अभिलाष माधुरी

अभिलाष माधुरी श्री ललित किशोरी देव द्वारा रचित रस काव्य है। इसमें श्री युगल माधुरी, वृंदावन धाम रस माधुरी इत्यादि सम्मलित हैं । लेखक: श्री ललित किशोरी

137 लेख उपलब्ध हैं

  1. वौरी ह्वै मग डोलिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)

    हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।

  2. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  3. आनदेश के गमन को - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (34)

    हे भाई! अपने मन में किसी अन्य स्थान या देश में जाने का विचार स्वप्न में भी न लाओ। श्री धाम वृन्दावन का यह परम-पावन वास और यहाँ होने वाला श्री युगल-सरकार का नित्य-विहार भला अन्यत्र कहाँ सुलभ है? अतः जो परम सौभाग्य तुम्हें यहाँ प्राप्त है, उसका त्याग कर कहीं और जाने की कल्पना भी मत करो।

  4. कालीदह कूल कुंजके माहीं - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (28)

    मेरी यही अभिलाषा है कि मैं कालीदह के तट पर स्थित कुंजों में एक भ्रमरी बनकर वृक्षों की डालियों पर निवास करूँ अथवा निधिवन का तोता या कोयल बन जाऊँ और मधुर स्वर में निरंतर 'राधा' नाम का ही गान करूँ।

  5. कवधौं कृपा लाड़िली ह्वै है - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (124)

    प्यारी श्री लाड़िलीजू (श्री राधा) की मुझ पर कब कृपा होगी, कि मैं भी सदा के लिए श्री वृन्दावन में वास करूँगा? कब मैं इन आँखों से श्यामाश्याम की उस अनुपम अथवा परम सुंदर छवि के दर्शन कर सकूँगा?

  6. राधा नाम सों चित रांच - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (202)

    अपने मन को श्री राधा-नाम में पूर्णतः रमा दो। अपने भीतर के कागज़ (अंतःकरण) पर निर्मल और प्रेमपूर्ण रुचि के साथ राधा-नाम की रेखाएँ अंकित कर दो।

  7. ठकुराई प्यारी लई सिवकाई पी वांट - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (69)

    वृन्दावन की अनुपम प्रेम-लीला में श्री राधा ने ठकुराई (स्वामित्व) ले ली और श्री कृष्ण ने सेवकाई स्वीकार कर ली। दोनों ने अपने मन को, अपना सर्वस्व, एक-दूसरे में समर्पित कर दिया, इस प्रकार से कि दोनों के मन एक हो गए। हे सखी! प्रेम की रीति का यही सच्चा सार है।

  8. ऐसी को करिहै श्रीराधा - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (292)

    हे श्रीराधे! इस पूरे ब्रह्मांड में ऐसी परम कृपालुता से युक्त कौन हो सकता है, जो अपने नाम के केवल ‘रा’ अक्षर के उच्चारण मात्र से अपनी शरणागत दासी के हृदय का अंधकार मिटा दे।

  9. जमुना-पुलिन कुंज गहबर की - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)

    ऐसा कब होगा कि मैं यमुना-तट के किसी एकांत कुंज में किसी वृक्ष पर कोयल बनकर कूकूं, अथवा श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों का भौंरा बनकर मधुर-मधुर गुंजार उन्हें सुनाऊं।

  10. कीट पतंग पिपीलिका मरकट भृंग मयूर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (97)

    चाहे कीड़ा, पतंगा, चींटी, बन्दर, भौंरा या मोर—जो भी देह मिले, मुझे स्वीकार है। बस, हे युगल-बिहारी! मुझे वृन्दावन की धूल (तुम्हारी चरण-रज) बना दीजिए—वहीं का कण बनकर रहूँ।

  11. प्यारीजू कौन तिहारी खोट - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (68)

    हे प्यारीजू (राधे)! आपमें कोई भी दोष नहीं है (अर्थात् आपकी कृपा में कोई कमी नहीं है)। दोष तो मुझमें ही है, क्योंकि मैं तो अवगुणों की मोट (गठरी) हूँ।

  12. पशु पक्षी पाषाण हों - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (91)

    हे ललित किशोरी (श्रीराधा)! कृपा कर मुझे ब्रज की गलियों में कुछ भी बना दें— चाहे पशु, पक्षी, पत्थर, तृण या ब्रजरज का एक धूलिकण ही क्यों न हो। चाहे कोई कुआं, बावड़ी या निर्जीव वस्तु ही क्यों न बना दो, बस एक ही विनती है — ब्रजधाम की रज को छोड़ कहीं और जन्म या वास न देना।

  13. हेस्वामिनि श्रीकुंजविहारिनि - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (122)

    हे स्वामिनी, श्री कुंज विहारिणी (श्री राधा)! कृपा करके शीघ्र मेरी सुध लें। मुझे सेवा की रीति कुछ भी नहीं आती, मेरी भूल को क्षमा कर दें।

  14. श्यामा पग लवलीन हो, उन्हीं के हाथ विकाय - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (236.2)

    श्रीकृष्ण स्वयं को केवल उन्हीं के हाथों में बेचते हैं जो श्रीराधा के चरणों की भक्ति में स्वयं को पूर्णतः तल्लीन कर देते हैं। ऐसे प्रेमी भक्तों के हाथों में श्रीकृष्ण प्रेमवश बिना मोल के बिक जाते हैं।

  15. जुगल बिहारी विरह में - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (98)

    युगल विहार करने वाले श्री राधा-कृष्ण का वियोग अब और सहन नहीं होता। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे किशोरीजी! कृपा कर अब मुझे वृन्दावन का वास प्रदान कीजिए ।

  16. स्वामिनि हौं पतितन शिरताज - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81)

    हे स्वामिनी, मैं पतितों में सिरताज हूँ। इस जगत में मैं तुम्हारी कहलाती हूँ, परंतु फिर भी विमुखों की भाँति इधर-उधर भटक रही हूँ और कोई लज्जा तक नहीं आती।

  17. कवधौं सेवाकुंज में ह्वैंहों श्यामतमाल - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (56)

    मैं श्री वृंदावन के सेवा कुंज में कब ऐसा श्याम तमाल वृक्ष बन जाऊँगा, जिसकी लताओं को पकड़कर युगल सरकार श्री श्यामा-श्याम प्रेम भरी लीलाएँ करते हुए विश्राम करेंगे?

  18. श्रीराधारानी श्रीवन दृग दरसावौ - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (15)

    हे श्री राधारानी! कृपा करके मुझे श्रीवृन्दावनधाम का दर्शन प्रदान करें जिससे मैं आपके चरणचिह्नों से चिन्हित वृंदावन की रज को अपने समस्त अंगों से स्पर्श करा सकूँ ।

  19. नीको लगे राधावर प्यारो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी

    श्री राधावर (श्री कृष्ण) मेरे हृदय को अत्यंत प्रिय हैं। वे मोर मुकुट धारण किए, पीतांबर वस्त्रों से सुशोभित, हाथ में छड़ी लिए, अपनी मतवारी चाल से चलते हुए साक्षात रसिकराज प्रतीत होते हैं। उनकी चाल, उनकी छवि और उनकी लीला मन को मोहित कर लेने वाली है।