श्री चन्द्रसखी जी

चन्द्रसखी सत्रहवीं शताब्दी के सखी भाव के भक्त थे जो श्री राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षित थे। इनकी पद रचना संगीत का एक भंडार है। इनकी भाषा बड़ी सरल और लय विशेष है। इनके पदों में विनय, चितवन, दान, मान, विरह, बांसुरी, भ्रमर गीत आदि का विषय पाया जाता है।

17 लेख उपलब्ध हैं

  1. मन लागो जी स्यामाँ स्याम विलासी सों - श्री चन्द्रसखी जी

    मेरा मन उन परम विलासी श्री स्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) में पूर्ण रूप से अनुरक्त हो गया है। रात्रि बीत चुकी है और प्रातःकाल हो गया है, तथा सूर्य की किरणों का प्रकाश सब ओर फैल गया है।

  2. मैं तो गोवर्धन को जाऊँ मेरी वीर - श्री चन्द्रसखी जी

    हे सखी, मैं गोवर्धन जाऊँगी, क्योंकि मेरा चंचल हृदय और कहीं शांति नहीं पाता। मैं प्रेमपूर्वक प्रचुर मात्रा में भोजन बनाकर भोग लगाऊँगी, संतों को आमंत्रित कर उन्हें प्रेम से पवाऊँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय मानता नहीं।

  3. या छवि की उपमा को दीजै - श्री चन्द्रसखी जी

    दिव्य दंपति श्री श्यामाश्याम की छवि की उपमा का वर्णन किस प्रकार किया जाये । वे दोनों रंग भरे आभूषण से सुसज्जित हैं जिनको निहार निहार कर आनंद रस का पान कीजिए ।

  4. चलो सखी वृन्दावन चलिये मोहन बेनु बजाये री - श्री चन्द्रसखी जी

    अरी सखी, चलो वृंदावन चलते हैं क्योंकि मोहन श्री कृष्ण ने वहाँ वेणु बजायी है । वेणु को सुनते ही ब्रह्मदिक मोहित हो उठे और वेदों को अब वे पढ़ नहीं पा रहे । वेणु को सुनते ही शिव शंकर भी मोहित हो गये जो अब ध्यान नहीं धारण कर पा रहे ।

  5. तेरे चरण कमल में श्याम लिपट जाऊँ रज बन के - श्री चन्द्रसखी जी

    हे श्री श्यामसुंदर, मेरी यह कामना है की मैं आपके चरणों की रज बनकर सदा उन्हीं से लिपटी रहूँ । आपके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, सुन्दर तिलक धारण है, सुन्दर गोल कपोल है,जो की मनहरण है ।

  6. श्री राधेरानी, दे डारो ना वाँसुरी मोरी - श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (33)

    श्री श्याम सुंदर श्री प्रिया जी से प्रार्थना कर रहे हैं: हे राधा रानी, मेरी बांसुरी मुझे लौटा दो ना ? इस वंशी में मेरे प्राण बसे हैं जो अब चोरी हो गई है ।

  7. देखो री बाँसुरी में कान्हो राधे राधे गावै री - श्री चंद्रसखी पदावाली (21)

    अरी सखी देख कान्हा मुरली में राधे राधे गान कर रास रचा रहा है । इधर गोकुल नगरी है, उधर मथुरा, इन दोनों के बीच में रास रचा रहा है ।

  8. श्री चन्द्रसखी की जीवनी 

    श्री चन्द्रसखी जी महात्माओं के सभा के आभूषण थे। ये सदैव श्री युगल किशोर की लीलाओं की पद रचना करते थे और समस्त हरि भक्तों को गुरु रूप से देखते थे।

  9. ब्रज की रज मैं भई क्यों न बीर - श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (7)

    हे सखी, मैं ब्रज की रज क्यूँ न बन गयी? यदि मैं ब्रज की रज होती तो गोकुल की डगर में पड़ी रहती और उड़ उड़ कर श्री श्याम सुंदर के शरीर से जा लगी रहती ।

  10. हौं तो प्यारी प्रीतम - श्री चंद्र सखी

    मैं प्रीतम प्यारी की बलिहारी जाती हूं जब दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण श्री वृंदावन धाम में भुजाओं को मिलाए हुए नित्य ही केली करते हैं एवं सुख बरसाते हैं । [1]