9 से 12 बजे के दौरान गाया जाता है।

16 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. कुँवरि मोहे देहु बास बरसाने - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (25)

    हे वात्सल्यमयी लाड़ली किशोरी जी! आप अकारण करुणा करके मुझे अपने परम पावन और रसमय धाम श्री बरसाना में सदा के लिए अखंड वास प्रदान कर दीजिये। इस संसार के नश्वर और भजन-प्रतिकूल समस्त भौतिक वासनाओं का सर्वथा परित्याग करके, मैं केवल आपके भजन में लीन रहूँ और आपके दिव्य महल में सदा अनुरागपूर्वक निवास करता रहूँ।

  2. अरी तेरी सहज की मुसिक्यान - श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (68)

    इस पद में सखियाँ श्री राधा की सुंदरता और उनके प्रति श्री कृष्ण के समर्पण का वर्णन करती हुई कहती हैं कि हे सखी! तेरी सहज मनमोहक मुस्कान ने श्री कृष्ण को मोह लिया है। सारा संसार जिनका यश गाता है, वे श्री कृष्ण अब तुम्हारे अधीन हैं।

  3. दोऊ राजत स्यामा स्याम - श्री सूरदास, सूरसागर (1696)

    श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर रही हैं।

  4. जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (35)

    हे प्यारीजू! तुम्हारे जिस-जिस अंग पर मेरी दृष्टि पड़ती है, मेरा मन वहीं ठहर जाता है। मैं तुम्हारी सौगंध खाकर यह कहता हूँ कि मैं तुम्हारा ही नित्य दास हूँ।

  5. आजु बधाई है बरसानैं - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (355)

    बरसाना आज बधाइयों से गूंज रहा है — वृषभानु जी के घर कुँवरि किशोरी श्री राधा का अवतरण हुआ है, और समस्त लोकों में मंगलध्वनि गूंज रही है।

  6. किशोरी मेरी हरो सकल भव बाधा - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (6)

    हे किशोरी जी (श्री राधा), मेरी समस्त भव-बाधाओं का हरण कीजिए, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ। इस त्रिभुवन में मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ।

  7. श्री वृंदावन चंद बिहारी - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (39)

    श्री बाँके बिहारी लाल जो नित्य नयी नयी केली करने वाले ठाकुर हैं वे वृंदावन धाम के मानो चंद्रमा हैं । इनकी विलक्षण रूप माधुरी बहुत सुहावनी लगती है जिसकी उपमा अन्य किसी भी रूप से नहीं की जा सकती ।

  8. ऐसो कब करिहौ मन मेरौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (102)

    हे वृंदावन! ऐसा मेरा मन कब करोगे जब में हाथ में करूवा और कन्धे पर कमरिया (छोटा कम्बल) रखकर वृन्दावन की कुंजों के मध्य में बस जाऊँगा ।

  9. रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (123)

    हे राधा प्यारी, आपके इस अद्भुत रूप का वर्णन करने का सामर्थ मेरे में नहीं है । यदि मेरे रोम रोम में कोटि कोटि रसना भी हो तो भी मैं आपके गुणों का बखान नहीं कर सकता ।

  10. आजु अति राजति नागरी नाहु - श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (5)

    श्यामाकुंज बिहारी की आज की छवि बड़ी ही मोहक है। दोनों परस्पर गलबहियां दिये वृन्दावन की कुन्ज कुन्ज में भ्रमण करते डोल रहे है।

  11. कुँवरि राधिका तुम सकल सौभाग्य सींवा - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (159)

    श्री कुम्भनदास कहते हैं "हे कुँवरि राधिका जू, आप समस्त सौभाग्य की सीमा हो, आपके इस स्वरुप पर मैं करोड़ों करोड़ों चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। मेरे मन में यह विचार भी आ रहा है की आपके नयन कमलों पर करोड़ों करोड़ों खंजन पक्षी तथा मृगों को न्योछावर कर दूँ, जिनके नेत्र विश्व में सबसे सुन्दर माने गए हैं।"

  12. आजु बन राजत जुगल किसोर - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (33)

    आज श्रीवृन्दावन में युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम शोभायमान हैं। श्रीनन्दनन्दन और श्रीवृषभानुनन्दिनी सम्पूर्ण रात्रि प्रेम विहार करने के बाद उनींदी अवस्था में प्रातःकाल उठे हैं।

  13. तिहारो सुख जौ मन मैं आवै - श्री आनन्दघन जी

    वृंदावन के सुख का वर्णन करते हए श्री आनंदघन जी कहते हैं कि जैसे ही वृंदावन के सुख (रस) हृदय में आता है तो अपने भाग्य की महिमा का वर्णन करना असम्भव सा लगता है ।

  14. प्रगटी राधा रूप निधान - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (8)

    आज श्री राधारानी प्रकट भइ हैं, जो रूप में सुंदरता की खान है। जो भी इनके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर रहा है वह दूसरे से यही पूछ रहा है की "यह कौन हैं, जिनकी तुलना में समस्त सुंदरता भी तुच्छ हो गई है।" जो जो इनकी सुंदरता की उपमा कह रहा है वह जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्ति प्राप्त कर रहा है।