जगद्गुरु निंबार्काचार्य

जगद्गुरु निंबार्काचार्य, निम्बार्क सम्प्रदाय के संस्थापक थे, जो सुदर्शन चक्र के अवतार माने जाते हैं।

19 लेख उपलब्ध हैं

  1. कृपास्य दैन्यादियुजि प्रजायते - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (9)

    अनन्याधिपति सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कृपा दैन्य ह्रदय (दीनता युक्त) प्रपन्न भक्तों पर ही होती है जिसके फल स्वरूप उनमें रसमयी भक्ति प्रकट होती है वही फलरूपा एवं प्रेमलक्षणा उत्तमा भक्ति वर्णित है तथा ये प्रेमलक्षणा परा भक्ति अनन्य भागवतजनों के निर्मल अन्तःकरण में स्फुरित होती है। श्रवण कीर्तन आदि साधन रूपा भक्ति, अपरा भक्ति कहलाती है।

  2. नान्यागति: कृष्णपदारविन्दात - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (8)

    जिसकी शक्ति और आशय का किसी को पता ही नहीं लग सकता फिर भी वे भक्तों की इच्छा के लिए अनेक अवतार धारण करते है। जिनकी ब्रह्मा शंकर आदि समस्त देवता वंदना करते है, उन श्रीराधाकृष्ण के चरणकमलों के अतिरिक्त मै कोई सहारा नहीं देखता ।

  3. सच्चिन्तनीयमनुमृग्यमभीष्टदोहं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्तोत्र (9)

    ब्रह्मादि देवों द्वारा अन्वेषण किये जाने वाले अथवा विविध साधना दारा अन्वेषण करने योग्य, अभिमत फल को देने वाले संसार के समस्त तापों के शमन अर्थात नाश करने वाले परमोत्तम परम रमणीय सम्यक् प्रकार से ध्यान करने योग्य भगवान् श्रीश्यामसुन्दर के चरण-कमलों को मन, वाणी तथा प्रणय पूर्वक शरीर से सेवन करता हूँ ।

  4. प्रातर्भजामि शयनोत्थितयुग्मरूपं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्तोत्र (3)

    शयन से उठे हुए ऐसे श्रीराधा-माधव युगल स्वरूप का मैं प्रातःकाल भजन करता हूँ जिनकी पारस्परिक रस लीलाएँ एवं केलि विहार के चिह्न आदि सखियों के अवलोकन का विषय हैं, जो सर्वेश्वर, सुखप्रद, रसिक-भक्तों का परमाश्रय, सहचरीवृन्द से आवृत तथा सुरत काम की क्रीड़ाओं से मन का हरण कर रहे हैं ।

  5. प्रातर्धरामि हृदयेन हृदीक्षणीयं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (5)

    व्रजसुन्दरियों (की अनन्य प्रीतिके कारण उन) — के प्राप्यरूप तथा उनके द्वारा प्रभातवेला में जगाये जाते हुए, सभी प्रकार की वेष-रचनाओं से समन्वित हुए जो चिन्तन का विषय बनते हैं, जो निरतिशय सौन्दर्य के आश्रय तथा (भक्तों के द्वारा) अन्त:करण में निरन्तर चिन्तनयोग्य हैं — ऐसे उन राधा-माधव के युगल स्वरूप का मैं प्रातःकाल अपने हृदय में ध्यान करता हूँ ।

  6. प्रातर्नमामि वृषभानुसुतापदाब्जं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (8)

    भम्रर रूपी व्रजगोपियों के नेत्र समूह जिनकी स्तुति करते हैं और परम चतुर प्रेमाकुल नन्दनन्दन श्रीहरि जिनकी सदा वन्दना करते हैं, ऐसे श्रीवृषभानुसता श्री राधिकाजी के उन चरण कमलों को मैं प्रातः काल नमन करता हूँ ।

  7. दुराराध्यामाराध्य कृष्णं वशे त्वं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (3)

    श्री राधे ! जिनकी आराधना कठिन है, उन श्रीकृष्ण की भी आराधना करके अपने महान प्रेमसिन्धु की बाढ़ से उन्हें वश में कर लिया। श्रीकृष्ण की अराधना के कारण तुम राधानाम से विख्यात हुई। श्रीकृष्णस्वरूपे ! अपना यह नामकरण स्वयं तुमने किया है, इससे अपने सन्मुख आये हुए मुझ शरणागत को श्री हरिका प्रेम प्रदान करो ।

  8. स्ववासोपहारं यशोदासुतं वा - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (2)

    जो अपने वस्त्र का अपहरण करने वाले अथवा अपने दूध-दही, माखन आदि चुराने वाले यशोदानन्दन श्रीकृष्ण की साधना करती हैं, जिन्होंने अपनी नीवी (प्रेम) के बन्धन से श्रीकृष्ण के उदर (रस) को शीघ्र ही बांध लिया, जिसके कारण उनका नाम "दामोदर" हो गया; उन दामोदर की प्रियतमा श्री राधा रानी की में निश्चित ही शरण लेता हूँ।

  9. प्रात: स्मरामि युग-केलिरसाभिषिक्तं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (1)

    नित्यनिकुञ्जबिहारी युगलकिशोर श्री राधा कृष्ण के परम दिव्य लीलाविहार केलि रस से अभिषिक्त तथा कलिन्दतनया श्रीयमुना के गम्भीर धारा प्रवाह से सर्वदा समन्वित एवं अपने दिव्यातिदिव्य लोकोत्तर अनिर्वचनीय गुण समूह से प्रकाशमान, श्री युगल प्रिया-प्रियतम के ललित चरणारर्विन्द रज रेणु कणिका से जहां के समस्त प्राणीमात्र परम पवित्र हैं ऐसे कल्पवृक्ष स्वरूप परम सुंदर परम रमणीय श्री वृन्दावन धाम का मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ।

  10. व्रजन्तीं स्ववृन्दावने नित्यकालं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (5)

    जो प्रतिदिन नियत समय पर श्री श्यामसुन्दर के साथ उन्हें अपने अंक की माला अर्पित करके अपनी लीलाभूमि-वृंदावन में विहार करती हैं, भक्तजनों पर प्रयुक्त होने वाले कृपा-कटाक्षों से सुशोभित उन सच्चिदानन्दस्वरूपा श्री लाड़िली का सदा चिन्तन करे।

  11. उपासनीयं नितरां जनै: सदा - जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (6)

    इन श्रीराधाकृष्ण युगल किशोरात्मक परब्रह्म की निरंतर उपासना करते रहना चाहिए । उनके ध्यान मात्र से अज्ञान ( तम अविद्या की) अनुवृति क्षीण हो जाती है।

  12. मुकुन्दानुरागेण रोमाञ्चिताङ्गै - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (6)

    श्री राधे ! तुम्हारे मन-प्राणों में आनन्दकन्द श्री कृष्ण का प्रगाढ अनुराग व्याप्त हैं । अतएव तुम्हारे श्री अंग सदा रोमाञ्च से विभूषित हैं और अंग-अंग सूक्ष्म स्वेद-बिंदुओं से सुशोभित होता है। तुम अपनी कृपा-कटाक्ष से परिपूर्ण दृष्टि द्वारा महान प्रेम की वर्षा करती हुई मेरी ओर देख रही हो; इस अवस्था में मुझे कब तुम्हारा दर्शन होगा ?

  13. नमस्ते श्रियै राधिकायै परायै - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (1)

    श्री राधिके! तुम्हीं श्रेय मार्ग की अधिष्ठात्री हो, तुम्हें नमस्कार है, तुम्हीं पराशक्ति राधिका हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम मुकुन्द की प्रियतमा हो, तुम्हें नमस्कार है। सदानन्दस्वरूपे देवि! तुम्हीं मेरे अन्त:करण के प्रकाश में श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के साथ सुशोभित होती हुई मुझ पर प्रसन्न होओ ।

  14. अंगे तु वामे वृषभानुजां मुदा - - जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (5)

    अनुरूप सौभगारूप से कृष्ण के वामांग में आनन्दपूर्वक विराजमान, समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली बृषभानुजी श्री राधा को नमस्कार करता हूँ, जो सहस्रों सखियों द्वारा परिसेवित हैं।

  15. यदङ्कावलोकं महालालसौघं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (7)

    श्री राधिके ! यद्यपि श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण स्वयं ही ऐसे हैं कि उनके चारू-चरणों का चिन्तन किया जाए, तथापि वे तुम्हारे चरण-चिह्नों के अवलोकन की बड़ी लालसा रखते हैं। देवि ! मैं नमस्कार करता हूँ।

  16. मुकुन्दस्त्वया प्रेमडोरेण बद्धः - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (4)

    तुम्हारी प्रेम डोर में बंधे हुए भगवान श्री कृष्ण पतंग की भाँति सदा तुम्हारे आस-पास ही चक्कर लगाते रहते हैं, हार्दिक प्रेम का अनुसरण करके तुम्हारे पास ही रहते हुए क्रीडा करते हैं।

  17. श्रीजी का मंदिर, वृन्दावन

    वृंदावन में लोई बाजार में श्रीजी का मंदिर, जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य द्वारा स्थापित निंबार्क सम्प्रदाय के केंद्र के रूप में माना जाता है। श्री निम्बार्काचार्य जी को श्री कृष्ण का 'चक्र' अवतार माना जाता है। 14 वीं -15 वीं शताब्दी में श्री भट देवाचार्य रसिक संत लेखक ने अपनी पुस्तक "युगल शतक" में श्री निम्बार्काचार्य की रासोपासना मार्ग का वर्णन किया, और उन्ही के शिष्य श्री हरिव्यास देवाचार्य जी ने अपने ग्रन्थ 'महावाणी' (जो की रसोपाससना में शीर्ष ग्रन्थ भी माना जाता है) में रसोपासना का विस्तार से वर्णन किया।

  18. सदा राधिका नाम , जिह्वा ग्रह स्थात्। सदा राधिका रुप - श्री निम्बार्काचार्य

    मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर सदा श्रीराधिका का नाम विराजमान रहे । मेरे नेत्रों के समक्ष सदा श्रीराधा का ही रूप प्रकाशित हो ।