श्री मलूक दास जी

श्री ब्रज धाम के एक भक्त श्री मालुक दास जी

20 लेख उपलब्ध हैं

  1. दया धर्म हिरदे बसै बोलै - श्री मलूक दास

    जिनके हृदय में सदा दया और धर्म का निवास हो, जो अमृत के समान मधुर वचन बोलते हों, और जिनकी दृष्टि विनम्रता के कारण सदैव झुकी रहती हो, वास्तव में वही श्रेष्ठ और महान हैं, और उन्हीं को सच्चे अर्थों में ऊँचा जानना चाहिए।

  2. बहुतक पीर कहावते बहुत करत हैं भेस - श्री मलूक दास

    इस संसार में अनेक ऐसे झूठे पीर और गुरु हैं जो भेष धारण कर लोगों को अपने जाल में फँसाते हैं। परंतु यह बात भली-भाँति समझ लेनी चाहिए कि केवल भेष से कोई साधु या पीर नहीं होता; जब तक वह भीतर बैठे अपने मन को न जीत ले, तब तक वह सच्चा संत नहीं हो सकता।

  3. करें भक्ति भगवंत की कबहुं करै नहिं चूक - श्री मलूक दास

    जो निरंतर सच्चे भाव से भगवान की भक्ति करता है और क्षण मात्र को भी अपने मन को श्री हरि से अलग नहीं करता, वही श्री हरि-रस में सदा मगन रहता है। श्री मलूक दास कहते हैं कि केवल यही सच्ची भक्ति कहलाती है।

  4. मक्का मदीना द्वारिका बदरी और केदार - श्री मलूक दास

    चाहे कोई मक्का, मदीना, द्वारिका, बदरीनाथ, केदारनाथ आदि तीर्थों की यात्रा किया करे, परंतु यदि उसके भीतर दया नहीं है, तो ये सारी यात्राएँ निरर्थक हैं।

  5. सोइ पूत सपूत है जो भक्ति करे चित लाय - श्री मलूक दास

    केवल वही पुत्र वास्तव में धन्य है जो अपने मन को पूर्ण रूप से भक्ति में लगाता है। ऐसी भक्ति के माध्यम से वह जरा और मृत्यु से पार होकर, शाश्वत और अमर अवस्था को प्राप्त करता है।

  6. गाँठी सत्त कुपीन में सदा फिरै निःसंक - श्री मलूक दास

    जिसकी लंगोटी में भले ही सात गाँठें लगी हों, परंतु जो सदा निडर होकर विचरता हो एवं श्री हरि के अमृत नाम रस में सदा लीन रहता हो, ऐसा महात्मा देवराज इन्द्र को भी रंक समझता है।

  7. हम जानत तीरथ बड़े तीरथ हरि की आस - श्री मलूक दास

    श्री मलूक दास जी कहते हैं कि मैंने तीर्थों के बारे में बहुत सुना है और यह भी जानता हूँ कि उनका बहुत महत्व है । परंतु जो भक्त मन लगाकर भगवान का भजन करते हैं, उनके हृदय में तो स्वयं करोड़ों तीर्थ बसते हैं।

  8. संध्या तरपन सब तजा तीरथ कवहुँ न जाऊँ - श्री मलूक दास

    संध्या, तर्पण आदि समस्त कर्मों का मैंने परित्याग कर दिया है, और तीर्थ आदि के लिए भी नहीं जाता हूँ क्योंकि मैंने जान लिया है कि साक्षात् श्री हरि मेरे हृदय में सदा वास करते हैं । अत: अब मैं केवल मन लगाकर उनकी प्रेमपूर्वक भक्ति में ही लीन रहता हूँ ।

  9. कह ‘मलूक' हम जबहिं ते लीन्हों हरि की ओट - श्री मलूक दास

    मलूकदास जी कहते हैं कि जबसे प्रभु की शरण ली है, तभी से सुख पूर्वक सोया हूँ अर्थात् पूर्ण रूप से निश्चिंत हो गया हूँ । सब प्रकार के संदेहों एवं चिंताओं की गठरी फेंक कर आनंदमग्न हो कर जी रहा हूँ ।

  10. सुमिरन ऐसा कीजिए दूसरा लखै न कोय - श्री मलूक दास

    भगवान का सुमिरन ऐसा गोपनीय करना चाहिए कि कोई आपके भजन को जान ही ना पावे। मन ही मन में ऐसी आराधना कीजिए कि दूसरा तुम्हारे होंठों को भी फड़कता हुआ ना देख सके। प्रेम को सदैव गुप्त ही रखना चाहिए जिससे वह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है। यदि प्रकट कर दिया, तो वह एक दिखावा मात्र है, प्रेम नहीं।

  11. जो तेरे घट प्रेम है तो कहि-कहि न सुनाव - श्री मलूक दास

    यदि तुम्हारे अंदर प्रेम है तो तुम कदापि उसको बतलाकर सुनाओगे नहीं । भगवान अंतर्यामी हैं, वे सबके ह्रदय की बात को जानते हैं, तुम्हें किसी से कहने की ज़रूरत नहीं है ।

  12. भेष फ़क़ीरी जे करै मन नहिं आवै हाथ - श्री मलूक दास

    जिन्होंने भेष तो साधु संतों वाला रख लिया है, परंतु मन संसार में ही आसक्त है, तो उससे क्या लाभ होगा? परंतु यदि मन फ़क़ीरी में रमा हुआ है, अर्थात् भगवान के प्रेम में उन्मत्त है, तो उसने श्री हरि को अधीन कर लिया है।

  13. जहाँ-जहाँ बच्छा फिरै - श्री मलूक दास

    जहां जहां बछड़ा जाता है वहाँ वहाँ गाय पीछे पीछे जाती है । श्री मलूक दास कहते हैं कि उसी प्रकार जहां जहां संत जन जाते हैं वहीं पीछे पीछे भगवान पहुँच जाते हैं ।

  14. माला जपों न कर जपों जिभ्या कहूँ न राम - श्री मलूक दास जी

    न तो मैं माला जपता हूँ, न ही किसी संख्या से भगवान का नाम जप करता हूँ, और न ही जिभ्या से कभी नाम ही लेता हूँ । मैंने श्री हरि की शरणागति प्राप्त कर परम विश्राम पाया है, अब श्री हरि ही मेरा सुमिरन करते हैं ।