मन लागो जी स्यामाँ स्याम विलासी सों - श्री चन्द्रसखी जी
मेरा मन उन परम विलासी श्री स्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) में पूर्ण रूप से अनुरक्त हो गया है। रात्रि बीत चुकी है और प्रातःकाल हो गया है, तथा सूर्य की किरणों का प्रकाश सब ओर फैल गया है।
चन्द्रसखी सत्रहवीं शताब्दी के सखी भाव के भक्त थे जो श्री राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षित थे। इनकी पद रचना संगीत का एक भंडार है। इनकी भाषा बड़ी सरल और लय विशेष है। इनके पदों में विनय, चितवन, दान, मान, विरह, बांसुरी, भ्रमर गीत आदि का विषय पाया जाता है।
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मेरा मन उन परम विलासी श्री स्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) में पूर्ण रूप से अनुरक्त हो गया है। रात्रि बीत चुकी है और प्रातःकाल हो गया है, तथा सूर्य की किरणों का प्रकाश सब ओर फैल गया है।
हे श्याम! थोड़ा पास आओ, मैं तुम पर रंग डालूँ। तुम्हारे मुख पर अबीर-गुलाल मलूँ और गालों पर प्रेम से गुलचा लगा दूँ।
हे सखी, मैं गोवर्धन जाऊँगी, क्योंकि मेरा चंचल हृदय और कहीं शांति नहीं पाता। मैं प्रेमपूर्वक प्रचुर मात्रा में भोजन बनाकर भोग लगाऊँगी, संतों को आमंत्रित कर उन्हें प्रेम से पवाऊँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय मानता नहीं।
दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण की मधुर छवि की उपमा किससे दी जाए ? उनके अंगों पर सुन्दर विविध रंगों के आभूषण सुशोभित हैं, जिन्हें देख-देख कर आनंद लीजिए।
हे सखी, आज ब्रज में होली का उत्सव है जिसमें सब ज़बरदस्ती एक दूसरे पर रंग डालेंगें ।
दिव्य दंपति श्री श्यामाश्याम की छवि की उपमा का वर्णन किस प्रकार किया जाये । वे दोनों रंग भरे आभूषण से सुसज्जित हैं जिनको निहार निहार कर आनंद रस का पान कीजिए ।
अरी सखी, चलो वृंदावन चलते हैं क्योंकि मोहन श्री कृष्ण ने वहाँ वेणु बजायी है । वेणु को सुनते ही ब्रह्मदिक मोहित हो उठे और वेदों को अब वे पढ़ नहीं पा रहे । वेणु को सुनते ही शिव शंकर भी मोहित हो गये जो अब ध्यान नहीं धारण कर पा रहे ।
ब्रज के मुकुटमणि नन्दनन्दन श्री कृष्ण पर मैं स्वयं को न्योंछावर करती हूँ । समस्त देवताओं में श्री कृष्ण बड़े हैं, जैसे तारों के मध्य चंद्र ।
हे श्री श्यामसुंदर, मेरी यह कामना है की मैं आपके चरणों की रज बनकर सदा उन्हीं से लिपटी रहूँ । आपके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, सुन्दर तिलक धारण है, सुन्दर गोल कपोल है,जो की मनहरण है ।
श्री श्याम सुंदर श्री प्रिया जी से प्रार्थना कर रहे हैं: हे राधा रानी, मेरी बांसुरी मुझे लौटा दो ना ? इस वंशी में मेरे प्राण बसे हैं जो अब चोरी हो गई है ।
अरी सखी देख कान्हा मुरली में राधे राधे गान कर रास रचा रहा है । इधर गोकुल नगरी है, उधर मथुरा, इन दोनों के बीच में रास रचा रहा है ।
हे श्रीराधा, मुझ पर भी एक कृपा की दृष्टि डालिए । कृपा अपनी दासी की इस प्रेम भरी आकांक्षा को पूर्ण कर दीजिए ।
श्री चन्द्रसखी जी महात्माओं के सभा के आभूषण थे। ये सदैव श्री युगल किशोर की लीलाओं की पद रचना करते थे और समस्त हरि भक्तों को गुरु रूप से देखते थे।
हे सखी, मैं ब्रज की रज क्यूँ न बन गयी? यदि मैं ब्रज की रज होती तो गोकुल की डगर में पड़ी रहती और उड़ उड़ कर श्री श्याम सुंदर के शरीर से जा लगी रहती ।
श्री कृष्ण हाथ में दर्पण लिए श्री राधा से कहते हैं "हे श्यामा प्यारी, आपका मुख सुन्दर है की मेरा मुख?"
मैं प्रीतम प्यारी की बलिहारी जाती हूं जब दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण श्री वृंदावन धाम में भुजाओं को मिलाए हुए नित्य ही केली करते हैं एवं सुख बरसाते हैं । [1]
एक सखी दूसरे से कहती है, हे सखी! मैं ब्रज में गोवर्धन की दिव्य भूमि में जाना चाहती हूं! मेरा मन यहाँ रहना पसंद नहीं करता है।