श्री ललित किशोरी देव जू की बानी

श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, श्री रसिक देव जी के शिष्य श्री ललित किशोरी देव जी द्वारा लिखित दोहों एवं रस पदों का संग्रह है।

156 लेख उपलब्ध हैं

  1. रस रसिकन को रस पान - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (01)

    रस ही रसिकों का जीवनाधार है। वही उनका आहार, भोग और आत्मिक पोषण है। श्री राधा और श्रीकृष्ण के संयोगमय (नित्य विहार) रस के बिना वे क्षणभर भी नहीं रह सकते।

  2. एक राधा ब्रज में बसै - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (714-716)

    एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से विराजमान हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरूप से निकुंजों में नित्य विहार करती हैं, जिन्हें रसिक-शिरोमणि स्वामी हरिदास जी लाड़ लड़ाते हैं।

  3. श्रीस्वामी के पद कमल - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (394)

    ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों को हृदय रूपी शुभ स्थान में बड़े ही प्रेम से विराजमान कर गौर और श्यामल वर्ण की आभा से युक्त श्री युगल-सरकार (राधा-कृष्ण) को मनभावने भाव से स्वेच्छापूर्वक लाड़ लड़ाओ।

  4. हमरी बात भली बनी भई लडैती प्रान - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (279)

    जगत में हमारी बात बहुत ही सुन्दर बन गई क्योंकि स्वयं सर्वोपरि श्रीनित्यविहारिनीजू (श्री राधा) हमारी प्राण-स्वरूप हो गई हैं। रसिक-शिरोमणि श्यामा प्यारी जू के मिलने से हमें अति ही सुख प्राप्त हो गया है।

  5. मैं जानी मैं जानी लडैती जू - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (55)

    हे लाड़िली जू! अब मैंने आपके वास्तविक स्वरूप और महिमा को जान लिया है। हे किशोरी जी! आप अत्यंत उदारमयी हैं और विलक्षण प्रेम एवं आनंद की अक्षय निधि हैं।

  6. व्यास रसिक निर्णय कियौ श्रीवृंदावन माँहिं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (356)

    श्रीधाम वृन्दावन में रसिक-समाज के मध्य गहन विचार के उपरांत, श्री हरिराम व्यास जी ने यह निष्कर्ष स्थापित किया कि रसिक अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' के समान अन्य कोई उपासना मार्ग नहीं है। यह रस-पद्धति अद्वितीय है, जिसमें निरंतर केवल प्रिया-प्रियतम के अखंड विहार का ही अनन्य भाव से भजन किया जाता है। अतः इसकी तुलना किसी अन्य साधन-पथ से संभव नहीं है।

  7. रस मत्त बिहारिनि प्यारी है - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (69)

    श्री कुंजबिहारिन (श्री राधा) प्यारी प्रेमोन्माद में उन्मत्त रहती हैं। उनका रूप अद्भुत उज्ज्वलता से युक्त है; केवल थोड़ी सी दृष्टि से निहारने मात्र से ही श्री कृष्ण उनके अधीन हो जाते हैं।

  8. नित्त सरद नित्त तीज है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (1185)

    जहाँ नित्य ही शरद ऋतु है, नित्य ही तीज का उत्सव है और नित्य ही बसन्त तथा होली का आनंद है। जहाँ प्रतिक्षण युगल की नित्य नई-नई केलि-लीलाएँ होती रहती हैं, जिनके सुख का कभी अंत नहीं होता—वही नित्य वृन्दावन धाम है।

  9. ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)

    श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।

  10. सहज बिहार निरन्तर मेरौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (103)

    प्रिया-प्रियतम की कृपा से उनका नित्य विहार मुझे अब सहज उपलब्ध है। दोनों प्रिया-प्रियतम तन-मन से एक होकर विहरण करते हैं, और हर क्षण प्रेम और भी अधिक गहरा होता रहता है।

  11. आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (440)

    सृष्टि की रचना से पूर्व और प्रलय के पश्चात भी जो सतत एकरस भूतल पर विद्यमान रहता है, वह केवल श्रीवृन्दावन धाम ही है। वहाँ जो जन समस्त अपराधों से रहित होकर अखंड वास करते हैं, उन पर अति प्रसन्न होकर श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज उन्हें अति अद्भुत, सुखदायक और सर्वोपरि नित्य-विहार रस प्रदान कर देते हैं।

  12. लडैती आनंद निधि सुखरासी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (2)

    नित्य विहारिणी श्रीराधा आनंद की निधि और सुख का अगाध सागर हैं। वह महाप्रेम से भरी हुई, सहज रूप से छबीली एवं सदा अपने प्रियतम कुंजबिहारी के निकट रहती हैं।

  13. आचारी सौं ठाकुर डरैं - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (113)

    जो केवल नियम-आचार, विधि-निषेध एवं बाहरी रीति-रिवाज में फँसे होते हैं, उनसे ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) दूर ही रहते हैं — उनके पास नहीं आते। परंतु सच्चे प्रेमी रसिक के संग तो ठाकुरजी उमंग में भरकर, रीझ-रीझ कर उन्हें हृदय से लगाते रहते हैं।

  14. कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (346)

    कोई भगवान का निज स्वरूप वैकुंठनाथ को बताता है, कोई ब्रह्म को बताता है। कोई अयोध्यानाथ श्री राम को बताता है तो कोई स्वयं भगवान श्री कृष्ण को बताता है ।

  15. तन मन वचननि लाड़िली मेरी जीवन प्रान - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (650)

    मेरे तन, मन और वाणी में पूर्ण रूप से लाड़ली जी (श्री राधा) ही समाई हुई हैं, जो मेरे जीवन की प्राण स्वरूपा हैं। नित्य विहार की सुंदर केली-लीलाओं में सदा लीन होकर, वे कुंज बिहारी के साथ रस-क्रीड़ा में निरंतर मग्न रहती हैं।

  16. मात तात जाके नहीं वृषभानु सुता नहिं नाम - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (686)

    स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में श्री राधा एवं श्री कृष्ण को जन्मादि लीलाओं से पृथक सदा नित्य किशोर माना जाता है। श्री राधा का “वृषभानु दुलारी” आदि नामों से भी कोई सरोकार नहीं माना जाता क्योंकि इस उपासना में उनका कोई माँ-बाप नहीं है, वे सदा निकुंज में नित्य विहार करती हैं। यहाँ श्री कृष्ण का नाम ‘कुंजबिहारी’ है एवं श्री राधा का ‘कुंजबिहारिणी’। यहाँ ब्रज रस के गोप, गोपी, गौ, ग्वाल, मात-पिता आदि से रहित श्यामा-कुंजबिहारी की विशुद्ध निकुंज उपासना ही प्राणों का आधार है।

  17. मोहि भरोसौ स्वामी जी को - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (91)

    मुझे तो ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी पर विश्वास है । उनकी करुणा ऐसी है कि वे जिस पर कृपा करते हैं, उसे भी अपने समान बना लेते हैं । अर्थात् जिस प्रकार वे स्वयं श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करते हैं, वही सेवा का अधिकार वे अपने कृपापात्र को भी दे देते हैं। उनके प्राणों का आधार युगल नित्य विहार है ।

  18. उत्तम करे सो लाड़िली - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (107)

    श्रीराधा जो कुछ करती हैं, वह सदा परम उत्तम और कल्याणकारी होता है; जबकि हम सीमित बुद्धि वाले जीव केवल मध्यम या स्वार्थयुक्त कर्म ही कर पाते हैं। जो साधक हर परिस्थिति में यह भली भाँति जानकर पूर्ण समर्पण भाव से श्री राधा की इच्छा को ही अपनी इच्छा बना लेता है, वही श्रीहरि का सच्चा प्रियपात्र बनता है।

  19. श्री स्वामी हरिदास को धर्म सुमेर समान - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (317)

    प्रिया-प्रियतम के एकान्तिक एवं अखंड नित्य विहार रस रूपी भक्ति-भाव का सतत पालन करने वाला स्वामी श्री हरिदास जी का सर्वोपरि प्रेम-धर्म, सुमेरु पर्वत के समान अत्यंत ऊँचा है। इसके समक्ष अन्य नाना धर्म तो मानो डूँगरी (छोटी पहाड़ी) के समान तुच्छ प्रतीत होते हैं।